पश्चिम बंगाल चुनाव (Bengal Election) की धूल अभी पूरी तरह बैठी भी नहीं है। ऐतिहासिक वोटिंग और नए जनादेश वाले इस चुनाव पर सिर्फ राजनीतिक दलों की नजर नहीं थी, बल्कि एक और वर्ग इसे बेहद करीब से ट्रैक कर रहा था—शहरी उच्च वर्ग। यह वही वर्ग है जो दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु जैसे महानगरों की गेटेड सोसाइटियों में रहता है, किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता है या स्टार्टअप चलाता है, और देश के शीर्ष 1 प्रतिशत कमाई करने वालों में शामिल होता है।
अब सवाल उठता है कि चुनाव और इस वर्ग का क्या संबंध? दरअसल, इन हाई-प्रोफाइल जिंदगियों की रोजमर्रा की व्यवस्था प्रवासी कामगारों के सहारे चलती है, जिनमें बड़ी संख्या पश्चिम बंगाल से आने वाले घरेलू कामगारों की होती है। चुनाव के दौरान इनमें से कई लोग वोट डालने अपने घर लौट गए। घरेलू सहायिका, रसोइया, ड्राइवर और नैनी जैसे कामगार उन निजी जरूरतों को पूरा करते हैं, जिन्हें उनके नियोक्ता शायद ही कभी खुद करते हों।
इन कामगारों की अनुपस्थिति ने शहरी घरों में एक तरह का “संकट” पैदा कर दिया। बीजेपी बनाम दीदी की लड़ाई पर चर्चा करने से ज्यादा बड़ी समस्या थी—“JPB” यानी झाड़ू-पोछा-बर्तन बिना “दिदी” के कैसे होगा? सोशल मीडिया पर ऐसे कई Instagram reels वायरल हुए, जिनमें युवा कपल घरेलू कामों के दबाव में टूटते नजर आए। एक वायरल कैप्शन था—“आपकी मेड वोट देने घर गई है और अब आपकी शादी की परीक्षा हो रही है।”
करीब एक महीने पहले एक लोकप्रिय reel में एक बंगाली कुक अपने गैर-बंगाली मालिक से वोट डालने घर जाने की छुट्टी मांगता दिखाई दिया। परेशान मालिक ने उससे पूछा कि आखिर अभी जाने की क्या जरूरत है और उदारता दिखाते हुए दिवाली पर छुट्टी देने का सुझाव दिया। लोकतंत्र कभी-कभी कितना “असुविधाजनक” हो सकता है, यह दृश्य उसी का प्रतीक था।
घरेलू कामगारों और शहरी वर्ग के बीच बढ़ती खाई
यह वर्गीय विभाजन नया नहीं है। घरेलू कामगारों के श्रम अनुबंधों में यह साफ दिखाई देता है—कम वेतन, सातों दिन काम, अस्पष्ट जिम्मेदारियां और सम्मान की कमी। ज्यादातर कामगार अलग-अलग नियोक्ताओं से व्यक्तिगत स्तर पर शर्तें तय करते हैं।
हालांकि, अब इस क्षेत्र में App-based Gig Platforms तेजी से उभर रहे हैं। 100 से 150 रुपये प्रति घंटे की दर पर ये ऐप्स ग्राहकों को घरेलू कामों के लिए प्रशिक्षित पेशेवर उपलब्ध कराते हैं। यूनिफॉर्म पहने कर्मचारी तय समय पर पहुंचते हैं, मोबाइल OTP से काम शुरू करते हैं, एप्रन पहनकर काम करते हैं और टाइमर खत्म होते ही सेवा समाप्त हो जाती है।
इन छोटे दिखने वाले बदलावों ने घरेलू श्रम बाजार में बड़ा परिवर्तन शुरू कर दिया है। अब अतिरिक्त समय और अतिरिक्त काम की स्पष्ट कीमत तय है। संगठित तीसरे पक्ष की एंट्री से कामगारों को मोलभाव की ताकत और सम्मान मिलने लगा है।
लेखिका बताती हैं कि फरवरी में जब उन्होंने पहली बार ऐसी सेवा ली, तो उन्हें “सफीना” (बदला हुआ नाम) नाम की एक उत्कृष्ट कामगार मिली, जो संयोग से बंगाल से ही थी। लेखिका ने उन्हें स्थायी नौकरी का प्रस्ताव भी दिया, लेकिन सफीना ने बेहतर वेतन और लचीले समय का हवाला देकर मना कर दिया।
बंगाल चुनाव के दौरान क्यों बढ़ गई घरेलू कामगारों की मांग?
जब नियमित घरेलू सहायिका चुनाव के लिए घर गई, तो लेखिका ने फिर ऐप्स का सहारा लिया। लेकिन इस बार सफीना और कई अन्य कामगार उपलब्ध नहीं थे। एक स्लॉट पाने के लिए कई ऐप्स बदलने पड़े और फिर भी आखिरी समय में देरी का सामना करना पड़ा।
संभावित कारण था—बंगाली प्रवासी कामगारों की संख्या में अचानक कमी। आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, श्रम आपूर्ति में इस गिरावट ने मजदूरी बढ़ा दी। ऐप आधारित सेवाओं की प्रति घंटे की दरें बढ़ गईं और पारंपरिक घरेलू कामगारों के वेतन भी महंगे हो गए क्योंकि शहरी परिवार किसी भी तरह अपनी घरेलू व्यवस्था बनाए रखना चाहते थे।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वेतन वृद्धि स्थायी होगी या फिर कामगारों की वापसी के बाद बाजार पुराने संतुलन में लौट जाएगा?
क्या Gig Economy घरेलू कामगारों की जिंदगी बदलेगी?
इस पूरे घटनाक्रम ने शहरी अनौपचारिक श्रम बाजार की अस्थिरता को उजागर कर दिया है। App-based platforms घरेलू कामगारों को पारंपरिक अनुबंधों के मुकाबले बेहतर विकल्प दे सकते हैं, जिससे श्रम बाजार के नियम बदल सकते हैं।
हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि इसका असली फायदा कामगारों को कितना मिलेगा। चुनाव के दौरान कई app-based घरेलू कामगारों ने लगातार 10-11 घंटे अलग-अलग घरों में काम किया। ग्राहक अपने पैसों का अधिकतम उपयोग करना चाहते हैं, लेकिन उस मानसिक और शारीरिक दबाव का हिसाब कौन रखता है जो कामगारों पर पड़ता है?
मानवीय श्रम का “commodification” यानी उसे सिर्फ एक सेवा या उत्पाद में बदल देना, एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है।
कोविड के बाद भी क्यों नहीं बदली सोच?
लेखिका याद दिलाती हैं कि कोविड-19 लॉकडाउन या विदेश में रहने के दौरान पहली बार कई लोगों ने खुद खाना बनाना और सफाई करना सीखा था। उस समय लोग महीनों तक अपनी थकान की बात करते रहे, लेकिन नियोक्ता बनने के बाद वही अनुभव शायद भूल गए।
अब जब कामगार फिर शहरों में लौट रहे हैं, तो शायद समय आ गया है कि घरेलू कामगारों के सम्मान, निष्पक्ष अनुबंध और मानवीय श्रम के मूल्य पर नए सिरे से विचार किया जाए।
क्योंकि अगर हजारों किलोमीटर दूर हुआ एक राज्य चुनाव किसी महानगर के घरों की रफ्तार रोक सकता है, तो इसका मतलब है कि शहरी भारत की पूरी जीवनशैली उन्हीं अदृश्य कामगारों के कंधों पर टिकी हुई है, जिन्हें अक्सर सबसे कम सम्मान मिलता है।
इसका मूल संस्करण अंग्रेजी अख़बार Indian Express में प्रकाशित हुआ है…
Last Updated on May 22, 2026 12:31 pm
