संभल (Sambhal) में मुस्लिम समुदाय (Muslim Community) को टारगेट करने से बीजेपी (BJP) को जो संभावित फायदा हो सकता है. Grok के मुताबिक BJP को मिलने वाला फ़ायदा मुख्य रूप से राजनीतिक, सामाजिक और चुनावी रणनीति से जुड़ा है. हालांकि, यह एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, और इसके परिणाम कई कारकों पर निर्भर करते हैं. आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
1. हिंदुत्व की विचारधारा को मजबूत करना और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण
BJP की मूल विचारधारा हिंदुत्व पर आधारित है, और संभल (Sambhal) जैसे क्षेत्र, जहां मुस्लिम आबादी (Muslim Community) अधिक है (लगभग 65% के आसपास, जैसा कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है), में धार्मिक आधार पर तनाव पैदा करके हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सकता है. संभल में हाल के घटनाक्रम, जैसे मस्जिद सर्वे के दौरान हिंसा (नवंबर 2024 में 5 लोगों की मौत का उल्लेख सोशल मीडिया पर किया गया है) और माहौल को खराब करने के आरोप, BJP को हिंदू समुदाय के बीच यह संदेश देने का मौका दे सकते हैं कि वे हिंदू हितों की रक्षा कर रहे हैं. इससे हिंदू मतदाता, खासकर उन क्षेत्रों में जहां वे अल्पसंख्यक हैं, BJP के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं.
*उदाहरण*: BJP ने अतीत में उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बिना किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिए भी भारी जीत हासिल की है. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में BJP ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा, फिर भी 325 सीटें जीतीं. यह दिखाता है कि ध्रुवीकरण की रणनीति उनके कोर वोटर बेस को मजबूत कर सकती है.
2. विपक्ष को कमजोर करना
संभल (Sambhal) में सामाजिक तनाव पैदा करके बीजेपी विपक्षी दलों, जैसे समाजवादी पार्टी (सपा) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM), को कमजोर करने की कोशिश कर सकती है. ये दल पारंपरिक रूप से मुस्लिम मतदाताओं पर निर्भर रहे हैं. अगर मुस्लिम समुदाय में डर का माहौल बनता है, जैसा कि फरवरी 2025 में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने दावा किया कि लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं, तो विपक्षी दलों का वोट बैंक बिखर सकता है. इससे BJP को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा हो सकता है, क्योंकि विपक्षी वोटों का बंटवारा उनके लिए चुनावी जीत को आसान बना सकता है.
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*उदाहरण*: कुंदरकी विधानसभा सीट (मुरादाबाद जिले में, जहां संभल भी आता है) पर 2024 के उपचुनाव में BJP ने 31 साल बाद जीत हासिल की. इस सीट पर 60% से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं, फिर भी बीजेपी उम्मीदवार रामवीर सिंह ने डेढ़ लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. यह जीत विपक्षी वोटों के बंटवारे और बीजेपी की रणनीति का परिणाम मानी जा रही है.
3. सांप्रदायिक मुद्दों को हवा देना
बीजेपी अक्सर सांप्रदायिक मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीति को मजबूत करती रही है. संभल (Sambhal) में मंदिर-मस्जिद विवाद, मस्जिद सर्वे, और कथित तौर पर माहौल खराब करने की कोशिशें (जैसा कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है, जिसमें मंदिर और कुएं ढूंढने की बात कही गई है) BJP को एक नैरेटिव सेट करने का मौका देती हैं. यह नैरेटिव उनके समर्थकों को यह विश्वास दिला सकता है कि बीजेपी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जो “हिंदू संस्कृति” की रक्षा कर सकती है.
*उदाहरण*: वक्फ संशोधन बिल 2024 को लेकर भी BJP ने इसे सुधार के रूप में पेश किया है. योगी आदित्यनाथ ने अप्रैल 2025 में कहा कि वक्फ “लूट का अड्डा” बन गया है और इसके सुधार से मुस्लिम समुदाय को भी फायदा होगा. हालांकि, इस बिल का कई मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया है, जिसे बीजेपी अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकती है ताकि हिंदू मतदाताओं को यह दिखाया जा सके कि वे “अन्याय” के खिलाफ लड़ रहे हैं.
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4. मुस्लिम समुदाय में डर का माहौल बनाकर उनकी राजनीतिक भागीदारी कम करना
संभल (Sambhal) में तनाव और हिंसा की घटनाएं, जैसे कि मस्जिद सर्वे के दौरान हुई मौतें या कथित तौर पर पुलिस प्रशासन द्वारा मुस्लिम समुदाय को उकसाने की कोशिशें (जैसा कि मार्च 2025 में एक सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया), मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी को कम कर सकती हैं. अगर लोग डर के माहौल में अपने घर छोड़ने को मजबूर होते हैं, जैसा कि ओवैसी ने दावा किया, तो उनकी वोटिंग में भागीदारी घट सकती है. इससे BJP को उन क्षेत्रों में फायदा हो सकता है जहां मुस्लिम वोट विपक्ष के लिए निर्णायक होते हैं.
*उदाहरण*: 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद यह देखा गया कि मुस्लिम सांसदों की संख्या घटकर 23 हो गई, जो आजादी के बाद सबसे कम थी. यह दिखाता है कि BJP को मुस्लिम वोटों की जरूरत नहीं पड़ती, और वे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण से ही जीत हासिल कर सकते हैं.
5. पसमांदा मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश
बीजेपी ने हाल के वर्षों में पसमांदा मुस्लिमों (पिछड़े मुस्लिम समुदाय) को लुभाने की रणनीति अपनाई है. संभल (Sambhal) जैसे क्षेत्र में तनाव पैदा करके बीजेपी यह संदेश दे सकती है कि वे मुस्लिम समुदाय के “उच्च वर्ग” (जैसे वक्फ बोर्ड से जुड़े लोग) के खिलाफ हैं, जो कथित तौर पर पसमांदा मुस्लिमों का शोषण करते हैं. इससे कुछ पसमांदा मुस्लिम BJP की ओर आकर्षित हो सकते हैं.
*उदाहरण*: 2023 के यूपी नगर निकाय चुनाव में बीजेपी ने 395 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 45 जीते. इनमें से ज्यादातर पसमांदा मुस्लिम थे. यह रणनीति 2024 के लोकसभा चुनावों में भी अपनाई जा सकती है, और संभल में तनाव इस रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
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निष्कर्ष
संभल (Sambhal) में मुस्लिम समुदाय को टारगेट करने से BJP को अल्पकालिक चुनावी फायदा हो सकता है, खासकर हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और विपक्षी वोटों के बंटवारे के जरिए. यह उनकी हिंदुत्व की विचारधारा को मजबूत करने और कोर वोटर बेस को एकजुट करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है. हालांकि, यह रणनीति सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती है और दीर्घकालिक रूप से बीजेपी की समावेशी छवि को नुकसान पहुंचा सकती है.
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संभल में हाल के घटनाक्रम, जैसे मस्जिद सर्वे और हिंसा, इस रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन यह भी सवाल उठता है कि क्या यह रणनीति लंबे समय तक टिकाऊ होगी, खासकर जब सामाजिक सौहार्द और विकास जैसे मुद्दे मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हो रहे हैं.
Last Updated on April 5, 2025 8:01 am