Purnia Airport: न दिल्ली की फ्लाइट, न स्थायी टर्मिनल; अधूरे सपने की क़ीमत 75 किसानों ने चुकाई?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने दावा किया कि पूर्णिया एयरपोर्ट (Purnia Airport) का नया टर्मिनल रिकार्ड पांच महीने में तैयार हुआ है। मगर सच यह है कि यह कोई स्थायी टर्मिनल नहीं, बल्कि पोटा केबिन यानी पोर्टेबल टर्मिनल है, जहां आनन-फानन में दो विमानों के संचालन की व्यवस्था की गई है। असली स्थायी टर्मिनल का शिलान्यास तो अभी तक टल गया है और उसके बनने में लंबा वक्त लगेगा। उड़ानें शुरू ज़रूर हुई हैं, लेकिन बिना इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम के—जिसके बगैर घने कोहरे में न विमान उड़ सकेंगे, न उतर पाएंगे। सीधे दिल्ली की फ्लाइट न होना, किसानों की अधिग्रहीत ज़मीन पर विवाद और मुआवज़े की अधूरी कहानी—इन सबके बीच एयरपोर्ट का उद्घाटन चुनावी जल्दबाजी ज्यादा लगता है, सुविधाजनक कनेक्टिविटी कम।

पूर्णिया एयरपोर्ट (Purnia Airport) का चमकदार गेट अब सीमांचल का नया “सेल्फी पॉइंट” बन चुका है। कोई मोबाइल कैमरे से वीडियो बना रहा है, तो कोई फेसबुक लाइव पर इसे दुनिया को दिखा रहा है। इंडिया टुडे ने इसको लेकर एक रिपोर्ट की है. उन्होंने कई लोगों से बात की. मधेली गांव से आए तनवीर बताते हैं—“अब हमें बागडोगरा, दरभंगा या कोलकाता नहीं भागना पड़ेगा। दिल्ली जाना आसान होगा।”

लेकिन ठीक इसी एयरपोर्ट की दीवार से सटे गोआसी गांव में सन्नाटा है। यहां के संजय कुमार मेहता की आंखें नम हो जाती हैं—“हमारा घर एयरपोर्ट की फेंसिंग के अंदर चला गया। मजबूरी में टीन की छत के नीचे रहना पड़ रहा है। न जमीन बची, न घर।”

67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ। छोटे किसानों की दुनिया उजड़ गई। बुजुर्ग किसान शिवपूजन मेहता कहते हैं—“हमारी आजीविका यही थी। विरोध किया तो हम पर एससी-एसटी एक्ट में केस ठोक दिया गया।” गांव के करीब 75 किसान अब मुआवजे के लिए पटना हाईकोर्ट की शरण में हैं। आरोप है कि उनकी आवासीय जमीन को खेतिहर दिखाकर मुआवजा कम किया गया।

किसानों का दर्द एक तरफ है, दूसरी तरफ वे लोग भी खुश नहीं हैं जिन्होंने सालों तक आंदोलन करके एयरपोर्ट की लड़ाई जीती। विजय कुमार श्रीवास्तव बताते हैं—“हमने दस साल इंतजार किया, तीन साल आंदोलन किया। पर न दिल्ली की सीधी फ्लाइट है, न स्थायी टर्मिनल। क्या इसी के लिए इतना संघर्ष किया?”

फिलहाल एयरपोर्ट से सिर्फ दो उड़ानें भरेंगी—अहमदाबाद और कोलकाता। जबकि यहां के यात्रियों की सबसे बड़ी ज़रूरत है—दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु की सीधी उड़ान।

सिर्फ इतना ही नहीं—एयरपोर्ट में ढाई बजे तक ही वॉच आवर है। यानी इसके बाद कोई विमान नहीं उड़ सकता। ठंड और कोहरे के दिनों में यह बड़ी बाधा बनेगा। जिस टर्मिनल को “रिकॉर्ड पांच महीने में तैयार” बताया गया, वह दरअसल पोर्टा केबिन है। स्थायी टर्मिनल की राह में पर्यावरण मंजूरी अटकी है।

एयरपोर्ट निदेशक दीप प्रकाश गुप्ता से जब किसानों और अधूरे इंतजामों पर सवाल पूछे गए, तो उन्होंने कहा—“मैं नया हूं, इस पर टिप्पणी नहीं कर सकता।”

पूर्णिया एयरपोर्ट चालू हो चुका है—लेकिन यह अधूरा सपना है। एक ओर सीमांचल के लोग “उड़ान” का जश्न मना रहे हैं, तो दूसरी ओर किसान अपनी जमीन, घर और हक के लिए अदालतों की चौखट पर भटक रहे हैं।

मुख्य बातें:

  • ✅ 15 सितंबर को पीएम मोदी ने पूर्णिया एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग का उद्घाटन किया।

  • ✅ चूनापुर एयरफोर्स स्टेशन की पुरानी हवाई पट्टी पर बनाया गया टर्मिनल।

  • ✅ एयरपोर्ट के लिए गोआसी गांव की 67 एकड़ जमीन अधिगृहीत, 75 किसानों की जमीन गई।

  • ✅ कई किसान भूमिहीन हुए, मुआवजा विवाद हाईकोर्ट में लंबित।

  • ✅ किसानों पर एससी-एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज, गंभीर नाराज़गी।

  • ✅ अभी सिर्फ दो उड़ानें: अहमदाबाद और कोलकाता। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु के लिए सीधी फ्लाइट नहीं।

  • ✅ टर्मिनल बिल्डिंग अस्थायी (पोर्टा केबिन), स्थायी निर्माण को पर्यावरण मंजूरी लंबित।

  • ✅ एयरपोर्ट में सिर्फ ढाई बजे तक “वॉच अवर” – ठंड और कोहरे में संचालन प्रभावित होगा।

Last Updated on September 17, 2025 10:20 am

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