NCERT की किताब में अचानक क्या जुड़ गया, जिसने judiciary पर खड़े कर दिए सवाल?

नई दिल्ली। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा सोमवार को जारी कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में “हमारे समाज में न्यायपालिका (judiciary) की भूमिका” अध्याय के अंतर्गत “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर एक खंड शामिल किया गया है।

अध्याय में न्यायिक व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों का उल्लेख करते हुए “न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार” तथा “कई कारणों से लंबित मामलों का भारी बोझ—जैसे पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाएँ और कमजोर आधारभूत ढाँचा” को प्रमुख समस्याओं के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

पुरानी पुस्तक में नहीं था भ्रष्टाचार का जिक्र

पुरानी पाठ्यपुस्तक में केवल न्यायपालिका की भूमिका, स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा, अदालतों की संरचना और न्याय तक पहुँच का वर्णन था, जबकि भ्रष्टाचार का कोई उल्लेख नहीं था। हालांकि उसमें एक अनुच्छेद था, जिसमें कहा गया था कि आम व्यक्ति की न्याय तक पहुँच को प्रभावित करने वाली एक समस्या यह है कि अदालतों को किसी मामले की सुनवाई में कई वर्ष लग जाते हैं। पुस्तक में कहा गया था कि इस लंबी अवधि को दर्शाने के लिए अक्सर “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है” (Justice delayed is justice denied) वाक्यांश का प्रयोग किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों तक लंबित मामलों के आंकड़े

नई पुस्तक में विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की अनुमानित संख्या भी दी गई है—

  • सर्वोच्च न्यायालय: लगभग 81,000 मामले

  • उच्च न्यायालय: लगभग 62,40,000 मामले

  • जिला एवं अधीनस्थ अदालतें: लगभग 4,70,00,000 मामले

NCERT निदेशक की कोई प्रतिक्रिया नहीं

नई सामग्री पर टिप्पणी के अनुरोध पर NCERT के निदेशक डी. पी. सकलानी ने कोई जवाब नहीं दिया। शैक्षणिक सत्र समाप्ति के करीब होने के बावजूद पुस्तक जारी करने में हुई देरी पर पूछे गए सवाल का भी उन्होंने उत्तर नहीं दिया।

आचार संहिता, शिकायत प्रणाली और जवाबदेही

नई पुस्तक के “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो अदालत के भीतर और बाहर दोनों जगह उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है। इसमें जवाबदेही बनाए रखने के लिए न्यायपालिका के आंतरिक तंत्र का उल्लेख है तथा शिकायत दर्ज करने के लिए केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) की स्थापित प्रक्रिया का संदर्भ दिया गया है। पुस्तक के अनुसार 2017 से 2021 के बीच इस प्रणाली के माध्यम से 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं।

इसमें यह भी कहा गया है कि गंभीर आरोपों के मामलों में संसद महाभियोग प्रस्ताव पारित कर न्यायाधीश को पद से हटा सकती है। ऐसा प्रस्ताव उचित जांच के बाद ही विचार के लिए लिया जाता है, जिसके दौरान न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है।

भ्रष्टाचार से न्याय तक पहुँच पर असर

पुस्तक में कहा गया है कि “फिर भी लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं। गरीब और वंचित वर्ग के लिए यह न्याय तक पहुँच की समस्या को और गंभीर बना सकता है। इसलिए राज्य और केंद्र स्तर पर न्यायिक व्यवस्था में विश्वास बढ़ाने और पारदर्शिता लाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें प्रौद्योगिकी का उपयोग और भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित व निर्णायक कार्रवाई शामिल है।”

पूर्व मुख्य न्यायाधीश का बयान भी शामिल

पुस्तक में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई के जुलाई 2025 के एक वक्तव्य का भी उल्लेख किया गया है। उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भी भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएँ सामने आई हैं, जिससे जनता का विश्वास प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि इस विश्वास को पुनर्स्थापित करने का मार्ग त्वरित, निर्णायक और पारदर्शी कार्रवाई में निहित है, क्योंकि जनता के विश्वास में कमी न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका को कमजोर कर सकती है।

इलेक्टोरल बॉन्ड और आईटी एक्ट के उदाहरण

“न्याय के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों आवश्यक है?” खंड के बाद पुस्तक छात्रों से दो उदाहरणों—इलेक्टोरल बॉन्ड और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम—पर चर्चा करने को कहती है।

पुस्तक के अनुसार, 2018 में सरकार ने राजनीतिक दलों के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से इलेक्टोरल बॉन्ड योजना शुरू की, जिसके तहत व्यक्ति और कंपनियाँ गुमनाम रूप से दान दे सकते थे। ये बॉन्ड बैंकों द्वारा जारी किए जाते थे और केवल निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले पंजीकृत राजनीतिक दल ही इन्हें भुना सकते थे। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा कि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को धन कौन दे रहा है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2009 के संदर्भ में पुस्तक बताती है कि लागू होने के कुछ वर्षों बाद सरकार ने इसमें एक प्रावधान जोड़ा, जिसके तहत इंटरनेट या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के कारण लोगों को जेल भेजा जा सकता था। वर्ष 2015 में एक विधि छात्र ने इस प्रावधान को अदालत में चुनौती दी, यह कहते हुए कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील से सहमति जताते हुए प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया और सरकार को इसे कानून से हटाने का निर्देश दिया।

नई शिक्षा नीति के अनुरूप तैयार पुस्तकें

NCERT राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और स्कूल शिक्षा के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के अनुरूप सभी कक्षाओं के लिए नई पाठ्यपुस्तकें विकसित कर रहा है। अब तक कक्षा 1 से 8 तक की नई पुस्तकें जारी की जा चुकी हैं। कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक का पहला भाग पिछले वर्ष जुलाई में जारी किया गया था। कोविड महामारी के बाद 2005 की पाठ्यचर्या रूपरेखा पर आधारित पुरानी पुस्तकों को “तर्कसंगत” बनाते हुए उनकी सामग्री का बोझ कम किया गया था।

Last Updated on February 24, 2026 11:27 am

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