साकेत आनंद
पहली तस्वीर में कारू राम मंडावी और उनका परिवार है. अबूझमाड़ के भीतर जब हम घुसे तो अंदाजा नहीं था कि कहां रुकेंगे, क्या खाएंगे या जहां CPI (माओवादी) के महासचिव बसवा राजू को मारा गया, वहां कैसे पहुंचेंगे. बस ये पता था कि बोटेर नाम के इस गांव तक बाइक से पहुंच सकते हैं. उसके बाद 6-7 घंटे पैदल जाना होगा. जब हम वहां शाम को पहुंचे तो लोगों से बातें शुरू हुई. बहुत कम लोग हिंदी बोलते हैं. इनमें कारू भी एक हैं. पांचवीं तक पढ़े हैं.
थोड़ी देर की बातचीत के बाद कारू हमारे साथ सहज हो गए. हमें घोटूल (अबूझमाड़ के गांवों में एक सामूहिक जगह) में रुकवाया. फिर अपने घर में रात के खाने की व्यवस्था की. खाना बनते वक्त 2 घंटे खूब बातें हुईं. कारू शहरों की दुनिया के बारे में सबकुछ जान लेना चाहते थे. और मैं उनसे जंगल के भीतर की दुनिया के बारे में. अगले दिन कारू ही हमें उस एनकाउंटर साइट तक भी ले गए. आगे एक दूसरे गांव के लोगों ने भी मदद की.
पूरे दिन थकने के बाद जब हम वापस लौटे तो कारू को अपनी थकान से ज्यादा हमारी चिंता थी. बीती रात चाय की बात चली थी. उनके दिमाग में घूम रहा होगा. वे खुद शायद ही कभी चाय पीते हैं, लेकिन हमारे लिए जुगाड़ करके चाय बना दी. फिर रात में खाने की व्यवस्था. जंगल जाते हुए एक बाइक का ब्रेक टूट गया था. उस पर दो लोगों का बैठकर लौटना मुश्किल था. कारू ने कुछ महीने पहले ही शहर से सेकंड हैंड बाइक खरीदी थी. लौटते वक्त हमारी हालत देख, उन्होंने अपनी बाइक भी दे दी.
बिना कुछ सोचे-समझे. उस बाइक को वापस लाने के लिए उन्हें 35 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. जो वहां के लोग अक्सर सामान लाने के लिए करते हैं. अजनबी जगहों पर ऐसा प्यार मिलता है क्या? मैं वहां से लौटते हुए भावुक हो गया था. कारू ने हमारे लिए दिल खोल कर रख दिया. जंगल के भीतर ज्यादातर लोग ऐसे ही मिलते हैं. वहां जो प्यार मिला, वो शायद ही कहीं मिले!
जब कारू अपनी बाइक लेने आए तो अपने रिश्तेदार के फोन से कॉल किया. तब मैं नोएडा के अस्पताल में मलेरिया से लड़ रहा था. खूब बातें हुईं. जंगल में नेटवर्क नहीं है. लेकिन ओरछा (अबूझमाड़ का जंगल जहां शुरू होता है) आने पर BSNL का नेटवर्क मिल जाता है. कारू जब भी ओरछा आते हैं, एक बार बात जरूर करते हैं. सब पूछते हैं, शहर के बारे में, काम के बारे में. अपनी दो बेटियों की पढ़ाई के बारे में बताते रहते हैं.
कभी-कभी ये सोचकर सिहरन होती है कि जंगल और प्रकृति से प्यार करने वाले इन लोगों के साथ हम क्या कर रहे हैं. सरकारों ने क्या किया है? आज भी हम उन्हें उपनिवेश बनाने के अलावा क्या सोच रहे हैं? अबूझमाड़ के इस इलाके में ज्यादातर माड़िया आदिवासी रहते हैं. नारायणपुर में करीब 23 हजार की आबादी है. माड़िया विशेष रूप से कमजोर जनजाति समूहों (PVTGs) में आते हैं.
देश में इन आदिवासियों की संख्या करीब 28 लाख है. जहां भी जाएंगे, लगेगा कि सरकारों ने उन्हें भी अछूत मानकर छोड़ा हुआ है. बिहार में पिछले साल बिरहोर जनजाति के कुछ लोगों से मिला था. हर कोई बुनियादी चीजों से दूर है.
देश में अभी 75 PVTG समुदाय हैं. सरकार भी मानती है कि इन समुदायों के पास बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य और रहन-सहन की सुविधाएं नहीं पहुंची हैं. 2015 में केंद्र ने इनके विकास के लिए राज्यों को चिट्ठी लिखी थी. कहा गया था कि वे इन समुदायों के ‘संरक्षण के साथ विकास’ के लिए लॉन्ग टर्म प्लान बनाएं. 10 साल में मुझे तो कहीं कुछ नजर नहीं आता.
2023 के बजट में घोषणा हुई थी कि इन समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए ‘PM PVTG विकास मिशन’ शुरू किया गया था. उद्देश्य था इन आदिवासियों के लिए मूलभूत सुविधाओं यानी मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और कनेक्टिविटी जैसी चीजों की स्थिति में सुधार करना. तीन सालों के लिए 15 हजार करोड़ रुपये का बजट भी रखा गया. पैसे कहां जा रहे हैं, नहीं पता. आपको पता हो तो बताइएगा.
लेख Dainik Bhaskar के खोजी पत्रकार हैं, उनके फेसबुक वॉल से लिया गया लेख…
Last Updated on July 19, 2025 6:09 pm
