Indian Tourist: वियतनाम के एक एयरपोर्ट पर कुछ भारतीय पर्यटक गरबा कर रहे थे। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। कुछ लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति का उत्सव बताया। कुछ लोगों ने कहा कि एयरपोर्ट कोई शादी का पंडाल नहीं होता। देखते-देखते बहस गरबा से निकलकर भारतीयों के व्यवहार तक पहुंच गई।
लेकिन यह कहानी सिर्फ एक वीडियो की नहीं है।
यह कहानी उस छवि की है जो दुनिया के अलग-अलग देशों में “भारतीय पर्यटक” शब्द सुनते ही लोगों के दिमाग में बनती जा रही है।
The Print में प्रकाशित अपने लेख में वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी एक असहज सवाल पूछते हैं—क्या भारतीय पर्यटक विदेशों में दुनिया के सबसे अलोकप्रिय पर्यटकों में बदलते जा रहे हैं?
यह सवाल सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारतीय पासपोर्ट धारकों की संख्या बढ़ रही है। हर साल करोड़ों भारतीय विदेश घूमने जाते हैं। भारतीय पर्यटक दुनिया के पर्यटन उद्योग के लिए एक बड़ा बाजार बन चुके हैं।
फिर भी, सोशल मीडिया, ट्रैवल ब्लॉग्स, होटल रिव्यू वेबसाइट्स और कई देशों के स्थानीय चर्चाओं में भारतीय पर्यटकों को लेकर शिकायतें लगातार सुनाई देती हैं।
सवाल है—ऐसा क्यों?
कभी “अग्ली अमेरिकन” हुआ करता था
वीर सांघवी अपने लेख की शुरुआत इतिहास से करते हैं।
1950 और 1960 के दशक में दुनिया में एक शब्द बहुत लोकप्रिय था—“Ugly American”।
इसका मतलब शारीरिक रूप से बदसूरत अमेरिकी नहीं था। इसका मतलब था वह अमेरिकी जो विदेशों में जाकर स्थानीय लोगों को कमतर समझता था, अपनी दौलत का प्रदर्शन करता था और यह मानकर चलता था कि पूरी दुनिया उसके लिए बनी है।
1958 में यूजीन बर्डिक और विलियम लेडरर ने The Ugly American नामक उपन्यास लिखा। किताब अमेरिका की एशियाई कूटनीति की आलोचना थी, लेकिन उसने एक नई सांस्कृतिक पहचान भी गढ़ दी—”अग्ली अमेरिकन”।
धीरे-धीरे यह शब्द दुनिया भर में प्रचलित हो गया।
बाद में ऑस्ट्रेलिया के पर्यटकों को लेकर भी ऐसी धारणाएं बनीं। ब्रिटेन के फुटबॉल हुड़दंगियों ने ब्रिटिश नागरिकों की छवि खराब की। पिछले एक दशक में चीन के कुछ पर्यटकों के व्यवहार को लेकर भी एशिया के कई देशों में शिकायतें सामने आईं।
लेकिन अब बहस यह है कि क्या वही जगह भारतीयों ने ले ली है?
भारतीयों के खिलाफ शिकायतें क्या हैं?
यहां ध्यान देने वाली बात है कि आलोचना का केंद्र भारतीयों की दौलत या शक्ति नहीं है।
आलोचना का केंद्र उनका व्यवहार है।
दुनिया के कई हिस्सों में भारतीय पर्यटकों को लेकर जो शिकायतें बार-बार सामने आती हैं, उनमें कुछ समान बातें दिखाई देती हैं।
1. नियमों को वैकल्पिक समझना
कई ट्रैवल फोरम पर होटल कर्मचारियों और टूर ऑपरेटरों की शिकायत रहती है कि कुछ भारतीय पर्यटक नियमों को सुझाव की तरह लेते हैं।
दो लोगों के लिए बुक किए गए कमरे में पांच या छह लोगों का ठहर जाना।
होटल के नाश्ते को पूरे दिन का भोजन बना लेना।
रेस्टोरेंट में बाहर का खाना ले आना।
स्विमिंग पूल या सार्वजनिक स्थानों के नियमों की अनदेखी करना।
ये शिकायतें सिर्फ एक देश से नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर यूरोप तक कई जगह सुनाई देती हैं।
2. सार्वजनिक स्थानों पर शोर
यदि आप बैंकॉक, बाली, दुबई, सिंगापुर या यूरोप के किसी लोकप्रिय पर्यटन स्थल पर जाएं तो स्थानीय गाइडों की एक सामान्य शिकायत सुनने को मिल सकती है।
कुछ भारतीय समूह सार्वजनिक स्थानों पर अत्यधिक शोर करते हैं।
मेट्रो में ऊंची आवाज में बातें करना।
वीडियो कॉल स्पीकर पर चलाना।
हवाई जहाज में मोबाइल पर वीडियो तेज आवाज में देखना।
यह सब उन समाजों में असामान्य माना जाता है जहां सार्वजनिक शांति को सामाजिक शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है।
3. हर चीज में “जुगाड़”
भारत में जुगाड़ को अक्सर रचनात्मकता माना जाता है।
लेकिन विदेशों में वही जुगाड़ कई बार नियम तोड़ने के रूप में देखा जाता है।
यदि किसी टिकट पर छूट नहीं मिल सकती तो भी छूट की मांग करना।
यदि कोई सुविधा भुगतान वाली है तो उसे मुफ्त में पाने की कोशिश करना।
यदि कोई नियम रास्ते में आ रहा है तो उसे बायपास करने का तरीका ढूंढना।
भारतीय समाज में यह व्यवहार सामान्य लग सकता है, लेकिन कई देशों में इसे अनुचित माना जाता है।
थाईलैंड का मामला क्यों चर्चा में आया?
हाल ही में थाईलैंड ने भारत सहित कुछ देशों के लिए अपनी 60 दिन की वीजा-मुक्त योजना समाप्त कर दी।
सरकार ने इसका सीधा कारण भारतीय पर्यटकों का व्यवहार नहीं बताया।
लेकिन सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में थाई नागरिकों ने भारतीय पर्यटकों को लेकर नाराजगी व्यक्त की।
वीर सांघवी लिखते हैं कि उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ क्योंकि पारंपरिक रूप से थाई समाज भारतीयों के प्रति काफी मित्रवत माना जाता रहा है।
सवाल उठता है कि अगर किसी समाज में भारतीयों के प्रति नकारात्मक भावनाएं बढ़ रही हैं तो उसके पीछे क्या कारण हैं?
क्या भारत का नया आत्मविश्वास समस्या बन रहा है?
लेख का सबसे दिलचस्प हिस्सा यहीं से शुरू होता है।
वीर सांघवी का तर्क है कि पिछले दशक में भारत में राष्ट्रीय आत्मविश्वास तेजी से बढ़ा है।
भारतीय अब खुद को उभरती हुई महाशक्ति के नागरिक के रूप में देखने लगे हैं।
यह अपने आप में बुरी बात नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब आत्मविश्वास धीरे-धीरे अधिकार-बोध (entitlement) में बदल जाता है।
जब व्यक्ति यह मानने लगता है कि नियम दूसरों के लिए हैं, उसके लिए नहीं।
जब वह मानने लगता है कि जहां वह जाएगा, वहां उसकी सुविधा सबसे पहले होनी चाहिए।
यहीं से टकराव शुरू होता है।
सोशल मीडिया ने कैसे बढ़ाई समस्या?
आज से 20 साल पहले किसी भारतीय पर्यटक ने कहीं गलत व्यवहार किया होता तो उसे कुछ दर्जन लोग देखते।
आज वही घटना करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है।
एक वीडियो।
एक रील।
एक ट्वीट।
और पूरी दुनिया उसे देख लेती है।
यानी आज भारतीयों की अंतरराष्ट्रीय छवि सिर्फ सरकार, बॉलीवुड या क्रिकेट नहीं बना रहे।
आम भारतीय भी बना रहे हैं।
लेकिन क्या पूरी तस्वीर यही है?
नहीं।
यहीं सावधानी जरूरी है।
विदेश यात्रा करने वाले करोड़ों भारतीय बेहद शालीन, नियमों का पालन करने वाले और स्थानीय संस्कृति का सम्मान करने वाले होते हैं।
वे किसी विवाद में नहीं पड़ते।
किसी वायरल वीडियो का हिस्सा नहीं बनते।
लेकिन समस्या यह है कि अच्छी खबरें वायरल नहीं होतीं।
बुरी खबरें होती हैं।
इसलिए कुछ घटनाएं पूरी आबादी की छवि बन जाती हैं।
सबसे बड़ा सवाल
वीर सांघवी के लेख का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु अंत में आता है।
वे कहते हैं कि जब अमेरिका को “Ugly American” कहा गया तो आलोचना अमेरिकियों ने ही की।
जब ब्रिटेन में फुटबॉल हुड़दंगियों की समस्या थी तो ब्रिटिश समाज ने खुद उसके खिलाफ अभियान चलाया।
यानी सुधार की शुरुआत आत्ममंथन से हुई।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि आलोचना करने वाला कौन है।
सवाल यह है कि क्या आलोचना में कुछ सच्चाई है?
क्या भारतीय समाज अपनी कमियों पर बात करने को तैयार है?
क्या हम हर आलोचना को भारत-विरोधी, पश्चिम-समर्थक या किसी समुदाय विशेष के खिलाफ साजिश बताकर खारिज कर देंगे?
या फिर एक बार रुककर आईने में देखेंगे?
क्योंकि दुनिया में सम्मान सिर्फ आर्थिक ताकत, परमाणु हथियारों या जीडीपी से नहीं मिलता।
सम्मान इस बात से भी मिलता है कि किसी देश के नागरिक सार्वजनिक जीवन में कैसा व्यवहार करते हैं।
और शायद इसी वजह से यह सवाल सिर्फ पर्यटन का नहीं है।
यह भारत की वैश्विक छवि, नागरिक संस्कृति और सामाजिक परिपक्वता का सवाल भी है।
(यह लेख The Print में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी के लेख “Why have Indian tourists become so unpopular abroad? We need to look into the mirror” में उठाए गए सवालों और तर्कों पर आधारित है।)
Last Updated on June 1, 2026 12:30 pm
