अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, पिनराई विजयन, नेहा बोरा, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण समेत कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को दिल्ली में हिरासत में लिया गया. CJP ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई जानी थी.
महबूबा मुफ्ती बोलीं – पहले प्रदर्शन कुचलो, फिर कहो हुआ ही नहीं
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली में सुरक्षा और संचार पर लगाई गई पाबंदियों की तुलना जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद के हालात से की.
उन्होंने कहा कि आज की दिल्ली उन्हें अनुच्छेद 370 के असंवैधानिक तरीके से हटाए जाने के बाद के कश्मीर की याद दिलाती है. उनके मुताबिक, उस समय लोगों को घरों में सीमित कर दिया गया था, इंटरनेट बंद था और पूरे क्षेत्र को सुरक्षा घेरे में रखा गया था.
मुफ्ती ने आरोप लगाया कि उस समय बीजेपी ने दावा किया था कि किसी ने विरोध प्रदर्शन नहीं किया. दिल्ली के हालात का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पहले प्रदर्शन को रोकना और फिर यह दावा करना कि कोई विरोध हुआ ही नहीं, असहमति को दबाने का तरीका है.
उन्होंने कहा, “पहले प्रदर्शन को कुचलो, फिर इनकार कर दो कि ऐसा कभी हुआ था. इस तरह जबरन थोपी गई खामोशी को सहमति के रूप में पेश किया जाता है.”
उमर अब्दुल्ला बोले – दिल्ली में लागू हुआ ‘कश्मीर मॉडल’
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी शुक्रवार देर शाम दिल्ली के हालात की तुलना कश्मीर से की. उन्होंने कहा कि CJP के प्रदर्शन से पहले सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच कश्मीर मॉडल को दिल्ली में लागू किया जा रहा है.
शुक्रवार रात 10 बजे से मध्य दिल्ली में 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट पर रोक लगाए जाने की जानकारी सामने आई.
उमर अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “कश्मीर मॉडल को दिल्ली में निर्यात कर दिया गया है. नए जम्मू-कश्मीर के मॉडल पर बनी नई दिल्ली में आपका स्वागत है.”
उनका यह बयान जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा कारणों से इंटरनेट बंद किए जाने के लंबे इतिहास के संदर्भ में आया.
उमर अब्दुल्ला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से INDIA गठबंधन के नेताओं की मुलाकात के लिए दिल्ली पहुंचे थे. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं.
उन्होंने सवाल उठाया, “अगर चुनाव निष्पक्ष नहीं हैं, तो फिर यह लोकतंत्र कैसे है?”
2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में क्या हुआ था?
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किया था. इसके बाद क्षेत्र में इंटरनेट, मोबाइल और टेलीफोन सेवाएं बंद कर दी गई थीं.
यह जम्मू-कश्मीर में सबसे लंबे इंटरनेट बंदी के दौर की शुरुआत थी. 4G मोबाइल इंटरनेट सेवाएं फरवरी 2021 में पूरी तरह बहाल की गईं. इससे पहले पोस्टपेड मोबाइल फोन पर कम गति वाली इंटरनेट सेवाओं और ब्रॉडबैंड की अनुमति दी गई थी.
महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला दोनों उन राजनीतिक नेताओं में शामिल थे, जिन्हें 2019 के लॉकडाउन के दौरान हिरासत में लिया गया था. मूल रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय दोनों को जन सुरक्षा कानून (Public Safety Act) के तहत हिरासत में रखा गया था.
दिल्ली में प्रदर्शन को लेकर विवाद क्यों बढ़ा?
CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था. दिल्ली में नेताओं की हिरासत, रास्तों पर बैरिकेडिंग और इंटरनेट प्रतिबंधों ने इस प्रदर्शन को लेकर विवाद बढ़ा दिया.
जहां सुरक्षा व्यवस्था के तहत पाबंदियां लगाई गईं, वहीं विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के लिए जगह कितनी बची है.
ये भी पढ़ें- Delhi Protest: Sonam Wangchuk फिर करेंगे अनशन, दिल्ली में नेताओं की हिरासत पर भड़के?
अब बड़ा सवाल यह है कि चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध को रोकने के लिए लगाए गए प्रतिबंध सुरक्षा की जरूरत थे, या वे लोकतांत्रिक विरोध की आवाज को सीमित कर रहे हैं?
Last Updated on October 10, 2026 8:06 pm
