उर्दू की हिंदी से नज़दीकी (Urdu-Hindi Relationship)। कई ज़बानों के अक्षरों और शब्दों के सुंदर संगम का नाम उर्दू है। उर्दू में अरबी, फ़ारसी, तुर्की ,संस्कृत और हिंदी वगै़रा के बेशुमार अल्फ़ाज़ मौजूद हैं।लेकिन उर्दू जितनी हिंदी के क़रीब है इतनी किसी ज़बान के क़रीब नहीं है। क्योंकि उर्दू में हिंदी के अक्षरों ट ड ड़ तो अस्ल हालत में मौजूद हैं ही, हिंदी के अक्षर भ फ थ ठ झ छ ध ढ ढ़ ख घ भी शामिल हैं जिन्हें उर्दू की दो चश्मी ह ھ में मिला कर बनाया जाता है।
रोमन में इन क्षरो को बनाने के लिए अंग्रेजी़ का h लगाना पड़ता है जैसे,, Kh ph gh आदि आदि। हर्फ़ों के बाद लफ़्ज़ों की बारी आती है। उर्दू ने हिंदी संस्कृत के शब्दों को और हिंदी ने अरबी फ़ारसी और तुर्की के अल्फ़ाज़ को कभी ज्यों का त्यों और कभी उनके रूप बदलकर अपनाया है।
इस छोटे से लेख में ऐसे सैंकड़ों हज़ारों लफ़्ज़ों की लिस्ट पेश करना संभव नहीं। बस मिसाल के तौर पर उर्दू में सूर्य ने सूरज, चंद्र ने चांद, रात्रि ने रात का चोला पहन लिया तो मुद्दआ(مدعا) ने मुद्दा और फ़ुज़ूल ने फ़िज़ूल का रूप धारण कर लिया। और तो और क़लम इधर मुज़क्कर है तो उधर मुअन्नस।
जैसा कि मैंने पहले कहा उर्दू/ हिंदी भाषा एक दूसरे के जितना नज़दीक है इतनी निकटता दूसरी ज़बानों के बीच नहीं है। उर्दू में तमाम क्रियाएं हिंदी की हैं । अर्थात उर्दू का ख़िरामे-नाज़ (सुंदर व मन मोहक चाल )हिंदी की टांगों के बग़ैर मुम्किन नहीं। दोनों भाषाएं एक दूसरे के मिज़ाज में रचना बसना जानती हैं।
हिन्दी में आवश्यकतानुसार अक्षर के नीचे बिंदी लगाकर ज को ज़, फ को फ़, ख को ख़ बना लेना उर्दू के मिज़ाज से ताल मेल का बेहतरीन उदाहरण है। उर्दू अपने ख़ूबसूरत मुहावरों की वजह से दुनिया की बहुत सी बड़ी जबानों से भी अधिक धनी है। लेकिन दिल लेना ,दिल देना, नज़र लगना ,नज़र उतारना आदि आदि सभी हसीन तरीन मुहावरों में हिंदी की क्रिया लेना देना लगना उतारना के बग़ैर काम नहीं चल सकता।
उर्दू ,हिंदी की छोटी बहन तो है लेकिन उर्दू एक मुकम्मल ज़बान की हैसियत और पहचान रखती है ।इसका अपना एक शानदार माज़ी है। इसका अपना एक मुकम्मल साहित्य है। जिसकी आबयारी हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सब ने मिलकर की है।यह एक डेमोक्रेटिक और भाईचारे की ज़बान है।
जिस तरह अंग्रेज़ी ज़बान के अपने शेक्सपियर, मिल्टन ,वर्ड्सवर्थ ,जॉर्ज ऑरवेल , जेन ऑस्टिन और चार्ल्स डिकेंस वगै़रा-वगै़रा हैं, और हिंदी के तुलसीदास, सूरदास ,कबीर, रहीम, रसखान, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, मैथिली शरण गुप्त ,यशपाल, प्रेमचंद, भीष्म साहनी, आचार्य चतुर्सेन और शशि प्रभा शास्त्री वगै़रा वगै़रा हैं.
इसी तरह उर्दू के अपने मीर तक़ी मीर ,मिर्ज़ा ग़ालिब, मोमिन, दाग़ ,डॉक्टर इक़बाल, मीर अनीस , पंडित बृज नारायण चकबस्त, हसरत मोहानी, पंडित दयाशंकर नसीम, जिगर मुरादाबादी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, फ़िराक़ गोरखपुरी,मुंशी प्रेमचंद , सआदत हसन मंटो, कृष्ण चंद्र ,इस्मत चुग़ताई ,और ऐनी आपा वगै़रा-वगै़रा हैं।
और उर्दू का मुकम्मल ज़बान होने का एक और बड़ा सुबूत यह है कि हिंदी समेत देशी और विदेशी कितनी ही भाषाओं ने उर्दू के शानदार अदब को अपने पाठकों के लिए बड़े पैमाने पर परोसा है। और यह सिलसिला अब भी जारी है क्योंकि दूसरी जुबानों के पाठकों में उर्दू के मीर , ग़ालिब व मंटो वगै़रह को पढ़ने का ज़बरदस्त क्रेज़ है।
इसीलिए, भले ही उर्दू यहां ज़िन्दगी की जंग लड़ रही हो, अंतरराष्ट्रीय पटल पर हिन्दी की तरह ही छाई हुई है। विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग हैं तो उर्दू विभाग भी हैं। उर्दू की मिठास ,कोमलता, नज़ाकत, नफा़सत में अरबी से ज़्यादा बड़ा रोल फा़रसी का है।
और इज़ाफ़त शुदा अल्फ़ाज़, अंग्रेजी़ लफ़्ज़ों की तरह कुछ फ़ारसी लफ़्ज़ों की मुख़फ़्फ़ सूरत (short form) इख़्तियार करने की सलाहीयत ,मिसाल के तौर पर ख़ामोशी का ख़ामुशी या ख़मोशी हो जाना, और बेशुमार मुहावरे उर्दू की नस्रो -नज़्म को दिलकश और पुर असर बनाने में बड़ा अहम रोल अदा करते हैं ।
Zamir Darvaish के फेसबुक वॉल से…
Last Updated on August 7, 2025 9:47 am
