Putin’s State Dinner: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में हुआ स्टेट डिनर एक राजनयिक आयोजन से अचानक घरेलू राजनीति का विस्फोटक मुद्दा बन गया है। कारण सिर्फ़ इतना कि देश के दो सबसे बड़े विपक्षी नेता—लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे—को निमंत्रण नहीं दिया गया। इसके उलट कांग्रेस के ही सांसद शशि थरूर को विशेष अतिथियों में शामिल किया गया।
यही वह क्षण था जब कूटनीति का मंच सत्ता की राजनीति का अखाड़ा बन गया और सवाल उठने लगे:
क्या स्टेट डिनर अब सरकार का राजनीतिक उपकरण बन चुका है? क्या भारत की पुरानी संसदीय परंपराएँ खत्म की जा रही हैं? और क्या शशि थरूर का यह निमंत्रण स्वीकार करना “तटस्थ विशेषज्ञता” है या सत्ता की रणनीति का हिस्सा?
सरकार का रवैया सवालों के घेरे में: लोकतंत्र में विपक्ष से दूरी क्यों?
राष्ट्रपति भवन का स्टेट डिनर किसी सरकार का निजी कार्यक्रम नहीं होता। यह राष्ट्र की मेजबानी होती है, सत्ता की नहीं।
पर इस बार नज़ारा बिल्कुल अलग था।
राहुल गांधी और खड़गे को बाहर रखना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सीधा हमला कहा जा रहा है।
कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने इसे “विचित्र” कहा, राजदीप सरदेसाई ने इसे “ध्रुवीकरण का खतरनाक संकेत” बताया और पवन खेड़ा ने साफ कहा:
“क्या थरूर को चल रहे ‘खेल’ का अंदाज़ा नहीं है?”
सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि परंपरा यह रही है कि विदेशी अतिथियों की मेजबानी में विपक्ष के नेता स्वतः शामिल होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी हो या मनमोहन सिंह—हर शासन में यह परंपरा कायम रही।
लेकिन मोदी सरकार ने पहली बार इस परंपरा को किनारे कर दिया।
यह सिर्फ विरोधियों को दूर रखना नहीं है—
यह लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करने का संकेत है।
परंपरा क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की विदेश नीति तीन स्तंभों पर टिकती है:
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स्थिरता,
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निरंतरता,
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सर्वदलीय सहभागिता।
जब आप विपक्ष को विदेश नीति की मेजबानी से बाहर कर देते हैं, तो यह संदेश जाता है कि भारत की कूटनीति भी दलगत है।
वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन झा आज़ाद ने भी कहा:
“लोकतंत्र की मांग है कि विपक्ष के नेता को स्टेट डिनर में बुलाया जाए।”
ऐसे आयोजनों में विपक्ष की मौजूदगी सिर्फ रस्म नहीं होती—
यह दुनिया को दिखाती है कि भारत सरकार नहीं, भारत राज्य बोल रहा है।
परंपरा टूटने के नुकसान गंभीर हैं:
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विदेश नीति में सत्तावादी छवि बनती है।
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वैश्विक मंचों पर राष्ट्रीय सहमति कमजोर दिखती है।
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विदेशी नेताओं के सामने एकतरफा राजनीति का संकेत जाता है।
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देश के भीतर विपक्ष को और अधिक हाशिये पर डालने की प्रवृत्ति मजबूत होती है।
शशि थरूर का जाना: क्या यह ‘विशेषज्ञ’ की भूमिका है या सत्ता का संदेश?
सबसे विवादित तत्व यही है—
जब विपक्ष के शीर्ष नेता को नहीं बुलाया गया, तब शशि थरूर को न्योता क्यों?
बीजेपी की दलील रही—
“थरूर विदेश मामलों की स्थाई समिति के प्रमुख हैं, इसलिए योग्य हैं।”
लेकिन सवाल बड़ा है:
क्या योग्यता सिर्फ़ थरूर तक सीमित थी? क्या नेता प्रतिपक्ष अयोग्य हैं?
कांग्रेस के भीतर से उठे स्वर और तीखे थे:
पवन खेड़ा ने कहा:
“जब मेरे नेता आमंत्रित नहीं और मैं आमंत्रित हूं, तो मुझे समझना चाहिए कि खेल क्या है।”
यह टिप्पणी बताती है कि कांग्रेस में थरूर पर अविश्वास बढ़ रहा है।
थरूर ने निमंत्रण स्वीकार कर कि क्या संदेश दिया?
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क्या वह पार्टी लाइन से ऊपर खड़े हैं?
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क्या वह सत्ताधारी पक्ष के संकेत पढ़ रहे हैं?
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क्या वह विदेशी नीति के मंच का उपयोग अपनी व्यक्तिगत छवि के लिए कर रहे हैं?
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क्या यह पार्टी नेतृत्व से बढ़ती दूरी का प्रतीक है?
खुद थरूर ने कहा:
“मुझे नहीं पता कि निमंत्रण किस आधार पर दिया गया… पर मैं जाऊंगा।”
यही बयान आलोचकों को और संदेह देता है—
कि थरूर को उनके ‘उदार चरित्र’ के कारण सत्ता अपनी रणनीति में एक उपयोगी तत्व मानती है।
विपक्ष को न बुलाना क्यों नुकसानदेह है?
यह मसला सिर्फ कांग्रेस का नहीं है—
यह भारत के लोकतंत्र के स्वास्थ्य का मसला है।
1. विदेश नीति में असंतुलन
भारत की विदेश नीति सदैव सर्वदलीय सहमति का परिणाम रही है।
नेहरू से वाजपेयी तक—हर सरकार विदेश नीति को दलगत राजनीति से ऊपर रखती थी।
विपक्ष की गैर-मौजूदगी भारत को एक पार्टी-राष्ट्र की तरह दिखाती है।
2. रूस-भारत संबंधों का गलत संदेश
रूस भारत का दशकों पुराना रणनीतिक साझेदार है।
ऐसे देश के प्रतिनिधि को एकतरफा राजनीतिक माहौल दिखाना असहज संदेश देता है।
3. भविष्य में संवाद के दरवाज़े बंद होना
जब विपक्ष को इस स्तर पर दूर रखा जाएगा, तो भविष्य में वह विदेश नीति पर सहयोग देने में उतना इच्छुक नहीं होगा।
4. सत्तावादी छवि को और मजबूती
राहुल गांधी का हालिया आरोप— कि सरकार विदेशी मेहमानों को उनसे न मिलने की सलाह देती है—
ऐसे कदमों से और पुष्ट होता दिखता है।
5. लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण
राष्ट्रपति भवन देश का संवैधानिक केंद्र है, न कि किसी पार्टी का कार्यक्रम स्थल।
पर इस आयोजन ने वही संदेश दिया जो आलोचक लंबे समय से कहते आए हैं—
कि संस्थाएँ धीरे-धीरे सरकार के राजनीतिक विस्तार में बदल रही हैं।
कांग्रेस के भीतर आग: थरूर पर बढ़ते सवाल
सोशल मीडिया पर भी थरूर की भूमिका चर्चा में है।
पूर्व TMC सांसद जवाहर सरकार का व्यंग्यपूर्ण तीर सीधे थरूर पर था:
“अगर असहमत हैं तो पार्टी छोड़ दें—मैंने ऐसा किया था।”
यानी थरूर को “दो नावों” की राजनीति छोड़ने की सलाह दी गई।
थरूर के पुराने ट्वीट—
“जहाँ अज्ञान सुख है, वहाँ बुद्धिमान होना मूर्खता है”—
और हाल की पीएम मोदी की तारीफ ने संदेह को और बढ़ाया है।
क्या यह कूटनीति थी या राजनीति?
डिनर के बाद थरूर की टिप्पणी विदेशी नीति की प्रशंसा से भरी थी, पर असल सवाल अभी भी वही है—
क्या इस आयोजन से भारत की कूटनीति मजबूत हुई, या घरेलू राजनीति और कमजोर?
पुतिन के लिए दिया गया यह स्टेट डिनर शायद कूटनीति का अवसर था,
लेकिन विपक्ष को बाहर रखकर इसे एक एकतरफा राजनीतिक प्रदर्शन में बदल दिया गया।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में कुर्सी बदल सकती है, परंपराएँ नहीं
सरकारें आती-जाती हैं, परंपराएँ बची रहती हैं।
लेकिन जब परंपरा को सत्ता अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ने लगे,
तो लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
इस डिनर में सबसे बड़ा सवाल शशि थरूर, कांग्रेस या राहुल गांधी नहीं हैं।
सबसे बड़ा सवाल है—
क्या भारत की विदेश नीति अब सर्वदलीय नहीं, बल्कि सत्तादलीय हो गई है?
और अगर यह सच है,
तो इसकी कीमत सिर्फ़ विपक्ष नहीं—
पूरा देश चुकाएगा।
Last Updated on December 6, 2025 11:46 am
