SIR Controversy in Bihar: “ज़िंदा लाश! चुनाव आयोग ने जीते-जी मार दिया मिंटू पासवान”

विश्व दीपक
SIR Controversy in Bihar: कल उदय प्रकाश का ‘मोहनदास’ मिला. बस उसका नाम बदला हुआ था.शक्ल वैसी ही थी. कहानी में भी थोड़ा ट्विस्ट है. इस बार उसका नाम है- मिंटू पासवान
उम्र 41 वर्ष, पेशा- ड्राइविंग. बिहार के आरा जिले का रहना ‘मोहनदास’ उर्फ मिंटू पासवान भारत के चुनाव आयोग के मुताबिक मर चुका है. आयोग के दस्तावेजों में उसका नाम मृत के रूप में दर्ज़ हैं लेकिन वो असल में ज़िन्दा. अब वह अपने ज़िन्दा होने का सबूत लेकर BLO से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चक्कर काट रहा है.
कल मिला तो रुआंसा हो गया. बोला बात सिर्फ वोट की नहीं है बात है पांच किलो राशन की भी. आज मृतक मान कर वोटर लिस्ट से नाम काट दिया, कल लाभकारी योजनाओं से कट जाएगा तो पांच किलो अनाज नहीं मिलेगा. परिवार कैसे चलेगा?
मिंटू का सवाल था कि मेरे जैसे गरीब लोग ही सराकरी दस्तावेजों में क्यों मार दिये जाते हैं? कोई ताकतवर या प्रभुत्वशाली वर्ग का आदमी सरकारी फाइलों में क्यों नहीं मरता?
उसका कहना था कि अगर तफ्तीश की जाए तो बिहार के हर वार्ड में दो-चार ऐसे ज़िंदा लोग मिल जाएंगे जिन्हें भारत के चुनाव आयोग ने जीते जी मार दिया है. अब वो अपने ज़िंदा होने का सबूत लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं.
मिंटू ने यह भी बताया कि एक पैटर्न देखने को मिल रहा है. वो लोग जो सत्ताधारी वर्ग के वोटर हैं उनका नाम नहीं कटा. मिंटू पिछले कई दिनों से काम पर नहीं जा पा रहा क्योंकि उसका वक्त यह साबित करने में बीत रहा है कि वो असल में ज़िन्दा है.
अपने ज़िंदा होने का सबूत लेकर वो सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा. जब योगेंद्र यादव SIR बहस कर रहे थे तब मिंटू कोर्ट रूम में ही था. उसे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद उनका नाम तो वोटर लिस्ट में जुड़ ही जाएगा.
सचमुच?
मिंटू या मिंटू जैसे बहुत से अन्य मृत व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंच पाते अगर सीपीआई एमएल के साथियों ने उनकी मदद नहीं की होती. एमएल ने वोट चोरी के मुद्दे पर बिहार में शानदार काम किया है. उनकी चर्चा कम होती है लेकिन मृत व्यक्तियों को खोजकर उन्हें सबूत के तौर पर पेश करने का काम सबसे पहले एमएल ने ही किया.
गोपालगंज की भोरे विधानसभा सीट में एमएल ने ऐसे लोगों को खोज निकला था जो आयोग की फाइलों में मर चुके थे लेकिन थे ज़िन्दा.
भक्त कहते हैं कि रिकार्ड में ऐसी गड़बड़ियां पहले भी होती रही हैं. सच बात है लेकिन जिस स्केल पर हो रही हैं, जिस संगठित तरीके, SIR के बहाने से हो रही हैं वह अप्रत्याशित है.
मुझे लग रहा है कि मोहनदास की तरह मिंटू पासवान भी अंत में यही बोलेगा – मैं मिंटू पासवान नहीं हूं. न ही मैं ज़िंदा हूं. मुझे मरा समझ कर छोड़ दिया जाए.
लेखक पत्रकार हैं और वर्तमान में नेशनल हेराल्ड में कार्यरत हैं. उनके फेसबुक पेज से… 
डिसक्लेमर: इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता के लिए News Muni ज़िम्मेदार नहीं है.

Last Updated on August 14, 2025 11:11 am

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