धीरेंद्र गुप्ता, पन्ना/छतरपुर (मध्य प्रदेश):
केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में पन्ना और छतरपुर जिलों में चल रहा आदिवासी-किसान आंदोलन अब बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। हजारों आदिवासी, किसान और महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर विरोध जता रही हैं। आंदोलनकारियों का साफ कहना है—“या तो न्याय दो, या मौत।”
यह आंदोलन मझगांव, विश्रामगंज और दौड़न बांध से प्रभावित विस्थापितों का है, जो पिछले कई दिनों से लगातार धरने पर बैठे हैं। आंदोलन स्थल पर हालात चिंताजनक होते जा रहे हैं। कई महिलाएं बीमार पड़ चुकी हैं—एक अज्ञात बीमारी से जूझ रही है, जबकि अन्य उल्टी-दस्त और तेज बुखार से पीड़ित हैं। इसके बावजूद आंदोलनकारी घर लौटने को तैयार नहीं हैं और उनका कहना है कि जब तक उचित मुआवजा नहीं मिलेगा, वे पीछे नहीं हटेंगे।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि आंदोलन को दबाने के लिए प्रशासन द्वारा दमनात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि आंदोलनकारियों को दिल्ली जाकर अपनी बात रखने से रोका गया, रास्तों में कई जगह उन्हें रोका गया, राशन और पानी की आपूर्ति बाधित की गई और गांवों में धारा 163 लागू कर आवाज दबाने की कोशिश की गई।
प्रशासन द्वारा धारा 163 लागू कर पन्ना और छतरपुर की सीमाओं पर बाहरी व्यक्तियों की आवाजाही रोक दी गई है। इस पर आंदोलनकारियों का कहना है कि जब परियोजना एक ही है, तो लोगों को प्रशासनिक सीमाओं में बांटना अनुचित है। इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया है। केन नदी, जो दोनों जिलों की सीमा बनाती है, उसके बीच खड़े होकर पन्ना और छतरपुर के लोग संयुक्त रूप से आंदोलन कर रहे हैं।
इस बीच, आंदोलन स्थल पर पुलिस और महिलाओं के बीच झड़प की भी खबर है, जिसमें महिलाओं के विरोध के आगे पुलिस को पीछे हटना पड़ा। आंदोलनकारियों का आरोप है कि पुलिस और वन विभाग द्वारा सभी रास्तों पर पहरा लगाया गया है, जिससे लोगों को आंदोलन में शामिल होने से रोका जा रहा है। साथ ही स्थानीय दुकानदारों पर दबाव बनाकर उन्हें हटाया गया है, जिससे राशन और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो रही है।
प्रशासन का दावा है कि अब तक 600 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा वितरित किया जा चुका है और लगातार संवाद की कोशिशें की जा रही हैं। हालांकि, आंदोलनकारियों का कहना है कि मुआवजा पर्याप्त नहीं है और इसमें अनियमितताएं भी हुई हैं। कुछ मामलों में रिश्वतखोरी के आरोप भी सामने आए हैं, जिससे ग्रामीणों में असंतोष बढ़ा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच स्थानीय राजनीति भी सवालों के घेरे में है। क्षेत्र के विधायक राजेश शुक्ला पर आरोप है कि उन्होंने अब तक आंदोलनकारियों से प्रभावी संवाद स्थापित नहीं किया है, जबकि स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है।
आंदोलन ने अब “पंचतत्व सत्याग्रह” का रूप ले लिया है, जिसमें जल, मिट्टी, अग्नि, वायु और उपवास के माध्यम से विरोध दर्ज कराया जा रहा है। हाल ही में कुछ आंदोलनकारियों ने सांकेतिक फांसी लगाकर प्रशासन को चेतावनी दी, जिसके बाद अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर वार्ता करनी पड़ी।
वार्ता के बाद प्रशासन ने कई आश्वासन दिए हैं, जिनमें नए सिरे से पारदर्शी सर्वे, बाहरी अधिकारियों की तैनाती, मुआवजा बढ़ाने पर विचार और विस्थापितों के लिए सुविधायुक्त नए गांव बसाने की योजना शामिल है। हालांकि आंदोलनकारियों का कहना है कि पहले भी कई बार वादे किए गए, लेकिन वे पूरे नहीं हुए। इसलिए इस बार वे केवल आश्वासन पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं।
फिलहाल आंदोलन जारी है और स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है। यह मामला अब केवल स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक दमन, विकास बनाम विस्थापन और आदिवासी अधिकारों जैसे बड़े सवालों को भी सामने ला रहा है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन किस दिशा में जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
Last Updated on April 16, 2026 10:39 am
