‘Satluj’ फिल्म से छिड़ गई बहस, Amit Shah से पंजाब में ‘Truth Commission’ की मांग

Satluj Film Controversy: सतलुज को हटाए जाने के बाद पंजाब की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है. यहां बीजेपी नेता वनीत सिंह बिट्टू कमीशन बनाने की मांग का समर्थन किया है.

‘Satluj’ फिल्म से छिड़ गई बहस, Amit Shah से पंजाब में ‘Truth Commission’ की मांग
‘Satluj’ फिल्म से छिड़ गई बहस, Amit Shah से पंजाब में ‘Truth Commission’ की मांग

Satluj Film Controversy: फिल्म ‘सतलुज’ को हटाए जाने को लेकर मचे भारी विवाद के बीच, पंजाब के कुछ राजनीतिक और धार्मिक नेता प्रदेश में एक “सत्य आयोग” (ट्रुथ कमीशन) बनाने की मांग कर रहे हैं. इसका मकसद 1981 से 1995 के दौरान राज्य में उग्रवाद के दौर में मारे गए लोगों की संख्या पर चल रही बहस को सुलझाना है.

हजारों लोगों की मौत का हिसाब मांगने वालों में परमजीत कौर खालरा भी शामिल हैं. वह मानवाधिकार कार्यकर्ता स्वर्गीय जसवंत सिंह खालरा की पत्नी हैं, जिनकी जिंदगी पर ‘सतलुज’ फिल्म बनी है. जसवंत सिंह खालरा की 1995 में गैर-कानूनी पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई थी.

बीजेपी नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जो पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं. बीजेपी नेता बिट्टू ने “पीपल्स कमीशन” (जन आयोग) की मांग का समर्थन किया है, लेकिन इस शर्त के साथ कि “गंवाई गई हर जान” को गिना जाए.

क्या थी यह मांग?

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर एक स्वतंत्र “सत्य आयोग” के गठन और जसंवत सिंह खालरा की बायोपिक ‘सतलुज’ को OTT प्लेटफॉर्म पर फिर से दिखाने की मांग की. ज्ञानी हरप्रीत के अनुसार, पैनल को आतंकवाद, ज़बरदस्ती गायब करने, गैर-कानूनी हिरासत, हिरासत में मौत, फर्जी मुठभेड़, गैर-कानूनी अंतिम संस्कार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के अन्य कथित मामलों की जांच करनी चाहिए.

साथ ही, इसे पीड़ितों के लिए मुआवज़े, पुनर्वास और मान्यता की सिफारिश करनी चाहिए, संस्थागत कमियों की पहचान करनी चाहिए, जहां ज़रूरी हो वहां राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय करनी चाहिए, और कानूनी व संस्थागत सुधारों का सुझाव देना चाहिए.

आख़िर होता क्या है ट्रुथ कमीशन?

सत्य आयोग, या सत्य और सुलह आयोग, (Truth Commission) आम तौर पर सरकार द्वारा बनाया गया एक अस्थायी निकाय होता है. इसका काम देश के भीतर मानवाधिकारों के उल्लंघन, युद्ध अपराधों या सरकार द्वारा प्रायोजित अत्याचारों की जांच करना होता है.

भारत में राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर कभी भी कोई सत्य आयोग नहीं बनाया गया है. हालांकि, बंटवारे, 1984 के सिख-विरोधी दंगों, कश्मीरी पंडितों के पलायन और 2002 के गुजरात दंगों जैसी घटनाओं की जांच के लिए ऐसे आयोगों की मांग उठती रही है.

ऐसे आयोग गैर-न्यायिक निकाय होते हैं, जिनके पास आम तौर पर किसी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की कानूनी शक्ति नहीं होती है. इनका मुख्य उद्देश्य भविष्य के संदर्भ के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करने हेतु बयान दर्ज करना होता है.

पंजाब के लिए ‘ट्रुथ कमीशन’ की मांग क्यों की जा रही है?

इस मांग के उठने के पीछे सतलुज से जुड़ी वह बहस है जो पुलिस द्वारा कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर शुरू हुई थी, और साथ ही उस बहस को लेकर भी है जिसमें उग्रवादियों द्वारा मारे गए आम नागरिकों, पुलिसकर्मियों, सुरक्षा कर्मियों और हिंदुओं की संख्या पर चर्चा हो रही है. दोनों तरफ से आंकड़े सामने आ रहे हैं, लेकिन उनकी कोई पुष्टि नहीं हुई है.

जसवंत खालरा और बाद में उनकी पत्नी परमजीत खालरा ने हमेशा यह आरोप लगाया है कि उग्रवाद के दौर में पंजाब पुलिस ने कम से कम 25,000 लोगों को या तो “गायब” कर दिया या उनकी लाशों का “बिना पहचान के अंतिम संस्कार” कर दिया. अकेले अमृतसर ज़िले में ऐसी 2,097 लाशों के बारे में दी गई उनकी जानकारी की CBI ने जांच की और उसे सही पाया.

बिट्टू, जिनके दादा की हत्या उग्रवादियों ने कर दी थी, ने इस आंकड़े पर सवाल उठाए हैं और फ़िल्म की आलोचना की है क्योंकि इसमें उग्रवादियों द्वारा हिंदुओं और अन्य नागरिकों की हत्याओं को नहीं दिखाया गया है.

सीनियर वकील फुलका ने कहा कि पंजाब में उग्रवाद के दौर की हिंसा कई पक्षों से जुड़ी थी और सभी मौतों का रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि एक ‘ट्रुथ कमीशन’ से उन लोगों के बारे में सही जानकारी सामने लाने में मदद मिलेगी जिनकी मौत उग्रवादियों या पुलिस के हाथों हुई थी.

Last Updated on July 15, 2026 7:23 pm

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