BJP पश्चिमी यूपी में नए समीकरण तलाश रही है, RLD के साथ रिश्ते अंतिम पड़ाव पर?

– के. पी. मलिक
मथुरा के विधायक और योगी सरकार में मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण का हालिया बयान न केवल राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के भीतर हलचल पैदा कर गया, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन पर भी नई दरारें खींचता दिख रहा है. उन्होंने साफ़ कहा कि भाजपा-आरएलडी गठबंधन (BJP-RLD Alliance) से फायदे से ज्यादा नुकसान हुआ और कैराना, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद जैसी सीटें गंवाने का ठीकरा इसी साझेदारी पर फोड़ा. यह बयान यूं ही आया, ऐसा मानना कठिन है.
चौधरी चरण सिंह की सियासी पाठशाला से निकले लक्ष्मीनारायण के लिए रालोद महज़ विरोधी दल नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से एक समय का ‘सहयात्री’ रहा है. ऐसे में उनका यह हमला व्यक्तिगत नाराज़गी से कहीं अधिक गहरी राजनीतिक रणनीति की गंध देता है।
तो क्या इसके मायने यह निकाले जाने चाहिए कि भाजपा अब रालोद से दूरी चाहती है? राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से घूम रहा है कि क्या भाजपा ने लक्ष्मीनारायण को आगे कर रालोद को एक अप्रत्यक्ष संदेश देने की कोशिश की है कि पश्चिमी यूपी में ‘साझेदारी’ अब बोझ बन रही है?
पहला संकेत ये है कि भाजपा को लगता है कि पश्चिमी यूपी के कुछ हिस्सों में आरएलडी के साथ गठबंधन से वोटों का ध्रुवीकरण उल्टा विपक्ष के पक्ष में हुआ। दूसरा चुनावी समीकरणों में अब भाजपा अपने दम पर ताकत आज़माना चाहती है और इसके लिए पुराने सहयोगियों पर कटाक्ष करना एक ‘टेस्ट केस’ हो सकता है।
सवाल है कि इस रणनीति की पटकथा दिल्ली में लिखी गई या लखनऊ में? अंदरखाने की सूचनाएं बताती हैं कि इस बयान का समय और तरीका पहले से तय था। दिल्ली और लखनऊ के बीच हुई राजनीतिक बातचीत के बाद यह हमला उसी ‘पटकथा’ का हिस्सा हो सकता है, जिसमें संदेश सिर्फ रालोद ही नहीं, अन्य छोटे सहयोगियों तक भी पहुंचाना माना जा रहा है कि अब भाजपा की गाड़ी में सवार रहना आसान नहीं है।
अगर पश्चिमी यूपी की सियासी ज़मीन पर नज़र डालें तो वह संवेदनशील है जिसके तहत गन्ना किसानों की राजनीति, जाट-मुस्लिम समीकरण और 2013 के दंगों के बाद बने नए ध्रुवीकरण ने पश्चिमी यूपी को बेहद संवेदनशील बना दिया है। ऐसे में गठबंधन की छोटी-सी दरार भी बड़े चुनावी परिणाम ला सकती है। भाजपा को यह भलीभांति मालूम है कि यहां की हर सीट का असर राज्य और केंद्र, दोनों की राजनीति पर पड़ता है।
बहरहाल लक्ष्मीनारायण का यह बयान केवल एक मंत्री की राय भर नहीं है, यह एक संकेत है। संकेत इस बात का कि भाजपा पश्चिमी यूपी में नए समीकरण तलाश रही है और पुराने साथियों पर दबाव बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अगर आने वाले महीनों में इस तरह के और बयान सामने आए, तो यह मानना कठिन नहीं होगा कि भाजपा-रालोद के रिश्ते अब अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे हैं। और अगर ऐसा हुआ, तो पश्चिमी यूपी की सियासत में एक बार फिर बड़े फेरबदल देखने को मिलेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं.) 

Last Updated on August 12, 2025 9:53 am

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