– नितिन ठाकुर
The Nazi Boycott of Jewish Businesses: यहूदी शुरू से ही बिज़नेस करने में तेज़ थे। दुनिया भर में फैले थे और जहां होते वहीं अपनी स्किल से छा जाते। इस सबके बावजूद उनके खिलाफ गुस्सा और नफरत, धार्मिक कारणों से बना रहा। धीरे धीरे यूरोप में जब यहूदी विरोध को हिटलर का चेहरा मिला तो वो भी एक्टिव हो गए जो काम धंधों में यहूदियों से पिछड़े थे।
ये लोग इसलिए पीछे थे क्योंकि स्किल में कमज़ोर थे लेकिन उनको हिटलर के दौर में मौका मिला। उन्होंने इस अघोषित नाज़ी नीति को आगे बढ़ाया कि यहूदियों का कोई सामान मत खरीदो, उनकी कोई सेवा मत लो क्योंकि इनका पैसा देश के खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है। कैंपेन ज़बरदस्त सफल रहा।
ये अलग बात है कि शुरू में इससे छोटे व्यापारी प्रभावित हुए, बड़े काफी बाद में। बाकायदा यहूदियों की दुकानों को चिह्नित किया जाता था। उनके मकान-दुकान पर कुछ ना कुछ निशान बना दिया जाता ताकि आम जर्मन को पहचान हो जाए कि इस दुकान या मकान का मालिक यहूदी है। इससे गैर यहूदी व्यापारियों को फायदा मिला।
वो नाज़ी राष्ट्रवाद के पक्के समर्थक बन गए क्योंकि एक तो उन्हें इस आंदोलन का फायदा “सच्चा जर्मन” दिखने में हुआ, दूसरा फायदा उनको कमाई में हुआ। फिर कैंपेन चला कि यहूदी लोग तंत्र मंत्र करते हैं, इनका भरोसा नहीं किया जा सकता, ये जो सामान बेचते हैं उसमें कुछ ना कुछ घालमेल करते हैं। इन अफवाहों को तथ्य बनते देर नहीं लगी।
यहूदी विरोधी माहौल में बहुत से लोग ऐसी बातों को सच मानने के लिए तैयार बैठे थे। जिन कुछ जर्मन्स ने ऐसे माहौल में हवा के साथ बहने से इनकार किया वो “गद्दार” कहलाए गए। यहूदियों के आर्थिक बहिष्कार का असर होना तय था क्योंकि ये कुल जर्मन आबादी का एक फीसद से भी कम थे।
इतनी सी आबादी का डर दिखाकर हिटलर यहूदियों से नफरत में जो मन आ रहा था करता जा रहा था और जनता को लंबे प्रोपेगेंडा के कारण सब न्यायसंगत लगने लगा था।
हिटलर के सत्ता संभालने के छह साल में साठ फीसद यहूदी इस वातावरण से तंग होकर जर्मनी छोड़ गए। जो नहीं जा सके उनमें या तो वो थे जिनके पास देश छोड़ने लायक साधन ना थे या फिर वो जो बीमार-बूढ़े-लाचार थे।
आइंस्टीन से लेकर नोबेल विजेताओं तक ने मुल्क छोड़े जिनमें कलाकार और वैज्ञानिक थे। चर्चित डिप्लोमेट किसिंजर के माता पिता भी उस वक्त जर्मनी छोड़ गए। कुल मिलाकर घोर ब्रेन ड्रेन हुआ। ये यहूदी जिन देशों में पहुंचे वहीं अपनी स्किल से फिर छा गए, उस मुल्क की ताकत बन गए..
यहां तक कि दूसरे विश्वयुद्ध और बाद में जर्मन्स ने इस बात को महसूस किया कि यहूदी बस देश में पैसे नहीं बना रहे थे बल्कि वो उनके लिए अहम थे। अहम थे इकोनॉमी के लिए, साइंस के लिए, कला के लिए, समाज के लिए… पर ये अहसास होते होते काफी देर लगी और नुकसान भी बहुत हो चुका था।
(लेखक सीनियर पत्रकार हैं और News 24, TV 9 Bharatvarsh, Zee News और Aajtak जैसे कई संस्थानों में काम कर चुके हैं. मौजूदा दौर में एक निजी चैनल के पॉडकास्ट विभाग का कार्यभार संभाल रहे हैं और ‘पढ़ाकू नितिन’ नाम से एक प्रसिद्ध कार्यक्रम का संचालन कर रहे हैं.)
Last Updated on February 4, 2026 1:41 pm
