– अंकित कुमार अवस्थी
Aravalli 100-Meter Rule: अभी दिल्ली-NCR में प्रदूषण और खराब वायु गुणवत्ता को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। हालात किसी हेल्थ इमरजेंसी जैसे हैं -लोग साफ हवा के लिए तरस रहे हैं , सामान्य रूप सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। ऐसे समय में, जब सरकार से ठोस समाधान और नीतिगत हस्तक्षेप की उम्मीद थी, एक ऐसा कदम उठाया गया है जो आने वाले समय में दिल्ली-NCR सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों के लिए और भी गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा कर सकता है।
केंद्र सरकार ने अरावली पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी और सुप्रीम कोर्ट ने उसे स्वीकार कर लिया है। इस नई परिभाषा के अनुसार, अब केवल वही भू-आकृतियाँ अरावली मानी जाएंगी जो अपने आसपास के भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊँची हों।
समस्या यह है कि इस मानक के तहत अरावली का लगभग 90% हिस्सा अरावली की श्रेणी में आएगा ही नहीं, क्योंकि यह हिमालय जैसी ऊँची पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि कऱोड़ों वर्षों में क्षरण से बनी बेहद पुरानी लो-राइज पर्वतमाला है -जिसके बहुत कम हिस्सों की ऊँचाई 100 मीटर से अधिक है।
चूंकि नए मानक के बाद इन क्षेत्रों को अरावली नहीं माना जाएगा, इसलिए उन पर पर्यावरण संरक्षण कानून भी लागू नहीं होंगे। इसका सीधा असर यह होगा कि अरावली से जुड़े जंगल, पहाड़ी ढलान, खनन-प्रतिबंधित क्षेत्र और संवेदनशील इको-ज़ोन संरक्षण की कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएंगे -और फिर बेकाबू खनन, जंगलों की कटाई, निर्माण और अंधाधुंध दोहन का रास्ता खुल जाएगा।
पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह फैसला दिल्ली-NCR के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकता है, क्योंकि अरावली न केवल रेगिस्तान की गर्म हवाओं और धूल को रोकती है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए भूजल रिचार्ज का बड़ा प्राकृतिक स्रोत भी है।
अरावली के सिमटने का मतलब है गंभीर जलवायु संकट। कुल मिलाकर -यदि यह अंतिम रूप से लागू हो गई, तो पूर्वी गुजरात से लेकर हरियाणा तक लगभग 700 किलोमीटर में फैली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व पर संकट है ।
हवा, जंगल, पहाड़, जल स्रोत और जैव-विविधता हमारे जीवन और भविष्य की बुनियाद हैं। हम विकास के नाम पर इन्हें खोने का जोखिम उठा रहे हैं, जबकि इनके बिना विकास का अर्थ ही शून्य रह जाएगा।
लेखक Passionate educator | IIT Kanpur alumni बताते हैं. उनके एक्स हैंडल से..
Last Updated on December 1, 2025 10:32 am
