‘नौवीं फेल’ Tejashwi Yadav पर तंज से सवाल, ‘पढ़े-लिखे’ नहीं करते जाति, धर्म और भ्रष्टाचार की राजनीति?

प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की सक्रिय राजनीति में एंट्री के साथ ही एक पुराना सवाल फिर से चर्चा में है — क्या राजनीति में सिर्फ पढ़े-लिखे लोगों को जगह मिलनी चाहिए? किशोर ने तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) को ‘नौवीं फेल’ कहकर निशाना साधा, लेकिन इस बयान ने शिक्षा और लोकतंत्र के रिश्ते पर गहरी बहस छेड़ दी है। संविधान में चुनाव लड़ने के लिए कोई शैक्षणिक शर्त नहीं है, फिर भी समाज का एक वर्ग कम पढ़े-लिखे नेताओं को नीचा दिखाता है। क्या यह सोच लोकतंत्र को सीमित नहीं करती? यही सवाल आज राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है।

🔹 प्रशांत किशोर की एंट्री और ‘पढ़े-लिखे नेता’ की बहस

प्रशांत किशोर जब सक्रिय राजनीति में आए, तो उन्होंने जोर-शोर से कहा कि राजनीति में पढ़े-लिखे लोगों को आना चाहिए
आम नागरिक भी अक्सर यही बात दोहराते हैं कि “पढ़े-लिखे लोगों को चुनाव लड़ना चाहिए।”
ये वर्ग अक्सर उन राजनीतिज्ञों को हिकारत की नजर से देखता है जो कम पढ़े-लिखे हैं, और उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करता है।

🔹 तेजस्वी यादव पर निशाना और पढ़े-लिखे लिबरल्स का अनुसरण

प्रशांत किशोर ने अपने लगभग हर बयान में तेजस्वी यादव को नौवीं फेल कहकर आलोचना की।
इस रुख का अनुसरण कई कथित पढ़े-लिखे लिबरल्स ने भी किया।
इससे पहले अरविंद केजरीवाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “चौथी पास राजा” कह चुके हैं।

🔹 “पढ़े-लिखे लोगों को राजनीति में आना चाहिए” — इस सोच में दिक्कत कहाँ है?

  1. संविधान में शिक्षा की कोई शर्त नहीं

    • भारत के संविधान में चुनाव लड़ने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की शर्त नहीं रखी गई

    • संविधान निर्माताओं ने यह निर्णय गहराई से सोच-समझकर लिया था, ताकि हर नागरिक को समान अवसर मिले।

  2. इस सोच से वंचित वर्गों की राजनीति खत्म होती है

    • जब आप कहते हैं कि “पढ़े-लिखे लोगों को राजनीति में आना चाहिए”, तो आप अनजाने में उन करोड़ों लोगों को बाहर कर देते हैं जो सामाजिक या आर्थिक कारणों से पढ़ नहीं पाए।

    • जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि बिहार की 60% आबादी केवल कक्षा 1 से 12 तक पढ़ी है

    • इनमें से अधिकतर दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों के लोग हैं।

    • यानी, पढ़ाई को राजनीति में प्रवेश की शर्त बनाना ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के साथ दोबारा भेदभाव जैसा है।

  3. शिक्षा दूरदर्शिता की गारंटी नहीं है

    • पढ़े-लिखे होना जरूरी नहीं कि व्यक्ति दूरदर्शी, ईमानदार या सहिष्णु भी हो।

    • सोशल मीडिया पर कई पढ़े-लिखे लोग साम्प्रदायिक, बहुजन विरोधी और महिला विरोधी विचार रखते हैं।

    • कई उच्च शिक्षित सिविल सर्वेंट्स भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं।

🔹 शिक्षित होना श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं

इसलिए, हे पढ़े-लिखे लोगो —
राजनीति में पढ़े-लिखों को आने का आग्रह करना और कम पढ़े-लिखों का मज़ाक उड़ाना
आपके शिक्षित होने की मुनादी नहीं, बल्कि आपके भीतर के दंभ और श्रेष्ठता मनोवृत्ति को दर्शाता है।

Journalist Umesh K. Ray के इनपुट के साथ…

Last Updated on November 12, 2025 1:21 pm

Related Posts