नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर सियासी घमासान शुरू हो गया है. विपक्ष ने इसे अपने नेताओं पर हमला बताया, तो एक दिन बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री का इशारा विपक्षी नेताओं की ओर नहीं था.
रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बताया कि सरकार के मुताबिक ‘दिमागी नक्सल’ किन लोगों को कहा जा रहा है. उन्होंने इस शब्द को माओवाद का समर्थन करने, संविधान को न मानने, अलगाववाद के साथ खड़े होने या पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की कोशिश करने वाले लोगों से जोड़ा.
रिजिजू ने ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा बताई
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा है.
उन्होंने इसके लिए तीन तरह के लोगों का जिक्र किया. उनके मुताबिक, माओवाद का समर्थन करने और भारतीय संविधान को न मानने वाले, अलगाववादियों और अनुच्छेद 370 का समर्थन करने वाले और नॉर्थ-ईस्ट को भारत से अलग करने के लिए ‘चिकन नेक’ काटने की बात करने वाले लोग ‘दिमागी नक्सल’ की श्रेणी में आते हैं.
रिजिजू ने इसके साथ JNU के पूर्व छात्र और कार्यकर्ता शरजील इमाम के पुराने भाषण का वीडियो भी साझा किया. इमाम नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के खिलाफ प्रदर्शनों में सक्रिय रहे थे.
शरजील इमाम के बयान का वीडियो साझा किया
रिजिजू की पोस्ट में साझा किए गए वीडियो में शरजील इमाम कथित तौर पर यह कहते सुनाई देते हैं कि अगर 5 लाख संगठित लोग हों तो भारत और नॉर्थ-ईस्ट के बीच संपर्क को स्थायी रूप से काटा जा सकता है, या कम से कम एक-दो महीने के लिए ऐसा किया जा सकता है.
रिजिजू ने लिखा कि ऐसे लोगों का समर्थन करने वालों को ही ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाता है.
हालांकि, इसी बयान को लेकर राजनीतिक बहस अब और तेज हो गई है कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द की सीमा आखिर कितनी व्यापक है और इसे राजनीतिक विरोध से किस हद तक अलग रखा जा सकता है.
PM @narendramodi ji didn’t say opposition leaders as Dimagi Naxals. Only following are Dimagi Naxals:
1. Who support Maoists and reject Indian Constitution.
2. Who stand with separatists & support Article 370.
4. Who want to cut chicken neck to separate North-East from India.— Kiren Rijiju (@KirenRijiju) August 16, 2026
लाल किले से PM मोदी ने क्या कहा था?
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से दिए भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सामने एक ‘नए दुश्मन’ के रूप में ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र किया था.
प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश में नक्सलवाद को खत्म किया जा चुका है, लेकिन अलग-अलग हिस्सों में ‘दिमागी नक्सल’ मौजूद हैं. उन्होंने इन्हें पहचानने और अलग-थलग करने की जरूरत बताई, ताकि देश के युवाओं को एकजुट करके विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल किया जा सके.
PM मोदी के इस बयान के बाद विपक्ष ने इसे राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने वाला बयान बताया.
कांग्रेस ने PM मोदी पर साधा निशाना
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहले विरोधियों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा जाता था और अब ‘दिमागी नक्सल’ कहा जा रहा है.
उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रधानमंत्री की हताशा को दिखाता है. जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री पर तीखा राजनीतिक हमला करते हुए सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी.
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है.
‘अर्बन नक्सल’ पर सरकार पहले क्या कह चुकी है?
‘दिमागी नक्सल’ की नई बहस के बीच सरकार के पुराने जवाबों का भी जिक्र हो रहा है.
साल 2020 में तत्कालीन राज्यसभा सांसद के.जे. अल्फोंस ने सरकार से पूछा था कि ‘अर्बन नक्सली’ कौन हैं और उनके खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई की जा रही है?
तत्कालीन गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने संसद में कहा था कि गृह मंत्रालय ‘अर्बन नक्सलाइट्स’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करता.
उन्होंने कहा था कि सरकार की राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना वामपंथी उग्रवाद यानी Left Wing Extremism के सभी रूपों से निपटती है, जिसमें शहरी गतिविधियां भी शामिल हैं.
फरवरी 2022 में भी सरकार ने राज्यसभा में कहा था कि वह ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करती. The Hindu की रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में कहा था कि शहरी क्षेत्रों या किसी अन्य स्थान पर वामपंथी उग्रवाद के संदर्भ में सरकार इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करती.
‘सवाल पूछने वाले युवाओं को नक्सली बता रहे हैं’
NEET पेपर लीक और परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर चुके Cockroach Janta Party (CJP) ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल उठाया.
CJP प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि सिर्फ सरकार से सवाल पूछने वाले शिक्षित युवाओं को ‘नक्सली’ बताना सही नहीं है. उन्होंने इसे सरकार की समस्याओं को हल करने में कथित नाकामी और अहंकार से जोड़ा.
“Dimagi Naxal” or whatever is not going to work, Prime Minister. How could you loosely brand educated young people “naxalis” etc? Just because they question your government? Sheer arrogance! Sheer incompetence at resolving their problems!
Bells are ringing. The awakening is… https://t.co/DHuGkhWrGN
— Saurav Das (@SauravDassss) August 15, 2026
उनके मुताबिक, युवाओं की आवाज को ऐसे शब्दों से दबाया नहीं जा सकता.
‘वंदे मातरम्’ विवाद में BJP ने फिर इस्तेमाल किया ‘दिमागी नक्सल’
इस बीच रविवार को BJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘वंदे मातरम्’ विवाद को लेकर विपक्ष पर निशाना साधते हुए फिर ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया.
BJP ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् के गायन को बीच में रोकने की कोशिश की. कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मांग रही थीं, क्योंकि वह काफी देर से खड़े थे.
प्रदीप भंडारी ने सवाल उठाया कि क्या कोई देशभक्त व्यक्ति, जो संविधान और तिरंगे का सम्मान करता है और देश की संप्रभुता व अखंडता में विश्वास रखता है, स्वतंत्रता दिवस पर वंदे मातरम् के गायन से नाराज हो सकता है?
उन्होंने कहा कि ऐसा केवल ‘दिमागी नक्सल इकोसिस्टम’ की मानसिकता रखने वाले लोग कर सकते हैं.
शब्द नया है, विवाद पुराना
‘दिमागी नक्सल’ पर शुरू हुई बहस अब सिर्फ एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं रह गई है. एक तरफ सरकार इसे माओवाद, अलगाववाद और देश की अखंडता के खिलाफ गतिविधियों से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या सरकार के आलोचकों और विरोधियों को ऐसे लेबल देना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा होना चाहिए.
असल सवाल यही है कि ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा को कितना स्पष्ट और सीमित रखा जाएगा? क्या यह शब्द सिर्फ हिंसा, माओवाद और अलगाववाद का समर्थन करने वालों तक सीमित रहेगा, या आने वाले दिनों में यह राजनीतिक विरोधियों के लिए एक नया सियासी लेबल बन जाएगा?
Last Updated on August 17, 2026 10:59 am
