TVK Denied Invite: तमिलनाडु की सियासत एक बार फिर उस पुराने लेकिन बेहद अहम सवाल के सामने खड़ी है—सरकार बनाने का फैसला राजभवन करेगा या विधानसभा का फ्लोर? ताजा विवाद की शुरुआत राजभवन के उस बयान से होती है, जिसमें कहा गया कि तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) अब तक बहुमत के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन जुटाने में असफल रही है। इसी आधार पर राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने टीवीके अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया।
राजभवन का तर्क सीधा है—जब तक स्पष्ट बहुमत नहीं, तब तक सरकार गठन का आमंत्रण नहीं। आंकड़ों की बात करें तो 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है, जबकि टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। कांग्रेस के समर्थन के बावजूद यह आंकड़ा अभी भी अधूरा है। ऐसे में राज्यपाल का रुख संवैधानिक सतर्कता के तौर पर देखा जा सकता है।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता—यहीं से असली बहस शुरू होती है।
राजभवन का तर्क बनाम संवैधानिक परंपरा
राज्यपाल का यह कहना कि बहुमत साबित नहीं हुआ है, पहली नजर में तार्किक लगता है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र केवल अंकगणित नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया भी है। और यहीं इतिहास राजभवन के तर्क को चुनौती देता है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला S. R. Bommai vs Union of India साफ कहता है कि बहुमत का परीक्षण राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के फ्लोर पर होगा। 1989 में कर्नाटक में एस.आर. बोम्मई सरकार को इसी आधार पर हटाया गया था, जिसे अदालत ने असंवैधानिक ठहराया।
इसके बाद Jagadambika Pal case, Rameshwar Prasad vs Union of India, Nabam Rebia case और Shiv Sena vs Maharashtra—हर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ही सिद्धांत दोहराया:
बहुमत की असली परीक्षा सदन के भीतर होगी, न कि राज्यपाल की धारणा पर।
सबसे बड़ी पार्टी को मौका क्यों नहीं?
संविधान के अनुच्छेद 164 और आयोगों—सरकारिया और पुंछी आयोग—की सिफारिशें स्पष्ट दिशा देती हैं।
क्रम साफ है:
- पूर्ण बहुमत वाला दल या गठबंधन
- सबसे बड़ा दल (यदि बहुमत न हो)
- चुनाव-पश्चात गठबंधन
तमिलनाडु के मामले में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी है। कांग्रेस ने समर्थन भी दे दिया है और अन्य दलों से बातचीत जारी है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या राज्यपाल को उन्हें पहले आमंत्रित कर फ्लोर टेस्ट का मौका नहीं देना चाहिए था?
राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति—सीमाएं क्या हैं?
अनुच्छेद 163 राज्यपाल को कुछ विवेकाधीन अधिकार देता है, खासकर त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में। लेकिन यह “असीमित शक्ति” नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि राज्यपाल का विवेक संविधान और न्यायिक सिद्धांतों से बंधा हुआ है।
2017 के Chandrakant Kavlekar vs Union of India मामले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई गठबंधन बहुमत का दावा पेश करता है, तो राज्यपाल उसे मौका दे सकते हैं—even अगर वह सबसे बड़ा दल न हो।
यानी विकल्प मौजूद हैं, लेकिन प्राथमिकता प्रक्रिया की होनी चाहिए, न कि पूर्व-निर्णय की।
तमिलनाडु: राजनीति या संवैधानिक परीक्षण?
आज तमिलनाडु में जो हो रहा है, वह केवल सरकार गठन का मामला नहीं है—यह भारतीय संघीय ढांचे की परीक्षा है। एक तरफ राज्यपाल का तर्क है कि बहुमत स्पष्ट नहीं, दूसरी तरफ संवैधानिक इतिहास कहता है कि बहुमत साबित करने का मंच विधानसभा है।
अगर सबसे बड़ी पार्टी को भी फ्लोर टेस्ट का मौका नहीं मिलता, तो यह सवाल उठना लाजिमी है—
क्या हम संवैधानिक प्रक्रिया को आंकड़ों के अनुमान से बदल रहे हैं?
लोकतंत्र में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रक्रिया। और भारत का संवैधानिक इतिहास बार-बार यही कहता है—
बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए।
तमिलनाडु का यह विवाद शायद एक बार फिर उसी मूल सवाल की ओर लौट रहा है—
क्या राज्यपाल निर्णायक हैं, या सिर्फ प्रक्रिया के संरक्षक?
Last Updated on May 7, 2026 5:34 pm
