Trump Iran Conflict: ईरान में जारी युद्ध ने वैश्विक व्यवस्था को झकझोर दिया है और अमेरिका की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताज़ा हालात संकेत देते हैं कि अमेरिका, जो कभी नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का संरक्षक माना जाता था, अब आर्थिक और भू-राजनीतिक अस्थिरता का प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है। इस संघर्ष का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर साफ दिख रहा है, जबकि अमेरिका खुद अपेक्षाकृत कम प्रभावित नजर आ रहा है।
युद्ध के प्रभाव से आम लोगों को बचाने के लिए कई देशों को असाधारण कदम उठाने पड़े हैं। भारत में सरकार ने घरेलू उपयोग के लिए एलपीजी की आपूर्ति को प्राथमिकता देते हुए इसे परिवारों तक मोड़ा और उद्योगों के लिए इसकी सप्लाई सीमित कर दी। नेपाल ने गैस की राशनिंग लागू की, फिलीपींस ने सरकारी कामकाजी सप्ताह को चार दिन का कर दिया, जबकि बांग्लादेश ने विश्वविद्यालय बंद कर दिए और ईंधन की खपत नियंत्रित कर दी।
इस संकट की जड़ में ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करना है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सबसे अहम धुरी है। एशियाई देश अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं—दक्षिण कोरिया लगभग 80%, जापान 90% और थाईलैंड 55% तक। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2025 में इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले लगभग 80% तेल और पेट्रोलियम उत्पाद एशिया के लिए थे। लेकिन अब यहां से यातायात में करीब 90% की गिरावट आ चुकी है।
यूरोप पर भी इसका असर पड़ा है, खासकर प्राकृतिक गैस की कीमतों में उछाल के रूप में। अमेरिकी और इज़राइली हमलों के बाद ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है। इसका असर शेयर बाजारों पर भी दिखाई दिया—20 मार्च तक यूरोप के MSCI इंडेक्स में लगभग 11% की गिरावट दर्ज की गई, जबकि एशिया में यह गिरावट 9% रही।
इसके उलट, अमेरिका की अर्थव्यवस्था इस संकट में अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है। S&P 500 इंडेक्स में केवल 5% की गिरावट आई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका कारण अमेरिका की घरेलू प्राकृतिक गैस पर निर्भरता है, जो उसकी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 36% पूरा करती है और उसे वैश्विक कीमतों के उतार-चढ़ाव से काफी हद तक बचाती है।
हालांकि, इस स्थिति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में असंतुलन को और गहरा कर दिया है। ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ और आक्रामक आर्थिक नीतियों का असर दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है। कई देशों के अमेरिका को निर्यात में गिरावट आई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक, जहां अमेरिका की विकास दर अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है, वहीं ब्रिटेन, जापान, कनाडा, भारत, यूरोप और लैटिन अमेरिका की आर्थिक संभावनाएं कमजोर हुई हैं।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने भी चेतावनी दी है कि अगर ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो वैश्विक व्यापार वृद्धि 1.9% से घटकर 1.5% तक आ सकती है। यूरोप को सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है, जहां निर्यात में गिरावट दर्ज हो सकती है, जबकि एशिया की जीडीपी वृद्धि भी धीमी पड़ने की संभावना है।
यह संकट केवल ऊर्जा या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। भारत और ब्राजील जैसे देशों के लिए यूरिया आयात—जो कृषि के लिए बेहद जरूरी है—का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है। खाड़ी देश भी खाद्यान्न आपूर्ति के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा है।
इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय, बांग्लादेशी और पाकिस्तानी प्रवासियों से मिलने वाली रेमिटेंस में गिरावट का खतरा भी बढ़ गया है, जो इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। ऊर्जा संकट का एक और प्रभाव यह है कि एशिया में स्वच्छ ऊर्जा के बजाय कोयले की खपत फिर बढ़ने लगी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव का संकेत है। पश्चिमी देशों को अब यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि अमेरिका अब वैश्विक स्थिरता का भरोसेमंद साथी नहीं रहा, बल्कि अनिश्चितता का एक बड़ा स्रोत बन चुका है।
ट्रंप प्रशासन के फैसलों और उनके औचित्य पर भी सवाल उठ रहे हैं। कभी सुरक्षा खतरे का हवाला देकर सैन्य कार्रवाई, तो कभी आर्थिक नीतियों में अचानक बदलाव—इन कदमों ने वैश्विक स्तर पर भरोसे को कमजोर किया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति अस्थायी नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति में एक दीर्घकालिक बदलाव की ओर इशारा करती है। ऐसे में दुनिया के सामने अब एक नई चुनौती है—एक ऐसा वैश्विक माहौल, जहां अनिश्चितता और टकराव सामान्य होते जा रहे हैं।
Last Updated on March 26, 2026 10:41 am
