– कृष्णा राव
डिवाइड ऐंड रूल 2.0: औपनिवेशिक राजनीति की अधूरी विरासत और नया भारत
‘डिवाइड ऐंड रूल’—इतिहास की कुछ ही पंक्तियाँ इतनी गहरी चुभन छोड़ती हैं। हमारे लिए भारतीयों के लिए यह सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि एक जख्म है। वह जख्म, जिसे अंग्रेज़ों ने धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर समाज को बांटकर और उन दरारों पर राज करके बनाया था।
स्वतंत्रता मिली तो लगा कि इस मानसिकता से मुक्त भी हो गए होंगे। लेकिन सत्तर साल बाद भी एक कड़वा सवाल हमें घूरता है—
क्या भारत सच में बंटवारे की राजनीति से आगे बढ़ गया है, या बस खिलाड़ी बदल गए हैं और खेल वही है?
पुरानी रणनीति के नए ठेकेदार
अंग्रेज़ चले गए, पर बंटवारे के बीज अब हमारे ही हाथों में पनप रहे हैं—
राजनीति, संस्थाएँ, सामाजिक संगठन—सब अपनी-अपनी फ़सल उगा रहे हैं।
आज राजनीति सहमति पर नहीं, खंडन पर चलती है।
जाति बनाम जाति, धर्म बनाम धर्म, क्षेत्र बनाम क्षेत्र, विचारधारा बनाम विचारधारा।
हर पार्टी ने अपनी-अपनी पहचान की मार्केटिंग में महारत हासिल कर ली है।
कोई जातीय समीकरण साधता है, कोई धार्मिक डर को हवा देता है, कोई क्षेत्रीय पीड़ा पर खेलता है।
लक्ष्य एक—समाज को टुकड़ों में बांटो और वोट बैंक को पकड़ो।
सामाजिक पहचान: सत्ता की नई करेंसी
जिस तरह अंग्रेज़ फूट डालकर राज करते थे,
आज की राजनीति फूट बेचकर सत्ता खरीदती है।
हर चुनाव में वही पुराना खेल दोहराया जाता है:
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धार्मिक ध्रुवीकरण
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जातिगत तुष्टीकरण
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क्षेत्रीय गर्व बनाम क्षेत्रीय असंतोष
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संस्कृति के नाम पर manufactured विवाद
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असली मुद्दों—रोज़गार, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, शासन—को किनारे कर भावनाओं को हथियार बनाना
इस माहौल में तर्क मर जाता है,
और भावनात्मक हेरफेर नई शासन नीति बन जाती है।
विभाजन का पूरा इकोसिस्टम
सिर्फ पार्टियाँ ही नहीं।
उनके आसपास का पूरा तंत्र—
मीडिया, इंफ्लुएंसर, धार्मिक मंच, वैचारिक समूह, और सोशल मीडिया—इस आग में घी डालते हैं।
यह समय औपनिवेशिक फरमानों का नहीं,
एलगोरिदम, ट्रेंडिंग हैशटैग और वायरल क्लिप्स का है।
अंग्रेज़ होते तो आज की टेक्नोलॉजी को देखकर हैरान रह जाते—
वही काम, सौ गुना तेजी से।
इसका खामियाज़ा कौन भुगतता है?
बंटा हुआ समाज शासकों को नहीं, जनता को चोट पहुंचाता है।
नतीजा:
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समुदायों के बीच बढ़ती नफ़रत
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अविश्वास की खाई
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संस्थाओं पर घटता भरोसा
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असली मुद्दों से ध्यान भटकना
औपनिवेशिक जमाने की तरह ही
बंटी हुई जनता को चलाना आसान होता है, चुप कराना और भी आसान।
इस चक्र को तोड़ना क्यों ज़रूरी है
भारत हमेशा से विविधताओं का देश रहा है।
लेकिन विविधता तभी ताकत है,
जब उसे हथियार न बनाया जाए।
एकता का मतलब एकरूपता नहीं—
एकता का मतलब असहमति के साथ भी साथ खड़े रहना है।
इस लड़ाई में सिर्फ राजनीतिक दल ही जिम्मेदार नहीं—
हम नागरिक भी उतने ही जवाबदेह हैं।
जब तक हम भावनाओं में फंसकर पहचान की राजनीति को खाद देते रहेंगे,
तब तक यह खेल चलता रहेगा।
आख़िरी सवाल
‘डिवाइड ऐंड रूल’ केवल ब्रिटिश राज की याद नहीं—
यह आज के भारत की सच्चाई है।
और अब बड़ा सवाल यह है:
क्या हम इसे अपना भविष्य बनने देंगे?
या हम समझ पाएंगे कि बंटवारे की राजनीति का असली लाभ किसे मिलता है—
और असली नुकसान किसका होता है?
क्योंकि अगर हमें बार-बार बांटा जा रहा है,
तो हमें यह भी पूछना चाहिए—
हमारे ‘दुश्मन’ कौन हैं—और वे दिखाई क्यों नहीं देते?
लेखक BSF के ex-Spokesperson हैं. उनके एक्स हैंडल से…
Last Updated on December 1, 2025 8:50 am
