नई दिल्ली: भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश Ranjan Gogoi का राज्यसभा के नामित सदस्य के रूप में छह साल का कार्यकाल सोमवार को समाप्त हो गया। सुप्रीम कोर्ट से रिटायरमेंट के चार महीने बाद शुरू हुआ उनका यह कार्यकाल सीमित संसदीय भागीदारी के कारण चर्चा में रहा।
विदाई के मौके पर राज्यसभा के सभापति और भारत के उपराष्ट्रपति C P Radhakrishnan ने गोगोई को एक प्रतिष्ठित न्यायविद बताते हुए उनकी “अतुलनीय कानूनी समझ” और “गंभीर उपस्थिति” की सराहना की। उन्होंने कहा कि सदन उनके “संतुलित हस्तक्षेप” और “मार्गदर्शन” को याद करेगा।
हालांकि, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार गोगोई की कुल उपस्थिति केवल 53 प्रतिशत रही, जो कि सांसदों के राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत से काफी कम है। राज्यसभा की प्रोफाइल के मुताबिक, अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने एक भी सवाल नहीं पूछा (जबकि राष्ट्रीय औसत 270.2 है), कोई निजी विधेयक पेश नहीं किया (औसत 1.3) और केवल एक ही बहस में हिस्सा लिया (राष्ट्रीय औसत 156.1)।
उनका एकमात्र भाषण अगस्त 2023 में दिल्ली सरकार से जुड़े संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान आया था। इस दौरान उन्होंने “बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन” पर सवाल उठाते हुए इसे “बहुत विवादित आधार” बताया था—जबकि सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान वे इस सिद्धांत का समर्थन कर चुके थे।
मार्च 2020 में राज्यसभा में उनकी एंट्री ने भी कई सवाल खड़े किए थे। वह दूसरे ऐसे पूर्व मुख्य न्यायाधीश बने जो राज्यसभा सदस्य बने। इससे पहले न्यायमूर्ति Ranganath Misra 1998 में राज्यसभा पहुंचे थे।
‘सेवा का आह्वान’ या पोस्ट-रिटायरमेंट फायदा?
गोगोई की नियुक्ति को लेकर कई पूर्व जजों और आलोचकों ने सवाल उठाए और इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर डालने वाला बताया। हालांकि Bar Council of India ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा कि इससे विधायिका और न्यायपालिका के बीच संवाद मजबूत होगा।
खुद गोगोई ने इसे “सेवा का आह्वान” बताते हुए कहा था कि यह उनके विशेषज्ञता क्षेत्र में योगदान देने और “राष्ट्र निर्माण” में भागीदारी का अवसर है। अपनी किताब Justice for the Judge में उन्होंने लिखा कि वे संसद में न्यायपालिका और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े मुद्दे उठाना चाहते थे।
कम उपस्थिति पर क्या बोले गोगोई?
कम उपस्थिति को लेकर गोगोई ने अलग-अलग समय पर कई कारण बताए। 2021 में एक इंटरव्यू में उन्होंने कोविड प्रतिबंधों और संसद में बैठने की व्यवस्था को वजह बताया। हाल ही में उन्होंने कहा कि सदन में लगातार हंगामे के कारण भी उनकी भागीदारी कम रही।
उन्होंने यह भी कहा कि वह “पेशेवर राजनेता” नहीं हैं और सिर्फ सवाल पूछने के लिए सवाल पूछने में विश्वास नहीं रखते। इसके बजाय उन्होंने विदेशी प्रतिनिधिमंडलों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को संवैधानिक मुद्दों पर संबोधित करने और अपनी सैलरी से कानून के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति देने को अपनी वैकल्पिक भूमिका बताया।
समितियों में रही भूमिका
अपने कार्यकाल के दौरान गोगोई कई संसदीय समितियों का हिस्सा रहे। वह कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय समिति के सदस्य थे। इसके अलावा उन्होंने विदेश मामलों, संचार और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी समितियों में भी काम किया। रिटायरमेंट के समय वह कानून और न्याय मंत्रालय की सलाहकार समिति और भारत-यूक्रेन संसदीय मैत्री समूह के सदस्य भी थे।
छह साल के इस कार्यकाल के अंत में गोगोई की भूमिका एक तरफ जहां उनके कानूनी कद के लिए याद की जाएगी, वहीं दूसरी तरफ उनकी सीमित संसदीय सक्रियता पर सवाल भी छोड़ जाएगी।
Last Updated on March 17, 2026 5:12 pm
