Santhali Film Angel: झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के एक छोटे से आदिवासी गांव में पले-बढ़े रवि राज मुर्मू बचपन में अपने माता-पिता और दादा-दादी से संथाली लोककथाएं सुना करते थे. इन कहानियों में जंगल, नदियां, आत्माएं (बोंगा) और प्रकृति से जुड़ी कई बातें होती थीं. यही कहानियां आज उन्हें देश के सबसे बड़े फिल्म सम्मान तक ले आई हैं.
33 वर्षीय संथाली फिल्ममेकर रवि राज मुर्मू को उनकी 12 मिनट की संथाली शॉर्ट फिल्म ‘अंगेन’ के लिए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर’ का अवॉर्ड मिला है. संथाली भाषा की किसी फिल्म को पहली बार यह सम्मान मिला है. आदिवासी भाषा में बनी यह दूसरी फिक्शन फिल्म है जिसे नेशनल अवॉर्ड दिया गया है.
‘अंगेन’ का क्या मतलब है?
संथाली शब्द ‘अंगेन’ का मतलब ऐसी चीज से है जो मौजूद तो है, लेकिन धीरे-धीरे लोगों की नजरों से ओझल होती जा रही है. इसे “अदृश्य”, “अनदेखा” या “गायब” जैसी भावना से समझा जा सकता है.
गांव की कहानियों से शुरू हुआ सफर
रवि राज मुर्मू ने गांव में पढ़ाई करने के बाद जमशेदपुर से मास कम्युनिकेशन किया. इसके बाद उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में 2016 से 2019 तक एडिटिंग की पढ़ाई की.
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मुंबई में नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो और जियोसिनेमा जैसे OTT प्लेटफॉर्म के प्रोजेक्ट्स और विज्ञापनों पर काम किया. लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि उनकी असली पहचान उनके गांव और आदिवासी समाज की कहानियों में है. इसलिए उन्होंने उन्हीं विषयों पर फिल्में बनाने का फैसला किया.
7 साल तक लिखी स्क्रिप्ट
रवि पहले ‘अंगेन’ को एक फीचर फिल्म बनाना चाहते थे. उन्होंने करीब सात साल तक इसकी स्क्रिप्ट लिखी, लेकिन फंडिंग नहीं मिलने के कारण इसे शॉर्ट फिल्म के रूप में बनाया.
उनका कहना है कि फीचर फिल्म बनाने के लिए बड़ी रकम की जरूरत थी और प्रोड्यूसर नहीं मिले. इसलिए पहले शॉर्ट फिल्म बनाई, ताकि लोग इसकी कहानी और संभावनाओं को समझ सकें.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म एक बांसुरी वादक सुक्कू की कहानी है. उसकी बांसुरी की धुन से आत्माओं की दुनिया में रहने वाली एक देवी आकर्षित हो जाती है. पानी के जरिए सुक्कू उस दूसरी दुनिया में पहुंच जाता है, लेकिन बाद में उसे एहसास होता है कि उसकी असली जगह उसका अपना गांव है. इसके बाद वह अपने घर लौटने की तलाश शुरू करता है. फिल्म का अंत जानबूझकर खुला छोड़ा गया है क्योंकि रवि इस कहानी पर आगे फीचर फिल्म भी बनाना चाहते हैं.
फिल्म का थीम क्या है?
यह फिल्म सिर्फ एक लोककथा नहीं है. इसमें दिखाया गया है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण जंगल, नदियां और आदिवासियों की संस्कृति धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है.
फिल्म में पानी को दो दुनिया के बीच जोड़ने वाले माध्यम के रूप में दिखाया गया है. रवि का कहना है कि विज्ञान भी मानता है कि जीवन की शुरुआत पानी से हुई थी, इसलिए उन्होंने इसे खास प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया.
रवि को कब आया मिला फिल्म का विचार?
रवि बताते हैं कि पुणे से पढ़ाई पूरी कर जब वे अपने गांव लौटे तो गालूडीह बस स्टैंड और आसपास का इलाका इतना बदल चुका था कि वे उसे पहचान नहीं पाए. तभी उन्हें एहसास हुआ कि अगर आदिवासी समाज की कहानियों को अभी रिकॉर्ड नहीं किया गया, तो वे हमेशा के लिए खो सकती हैं.
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दोस्तों की मदद से बनी फिल्म
कम बजट में बनी इस फिल्म को रवि ने अपने दोस्तों और थिएटर कलाकारों की मदद से पूरा किया. फिल्म में NSD से पढ़े जितराय हांसदा, रामचंद्रन मार्डी और सलोनी सोरेन ने अहम भूमिकाएं निभाई हैं.
अब फीचर फिल्म की तैयारी
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने के बाद रवि राज मुर्मू अपनी पहली फीचर फिल्म पर दोबारा काम शुरू कर चुके हैं. उन्हें उम्मीद है कि इसकी शूटिंग जल्द शुरू होगी. रवि का मानना है कि यह पुरस्कार सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि उन आदिवासी भाषाओं और कहानियों की जीत है जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के सिनेमा में जगह नहीं मिली. उनका कहना है कि अब समय आ गया है कि आदिवासी समाज अपनी कहानियां खुद दुनिया को सुनाए.
Last Updated on July 22, 2026 11:04 am
