नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court abortion ruling)) ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की 27 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देने वाले अपने आदेश को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि “किसी व्यक्ति की पसंद को किसी संस्था की पसंद पर वरीयता मिलनी चाहिए।” इसके साथ ही कोर्ट ने एम्स की क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई से भी इनकार कर दिया।
दो जजों की पीठ—सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जे बागची—का यह फैसला अदालत के पुराने रुख से अलग माना जा रहा है। इस बार कोर्ट ने साफ किया कि महिला की प्रजनन स्वायत्तता सर्वोपरि है।
क्या था मामला?
यह मामला 15 वर्षीय रेप पीड़िता से जुड़ा है, जो 27-28 सप्ताह की गर्भवती थी।
24 अप्रैल को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने गर्भसमापन की अनुमति दी थी। कोर्ट ने एम्स को प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश भी दिया था।
लेकिन एम्स ने इस आदेश के खिलाफ पहले समीक्षा याचिका और फिर क्यूरेटिव याचिका दायर की।
दोनों ही याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दीं।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां कीं:
- “न्यायाधीश वादी के लिए फैसला नहीं ले सकते, डॉक्टर भी मरीज के लिए निर्णय नहीं ले सकते।”
- “नाबालिग के साथ दुष्कर्म के मामलों में 24 हफ्ते की सीमा खत्म होनी चाहिए।”
- “एक निर्दोष पीड़िता का दर्द उसके जीवनभर का दाग नहीं बनना चाहिए।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल विशेषज्ञ अपनी जानकारी के आधार पर लोगों की इच्छा पर हावी नहीं हो सकते।
कानून क्या कहता है?
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 2021 के तहत:
- 20 हफ्ते तक: एक डॉक्टर की राय से गर्भपात संभव
- 20–24 हफ्ते: दो डॉक्टरों की अनुमति जरूरी (खास मामलों में)
- 24 हफ्ते के बाद: केवल गंभीर भ्रूण असामान्यता होने पर अनुमति
यानी 24 हफ्ते के बाद गर्भसमापन बेहद सीमित परिस्थितियों में ही संभव है।
2024 और 2026 के फैसलों में अंतर
अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक 14 वर्षीय लड़की को 30 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी थी।
लेकिन बाद में मेडिकल जोखिमों के कारण वह अनुमति वापस ले ली गई।
उस समय कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग की सुरक्षा और शारीरिक जोखिम सबसे अहम हैं।
इस बार क्यों बदला रुख?
2026 के इस फैसले में कोर्ट ने अलग दृष्टिकोण अपनाया।
- पीड़िता ने दो बार आत्महत्या की कोशिश की थी
- कोर्ट ने मानसिक स्थिति को गंभीर माना
- कहा गया कि गर्भ जारी रखना उसके “गरिमा के साथ जीने के अधिकार” के खिलाफ होगा
यानी इस बार मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत अधिकार को प्राथमिकता दी गई।
पुराने मामलों में क्या हुआ था?
- 2023: 26 हफ्ते की गर्भावस्था खत्म करने की मांग खारिज, भ्रूण स्वस्थ था
- 2024: 27 हफ्ते की गर्भावस्था में भी याचिका खारिज, भ्रूण के “जीवन के अधिकार” का हवाला
- 2018: 25 हफ्ते की गर्भावस्था में गर्भपात को “हत्या” तक बताया गया
इन मामलों में कोर्ट ने भ्रूण के अधिकार को ज्यादा महत्व दिया था।
संवैधानिक बनाम कानूनी बहस
इस फैसले में कोर्ट ने एक बड़ा सिद्धांत रखा:
“अगर कानून में समाधान नहीं है, तो संवैधानिक राहत दी जा सकती है।”
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अदालत को सिर्फ कानून की सीमाओं में बंधकर नहीं रहना चाहिए।
बल्कि हर मामले को महिला के नजरिए से देखना जरूरी है।
कोर्ट की साफ लाइन
- सिर्फ इसलिए गर्भसमापन से इनकार नहीं किया जा सकता कि भ्रूण स्वस्थ है
- महिला को “माध्यम” बनाना संविधान के खिलाफ है
- महिला की पसंद, अजन्मे बच्चे के हित से ऊपर हो सकती है
यह फैसला सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि न्यायपालिका के बदलते दृष्टिकोण का संकेत है।
जहां पहले मेडिकल और कानूनी सीमाएं हावी थीं, अब व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।
Last Updated on May 2, 2026 9:34 am
