‘भारत शिक्षित-सूटबूट में लैपटॉप पकड़ा हुआ एक कबीलाई समाज, प्रोग्रेसिव ना समझें’

वेलकम पीके (Prashant Kishor), वेलकम टू हार्ड रियलिटीज!! जनसुराज (Jansuraj) का कैम्पेन इस बार महागठबंधन या एनडीए से ज्यादा फॉलो किया। इसमे कुछ पीके (PK) में मेरी रुचि का योगदान था। और कुछ मीडिया द्वारा बड़े पैमाने पर परोसे गए उनके इंटरव्यूज और बाइट्स का भी। कैम्पेन दर्शनीय था, श्रवणीय था, खूबसूरत था। जो हम सुनना चाहते है आज की राजनीति में- गांधी का नाम, सर्वधर्म समभाव, करप्शन पर वार, वंशवाद का विरोध, रोजगार, आर्थिक प्रश्न, पलायन, शिक्षा स्वास्थ्य.. पीके ने सब कहा।

अकेले लड़े सारी सीटो पर। जनता के बीच से “आम” उम्मीदवार दिए। गोदी मीडिया की ठुकाई कर, खूब तालियां बटोरी। शराबबंदी को स्कैम कहने की हिम्मत की। मय सबूत,विरोधियो को यूं घेरा, कि वे चूं करने की हालत में न थे। तो पीके ने वैसा चुनाव लड़ा, जो हम जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी, कांग्रेस या राजद को लड़ते देखना चाहते है

रिजल्ट- जीरो बटे सन्नाटा!!

उन्हें 3% वोट मिलने की खबर है। 99% उम्मीदवारो की जमानत जप्त हो गयी।

पॉलीटकल कंसल्टेंट के तौर पर जो रणनीतियां औरो के लिए कारगर रहीं, वही खुद उनको परिणाम न दे सकी। अब यहां हार्डकोर संगठन और, दबंग कमीनो को साथ रखने की औरो की मजबूरी समझ आती है।

हम अभी भी मध्ययुगीन फ़्यूडल सोसायटी हैं। शक्तिशाली से डरने, प्रेम करने, उसे समर्पण और समर्थन देने की आदत है। अपना घोड़ा जीतते देखना चाहते है, और जीतने वाले को अपना घोड़ा घोषित करते हैं।

यहां विजन, समाज या आर्थिकी, विचार बिंदु नही- बरियारी है। हिन्दू को मुसलमान पर, ब्राह्मण को हिन्दुओ पर, ठाकुर को वैश्य शूद्र पर, और शूद्र को अपने से नीचे वाले शूद्र पर वर्चस्व चाहिए।

देशव्यापी बीमारी है ये। वोक्कालिगा को लिंगायत और लिंगायत को वोक्कालिगा पर प्रभुत्व चाहिए। नगा को कुकी पर, कुकी को मैतेई पर चाहिए। भारत मूलतः शिक्षित, सूटबूट में लैपटॉप पकड़ा हुआ एक कबीलाई समाज है।

हम इसे प्रोग्रेसिव समझने की भूल करते हैं।

भाजपा नही करती।

वो समाज की सच्चाई जानती है, उसे यूज करती है। फॉल्ट लाइन को गहरा करते हुए वोट लेना, और चुनाव जीतना आसान है। लेकिन जोड़ने की कोशिश, एक लंबा, दुखदाई और अक्सर निष्फल प्रयास है।

100 साल पहले, उस महात्मा ने, जो अक्सर पीके के पीछे तस्वीर में लगे दिखते है, इस सच्चाई को स्वीकारने से मना कर दिया था।

वे स्वप्न देखते थे।

जमीनी सच्चाइयों से अलहदा स्वप्न..

– ये देश एक है।

– हिन्दू मुसलमान एक है।

– सब जातियां, सब इंसान बराबर है।

– सबको यहां इज्जत से रहने का हक है।

ये झूठ था। पर गांधी ने मानने से मना कर दिया। जमीनी सचाइयां मानने से इनकार करना, जमीन से कटना कह सकते हैं। लेकिन गांधी ने, इन मायनो में जमीन से कटना ही पसन्द किया। लीडर जनता की कुंठाओ से रोशनी नही लेते।

उन्होंने अपनी रौशनी से इस कुंठित सोसायटी को रौशन किया। नेहरू, मौलाना, सुभाष, शास्त्री और तमाम चेले भी, उन्ही की तरह इस रियलिटी को स्वीकारने से इनकार करते रहे।

वतो गांधी सपने की तरफ .. मंथर ही सही, स्थिर गति से बढ़ता रहा। वो सपना, पूरा नहीं, अधूरा सही, सच हुआ। एक संविधान बना। देश ने अंगीकार किया।

दूसरी धारा ने सामाजिक सच्चाइयों को स्वीकार किया। मिटती दरारों को खोजा। उसे उंगली डालकर चौड़ा किया। नफरत की खरपतवार उगाई। खूब खाद पानी डाला, और अब खरपतवार ही मुख्य फसल हो गयी है।

पीके, या दूसरे जो भी इन रियल्टीज को डिनाय करना चाहते है, मिटाना या घटाना चाहते है। प्रबुद्ध मुद्दों पर बात करते है- वे मौजूदा राजनीति के खेत मे खरपतवार हैं।

हंसी के पात्र हैं। अर्श से बेहद दूर, पीके को इस फर्श से, फिर शुरुआत करनी है।

यह पेड वर्कर्स, मीडिया मैनेजमेंट, फंड मैनेजमेंट, स्ट्रेटजी मैनेजमेंट से नही होगा। पहले अपने अन्तस् की पूंजी चाहिए। आशा है कि उनमे होगी।

मैं उनकी सफलता, उनका सर्वाइवल चाहता हूँ। वे साहसी शख्स है, धारा से विपरीत चलने का माद्दा है। नया सोचने की बुद्धि है। पर शुभेच्छा तब तक, जब तक इसी धारा में– भले 10 चुनाव हारकर–लगातार चलते रहे।

वे इस जाति धर्म की वास्तविकताओ से कटे रहें।

स्वप्न देखे। यक़ीन दिलाएं।

आइडिया ऑफ इंडिया के लिए लड़ें।

पीके की पराजय यह भी बताती है कि टेक्स्टबुक शैली का राजनीतिक प्रयास काफी नही।

सामने वे लोग है, जो जनता की कुंठाओ से फ्यूल लेते है।सत्ता में है, संसाधन से लैस औऱ सिस्टम के किले में सुरक्षित..

और जो जनता की कुंठाओ से लड़कर, उसे नई राह दिखाना चाहते है, उन सबको एक संयुक्त सामाजिक अभियान की जरूरत है। जो आम जन को एजुकेट करे, उसे उसके भय और कुंठाओ में ऊपर उठाएं।

ये काम पीके के अकेले बस का नही। उन्हें दायरा बढाना होगा। विद्वान, प्रबंधक और बेहतर ज्ञान होने के अहंकार से बाहर आना होगा।

वेलकम पीके,

वेलकम टू हार्ड रियलिटीज!

Manish Singh के फेसबुक पेज (@RebornManish ) से…

Last Updated on November 16, 2025 9:42 am

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