नितिन ठाकुर
राष्ट्रपति ट्रंप (President Trump) अमेरिका के लिए मालूम नहीं लेकिन दुनिया के लिए दुर्घटना हैं। खुद अमेरिकी अखबार बता रहे हैं कि टैरिफ की उनकी ख़ब्त कई गरीब देशों को ले डूबी है, ख़ासकर अफ्रीकी। ऊपर से कल उन्होंने अपने पालतू सोशल मीडिया ट्रुथ (आयरनी देखिए) पर लिखा कि भारत ना सिर्फ रूसी तेल खरीद रहा है बल्कि उसे खुले बाज़ार में बड़े मुनाफे पर बेच रहा है।
वो इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि भारत को यूक्रेन में मारे जा रहे लोगों की परवाह नहीं। इन्हीं कारणों के चलते वो भारत पर टैरिफ बढ़ा देंगे। भारत ने इसके बाद ट्रंप को जो जवाब दिया वो दोटूक है। उसने कहा कि यूक्रेन जंग के बाद रूसी तेल की खरीद को खुद अमेरिका प्रोत्साहित कर रहा था ताकि ग्लोबल मार्केट की स्थिरता बनी रहे।
खुद भारत में अमेरिकी राजदूत रहे एरिक गार्सेटी ने बयान दिया कि भारत ने रूसी तेल इसलिए ख़रीदा क्योंकि ये अमेरिका चाहता था कि भारत निर्धारित प्राइस कैप पर तेल खरीदे. ये उल्लंघन नहीं था. अमेरिका खुद नहीं चाहता था कि तेल की कीमत बढ़े और उन्होंने ऐसा किया. इसके अलावा भारत ने पश्चिम को ये कह कर आईना दिखा दिया कि जो देश भारत को रूस के साथ व्यापार पर घेर रहे हैं वो खुद रूस के साथ धंधा करते रहे हैं।
यूरोपियन यूनियन तो रूस से एलएनजी खरीद में रिकॉर्ड स्थापित कर रहा है। इसके अलावा उसकी खरीददारी लिस्ट में फर्टिलाइजर, माइनिंग का सामान, केमिकल्स, लोहा, स्टील वगैरह शामिल है। खुद ट्रंप उसी अमेरिका के कर्ताधर्ता बने हैं जो रूस से यूरेनियम हैक्साफ्लोराइड, पैलेडियम, केमिकल्स, फर्टिलाइजर खरीद रहा था।
ये सब यूक्रेन वाले ऐपिसोड के बाद हुआ है लेकिन ट्रंप अपने वोटर को बताएंगे कि इंडिया है जो यूक्रेन में लोगों के बहते खून को नहीं देख रहा। कोई पलट कर इस दूरदृष्टिबाधित प्रशासन से पूछने वाला है कि क्या आपने बैसरन घाटी में गिरते खून की परवाह की है? और छोड़िए आपने तो अपने लोगों के खून की परवाह नहीं कि वरना 9/11 के खलनायक को गोद में छिपाए रखनेवाले मुल्क को इमदाद ना दिलाते।
हिंदुओं और हिंदुस्तानियों को अपमानित करनेवाले को लंच पर ना बुलाते। बाकी एक तरफ गाज़ा में गिरता खून आपको नहीं दिखता? अपने कमरे में बुलाकर सबको बेइज्ज़त करने का चस्का पाले हुए इस राष्ट्रपति की वजह से वो अमेरिकी कूटनीतिक प्रयास धूल में मिल गए जिनके चलते भारत को धीरे धीरे वॉशिंगटन पर भरोसा होने लगा था।
आज भी भारत से ना रूस दूर है, ना चीन। ऊपर से सबको दीवार की तरफ धकेलनेवाला भी एक आदमी है। क्या कारण है कि ये तीनों एक साथ ना चलें? अमेरिका ने कौन सी वजहें भारत को दीं कि एशिया में उसके साथियों को चीन के खिलाफ नई दिल्ली संरक्षण दे? ये ठीक है कि ट्रंप के बड़बोलेपन को इग्नोर करने की एक वैश्विक नीति बन चुकी है।
खुद उनके मुल्क में सब मानते हैं कि वो एक विशुद्ध व्यापारी दिमाग के आदमी हैं जिसे नेता बनना कभी आया नहीं। उसे लगता है वो एक डीलमेकर के रोल में रहेगा तो नोबेल पा लेगा। नोबेल पुरस्कार समिति अमेरिकी इशारे पर ऐसा कर भी देगी लेकिन जो गड्ढा ये प्रेसिडेंट खोदकर जाएगा उसे भरने में कई प्रेसिडेंसी खपेंगी।
बाकी यदि आगामी दौरे में उनके सलाहकार भारत की अहमियत को समझ सके तब मुमकिन है कि बेपटरी होते संबंध किसी तरह संभल जाएं। ट्रंप को समझना पड़ेगा कि सभी देश अपने घरेलू कारणों से टैरिफ वॉर के सामने समझौते के कागज़ लिए खड़े हैं मगर किसी को इतना पुश करना गलत है कि वो आपका विकल्प खोजने पर मजबूर हो जाए।
लेखक आजतक रेडियो में “पढ़ाकू नितिन” नाम से एक प्रोग्राम होस्ट करते हैं. उन्हीं के फेसबुक वॉल से यह लेख लिया गया है…
Last Updated on August 6, 2025 11:07 am
