विश्व दीपक
राजनीतिक हल्के में एक किस्सा अक्सर सुनाया जाता है. अमित शाह (Amit Shah) के कॉलेज में चुनाव होना था. अमित शाह खुद चुनाव में खड़े थे या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का कोई दूसरा प्रत्याशी था याद नहीं लेकिन ऐसा माना जा रहा था कि शाह वाले पक्ष की हार तय है. फिर अमित भाई शाह ने चाणक्य बुद्धि लगाई. कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों के घर फोन कराया और कहा कि कल कॉलेज मत आना. दंगा फसाद हो सकता है. कॉलेज बंद रहेगा.
आधे लोग उस दिन कॉलेज गए ही नहीं जिस दिन वोटिंग होनी थी. खासतौर से लडकियां नहीं गईं. उनके मां बाप ने सुरक्षा के डर से नहीं भेजा. नतीजा यह हुआ कि विपक्ष का वोट घर से बाहर निकला ही नहीं. अमित शाह चुनाव जीत गए. अब इसी प्रैक्टिस को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा रहा है.
पिछले कई चुनावों से. यह कैसे हो सकता है कि बनारस का रहने वाला आदित्य श्रीवास्तव, बंगलुरु में भी वोट करता है? वह महाराष्ट्र भी रहता है. कैसे हो सकता है कि एक कमरे के मकान नंबर पर सैकड़ों वोटर रजिस्टर्ड हैं?
बिहार में अभी-अभी ऐसा ही एक मामला सामने आया है. कैसे हो सकता है कि बंगलुरु सेंट्रल की 8 विधानसभा सीटों से 4 में भारतीय जनता पार्टी चुनाव हारती है. 3 में लगभग बराबरी का खेल रहता है. लेकिन महादेवपुर नाम की एक विधानसभा में उसे एक लाख से ज्यादा वोट मिलते हैं. अंततः पार्टी चुनाव जीत जाती है.
कैसे हो सकता है कि एक पब के पते पर दर्जनों वोटर्स रजिस्टर्ड हैं. वो चुनाव में वोट भी करते हैं. आश्चर्जनक रूप से उन सभी पोलिंग बूथ पर भारतीय जनता पार्टी ही चुनाव जीतती है. कैसे हो सकता है?
अब चुनाव का कोई मतलब नहीं रह गया. कल और आज में फर्क बस इतना है कि अमित शाह अब चुनाव आयोग के जरिए देश का चुनाव जीत रहे हैं. अब उन्हें फोन करवाने की जरूरत नहीं.
लेखक पत्रकार हैं और वर्तमान में नेशनल हेराल्ड में कार्यरत हैं. उनके फेसबुक पेज से…
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Last Updated on August 8, 2025 12:20 pm
