AIIMS Fatty Liver Warning: लीवर से जुड़ी बीमारी ‘फैटी लीवर’ कैंसर का कारण बन सकती है. AIIMS के डॉक्टरों ने इसको लेकर चेतावनी जारी की है. डॉक्टरों का कहना है कि यह बीमारी शराब के सेवन से भी अधिक जानलेवा है. आखिर फैटी लीवर क्या है? किस प्रकार कैंसर जैसी जनलेवा बिमारी को जन्म देता है? जानिए.
AIIMS के डॉक्टरों ने क्या दी चेतावनी?
पिछले दशक में वैक्सीनेशन और बेहतर दवाओं की वजह से हेपेटाइटिस B और C का बोझ कम हुआ है, लेकिन नई दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के डॉक्टरों ने मंगलवार को कहा कि देश में सिरोसिस और लिवर कैंसर के सबसे बड़े कारणों के तौर पर फैटी लिवर की बीमारी और शराब से होने वाला नुकसान, वायरल हेपेटाइटिस से आगे निकल रहे हैं.
हर साल 28 जुलाई को मनाए जाने वाले ‘वर्ल्ड हेपेटाइटिस डे’ पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में AIIMS के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट ने कहा कि बदलती जीवनशैली भारत में लिवर की बीमारी की एक नई महामारी पैदा कर रही है. हेपेटाइटिस लिवर में सूजन है और यह वायरस, शराब, कुछ दवाओं या ऑटोइम्यून बीमारियों के कारण हो सकता है. हेपेटाइटिस A और E आमतौर पर कम समय की बीमारी का कारण बनते हैं, जबकि हेपेटाइटिस B और C से क्रोनिक लिवर की बीमारी, सिरोसिस और लिवर कैंसर हो सकता है. हेपेटाइटिस D केवल उन लोगों में होता है जिन्हें हेपेटाइटिस B है.
क्या होता है फैटी लिवर?
फैटी लिवर की बीमारी शरीर के इस अहम अंग में बहुत ज़्यादा फैट जमा होने से होती है. जब यह फैट सूजन का कारण बनता है, तो इससे स्टीटोहेपेटाइटिस नाम का हेपेटाइटिस होता है, जो इलाज न कराने पर सिरोसिस और लिवर कैंसर में भी बदल सकता है.
AIIMS नई दिल्ली में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रमोद गर्ग ने कहा, “भारत में लिवर की बीमारी का पैटर्न बदल रहा है. टीकाकरण और बेहतर इलाज की वजह से हेपेटाइटिस B और C के मामले कम हो रहे हैं, जबकि खराब जीवनशैली के कारण शराब से जुड़ी लिवर की बीमारी और फैटी लिवर तेज़ी से बढ़ रहे हैं.
अच्छी बात यह है कि फैटी लिवर को काफी हद तक रोका जा सकता है और अगर इसका जल्दी पता चल जाए, तो इसे अक्सर ठीक भी किया जा सकता है.” उन्होंने आगे कहा कि फैटी लिवर की बीमारी-जिसे आधिकारिक तौर पर मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) कहा जाता है-मोटापे, डायबिटीज और सुस्त जीवनशैली के कारण तेज़ी से आम होती जा रही है. “इस बीमारी को रोका जा सकता है और इसका इलाज भी संभव है. अगर जल्दी पता चल जाए, तो इसे ठीक भी किया जा सकता है.”
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WHO की रिपोर्ट क्या कहती है?
AIIMS के डॉक्टरों ने कहा कि लगभग 38 प्रतिशत भारतीयों को, जिनमें लगभग 35 प्रतिशत बच्चे शामिल हैं, फैटी लिवर की बीमारी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 304 मिलियन लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस B या C संक्रमण के साथ जी रहे हैं, जिससे हर साल लगभग 1.3 मिलियन लोगों की मौत होती है. दुनिया के वायरल हेपेटाइटिस के बोझ का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा भारत में है, जहाँ अनुमानित 40 मिलियन लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस B और 6 से 12 मिलियन लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस C के साथ जी रहे हैं.
AIIMS के प्रोफेसर ने क्या कहा?
AIIMS में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. शालिमार के अनुसार, इलाज में हो रही तरक्की वायरल हेपेटाइटिस के प्रति नज़रिए को बदल रही है. उन्होंने कहा, “हेपेटाइटिस B वायरस के लिए हमारे राष्ट्रीय कार्यक्रम में वैक्सीन उपलब्ध है. इसकी पहली डोज़ जन्म के 12 से 24 घंटे के अंदर दी जाती है. अगर अगली दो डोज़ एक महीने और छह महीने पर दी जाएं, तो हेपेटाइटिस B से 95 प्रतिशत से ज़्यादा सुरक्षा मिलती है. इसलिए, अगर तीनों डोज़ लग जाएं, तो आप निश्चिंत हो सकते हैं कि आपको हेपेटाइटिस B का इन्फेक्शन नहीं होगा.”
उन्होंने बेपिरोविरसेन (bepirovirsen) के हालिया इंटरनेशनल फेज़ III क्लिनिकल ट्रायल का भी ज़िक्र किया. यह दवा UK की GSK और US की आयोनिस फार्मास्यूटिकल्स ने मिलकर बनाई है. ट्रायल में पता चला कि लगभग हर पांच में से एक मरीज़ को हेपेटाइटिस बी से “फ़ंक्शनल क्योर” (functional cure) मिला, जिसे डॉक्टर ऐसा कहते हैं.
शालिमार ने कहा, “हमें उम्मीद है कि यह दवा जल्द ही भारत में उपलब्ध होगी.” उन्होंने नए इन्फेक्शन को कम करने का श्रेय भारत के ‘यूनिवर्सल इम्यूनाइज़ेशन प्रोग्राम’ को भी दिया, जिसके तहत नवजात शिशुओं को हेपेटाइटिस बी का टीका मुफ़्त में लगाया जाता है.
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क्यों बदलता है बीमारी का स्वरूप?
इन फ़ायदों के बावजूद, डॉ. शालिमार ने कहा कि देश में लिवर की बीमारी का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसकी मुख्य वजह अस्वस्थ जीवनशैली है. “शारीरिक गतिविधि कम हो गई है, लोग ज़्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाना खा रहे हैं और शराब का सेवन भी बढ़ गया है. यही मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से भारत में लिवर की बीमारी का स्वरूप बदल रहा है.”
उन्होंने लोगों को सलाह दी कि वे रोज़ाना 30 से 45 मिनट तक कसरत करें, चीनी और रिफ़ाइंड कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करें, पैक्ड अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाने से बचें और शराब का सेवन सीमित रखें. उन्होंने यह भी बताया कि जैविक रूप से महिलाएं शराब से होने वाले लिवर के नुकसान के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होती हैं क्योंकि वे शराब को अलग तरह से मेटाबोलाइज़ करती हैं और पुरुषों की तुलना में कम मात्रा में शराब पीने पर भी उन्हें लिवर की क्षति हो सकती है.
भारत में, लिवर सिरोसिस का मुख्य कारण शराब है, जिससे लगभग 43 प्रतिशत मामले होते हैं. इसके बाद वायरल हेपेटाइटिस (18 प्रतिशत) और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिज़ीज़ (14 प्रतिशत) का नंबर आता है. शराब और फैटी लिवर से जुड़े सिरोसिस के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, और हालिया अध्ययनों से यह भी पता चला है कि फैटी लिवर डिज़ीज़ के कारण लिवर कैंसर के मामलों में भी वृद्धि हुई है.
कई मरीज़ों को लिवर की बीमारी का पता नहीं होता
सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि क्रोनिक हेपेटाइटिस और फैटी लिवर की बीमारी अक्सर गंभीर स्टेज तक पहुँचने पर भी बिना किसी लक्षण के रहती है. डॉ. शालिमार ने कहा, “क्रोनिक हेपेटाइटिस में अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखते. कई मरीज़ों में बीमारी का पता तब चलता है जब रूटीन ब्लड टेस्ट में लिवर एंजाइम का लेवल बढ़ा हुआ मिलता है.” उन्होंने ज़्यादा जोखिम वाले लोगों की स्क्रीनिंग की सलाह दी, जिनमें हेल्थकेयर वर्कर, ड्रग्स का इंजेक्शन लेने वाले लोग, कई सेक्स पार्टनर वाले लोग, ब्लड ट्रांसफ्यूजन कराने वाले, गर्भवती महिलाएँ और हेपेटाइटिस B के मरीज़ों के परिवार के सदस्य शामिल हैं.
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प्रोफेसर डॉ. गोविंद मखारिया ने क्या बताया?
गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. गोविंद मखारिया ने एक आसान उदाहरण से समझाया कि फैटी लिवर की समस्या इतनी आम क्यों होती जा रही है. “लिवर एक बैंक की तरह है. अगर आप कैलोरी जमा करते रहते हैं लेकिन उन्हें कभी खर्च नहीं करते, तो फैट जमा होता रहेगा.”
डॉ. गर्ग ने कहा कि ज़्यादा चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट फैटी लिवर के मुख्य कारण हैं. उन्होंने लोगों को सलाह दी कि वे फलों के जूस के बजाय साबुत फल खाएँ, फाइबर का सेवन बढ़ाएँ और दालें, अनाज, सब्ज़ियाँ, दूध, दही और नट्स ज़्यादा खाएँ. “ज़्यादातर लोग संतुलित शाकाहारी डाइट से अपनी प्रोटीन की ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं. आमतौर पर प्रोटीन सप्लीमेंट्स पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं होती.”
वहीं, डॉ. मखारिया ने इस पुरानी धारणा को चुनौती दी कि सिरोसिस को ठीक नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा, “पहले हमारा मानना था कि सिरोसिस एक ऐसी बीमारी है जो आखिरी स्टेज की होती है और जिसे बदला नहीं जा सकता. आज हम जानते हैं कि अगर हम बीमारी की असल वजह का इलाज करें-चाहे वह हेपेटाइटिस C हो, शराब का सेवन हो, फैटी लिवर हो या ऑटोइम्यून बीमारी हो-तो लिवर काफी हद तक ठीक हो सकता है.”
Last Updated on July 29, 2026 2:37 pm
