PM Modi Reels: जब देशभर के छात्र सरकार से जवाब मांगते हुए सड़कों पर उतर आए, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं से सीधे जुड़ने की कोशिश की. उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक ऐसा सेल्फी वीडियो पोस्ट किया, जो उनके आम वीडियो से काफी अलग था. मोदी ने कहा कि छात्रों की परेशानी से उन्हें दुख हुआ है और सरकार जरूरी कदम उठाएगी.
लेकिन छात्रों का गुस्सा इससे शांत नहीं हुआ. उल्टा, मोदी के पहले वीडियो के नीचे एक कमेंट तेजी से वायरल हुआ—“हम आपके दोस्त नहीं हैं.” इसके बाद प्रधानमंत्री ने युवाओं को संबोधित करते हुए पांच Gen Z स्टाइल के रील्स पोस्ट किए, लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है—क्या सोशल मीडिया की रीलें युवाओं की नाराजगी का जवाब बन सकती हैं?
परीक्षा विवाद से शुरू हुआ बड़ा संकट
यह पूरा विवाद उस हाई-प्रोफाइल मेडिकल प्रवेश परीक्षा को रद्द किए जाने के बाद शुरू हुआ, जिससे लाखों छात्र प्रभावित हुए. यह प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल में सामने आए सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक बन गया.
शुरुआत में मोदी के वीडियो काफी साधारण थे. बाद के वीडियो में कैमरा एंगल बदले, लाइटिंग बेहतर हुई, बैकग्राउंड बदले और प्रधानमंत्री खुद वीडियो को शुरू और खत्म करते नजर आए. यानी एक तरह से वे वन-मैन कंटेंट क्रिएटर की भूमिका में दिखाई दिए.
लेकिन युवाओं की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं रही.
विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी के लिए ये विरोध ऐसे समय आया जब पार्टी सत्ता के लिहाज से बेहद मजबूत स्थिति में थी. लेकिन छात्रों के आंदोलन ने उस चमक पर सवाल खड़े कर दिए और सरकार तथा युवाओं के बीच दूरी साफ दिखाई देने लगी.
आखिर युवाओं की आवाज कहां है?
यंग लीडर्स फॉर एक्टिव सिटिजनशिप की CEO शिप्रा बडूनी के मुताबिक, भारतीय राजनीति में युवाओं की सीधी भागीदारी लगातार कम हुई है.
2024 में संसद के लिए चुने गए सांसदों की औसत उम्र 56 साल तक पहुंच गई. यानी जिस देश में बड़ी आबादी युवा है, उसकी संसद में युवाओं की पर्याप्त आवाज नहीं है.
भारत में छात्र राजनीति की एक लंबी परंपरा रही है. यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्र संगठन लंबे समय से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों से जुड़े रहे हैं.
बडूनी कहती हैं कि छात्र राजनीति ने युवाओं को अपनी नाराजगी, गुस्सा और असहमति जाहिर करने का मंच दिया है. साथ ही राजनीतिक दलों और नेताओं को भी यह समझने का मौका मिला कि युवाओं के बीच क्या चल रहा है.
लेकिन पिछले करीब एक दशक में यह जगह लगातार सिकुड़ी है.
उनके मुताबिक, युवाओं से कहा जा रहा है कि उनका काम सिर्फ पढ़ाई करना है और राजनीति में शामिल होने की जरूरत नहीं है.
लेकिन फिर सवाल उठता है—अगर कोई युवा सरकार से नाराज है तो वह अपनी बात कहे कहां?
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सोशल मीडिया पर बोलना भी आसान नहीं?
बडूनी का कहना है कि अगर कोई युवा सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करता है, तो उसे भी कार्रवाई या निगरानी का डर रहता है. ऐसे में युवाओं के लिए अपनी नाराजगी जाहिर करने की जगह लगातार कम होती जा रही है.
हालांकि, उनका मानना है कि युवाओं से जुड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ केंद्र सरकार की नहीं है. स्थानीय पार्षद से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि तक को युवाओं के बीच जाना चाहिए और उनसे पूछना चाहिए कि उनकी असली परेशानियां क्या हैं.
BJP और Gen Z के बीच आखिर दिक्कत क्या है?
राजनीतिक वैज्ञानिक और लेखक अमित जुल्का के मुताबिक, बीजेपी युवाओं के गुस्से को समझने में एक बड़ी गलती कर रही है.
उनका कहना है कि बीजेपी ने लंबे समय तक WhatsApp वाली पीढ़ी को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनाई. लेकिन Gen Z का इंटरनेट कल्चर अलग है.
यहां मीम्स हैं, म्यूजिक है, व्यंग्य है और गुस्से को मजाकिया अंदाज में व्यक्त करने का तरीका भी है.
यही वजह है कि छात्रों के विरोध प्रदर्शन में जहां कुछ युवा बेहद शालीन तरीके से अपनी मांग रख रहे थे, वहीं कुछ ने गानों और नारों के जरिए अपना गुस्सा जाहिर किया. कुछ जगहों पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल भी हुआ.
और दिलचस्प बात ये रही कि सरकार की प्रतिक्रिया भी खुद मीम्स और नए कंटेंट का हिस्सा बन गई.
जुल्का के मुताबिक, अगर बीजेपी अब यह कहे कि वह Gen Z का कोड समझने जा रही है, तो भी उसका प्रयास स्वाभाविक नहीं बल्कि बनाया हुआ लगेगा.
आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन सवाल खत्म नहीं हुए
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद छात्रों का बड़ा आंदोलन खत्म हो गया. लेकिन उसके बाद राष्ट्रीय बहस का फोकस शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और परीक्षा सुधार से हटकर युवाओं के व्यवहार पर चला गया.
बीजेपी के कई नेताओं और समर्थकों ने सोशल मीडिया पर छात्रों की भाषा और प्रधानमंत्री के खिलाफ इस्तेमाल किए गए अपशब्दों पर नाराजगी जताई.
एक वायरल वीडियो में एक किशोरी ने प्रधानमंत्री और उनकी दिवंगत मां को लेकर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था.
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मोदी ने अपने एक रील में इस मामले का जिक्र करते हुए कहा कि वह समाज के गुस्से को समझ सकते हैं. उन्होंने कहा कि बेटियों को ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते देखना एक सांस्कृतिक झटके जैसा है और वह कानूनी कार्रवाई के बजाय उन्हें माफ करना पसंद करेंगे.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा कि सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता छात्रों की वास्तविक चिंताओं को समझना, उनका जल्द समाधान करना और उन्हें यह भरोसा दिलाना है कि उनकी आवाज सुनी जा रही है.
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक अमित जुल्का का मानना है कि इस तरह की घटनाओं के जरिए सरकार असहमति जताने वालों को कमजोर दिखाने की कोशिश भी कर सकती है.
उनके मुताबिक, इसके लिए हमेशा सीधे दमन की जरूरत नहीं होती. कभी-कभी इशारा भी काफी होता है.
तो फिर रास्ता क्या है?
युवा और नीतियों के बीच काम करने वाली शिप्रा बडूनी के मुताबिक, बीजेपी के पास अभी भी युवाओं से दूरी कम करने के रास्ते हैं.
सबसे पहला रास्ता है—मुद्दे पर वापस लौटना.
उनका सवाल सीधा है—जब छात्रों का आंदोलन भारत की शिक्षा व्यवस्था की उस नाकामी को लेकर था, जिसने लाखों युवाओं को प्रभावित किया, तो सरकार अब भी उसी मुद्दे पर खुलकर बात क्यों नहीं कर रही?
उनके मुताबिक, सरकार को अलग-अलग स्तरों पर युवाओं से सीधे बातचीत करनी चाहिए, उनकी समस्याओं को समझना चाहिए और जरूरी बदलाव करने चाहिए. साथ ही युवाओं पर और कार्रवाई करने से बचना चाहिए.
क्योंकि अगर युवाओं को यह संदेश दिया जाएगा कि उनकी आवाज तभी सुनी जाएगी जब वे सड़क पर उतरकर हंगामा करेंगे, तो फिर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की प्रेरणा ही क्यों बचेगी?
और शायद यही सबसे बड़ा सवाल है.
क्योंकि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद भी देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों के छोटे-बड़े प्रदर्शन सामने आ रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में सैकड़ों छात्रों ने बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर शांतिपूर्ण वॉकआउट किया. पश्चिम भारत के एक सरकारी स्कूल में छात्रों ने शिक्षकों की कमी को लेकर प्रदर्शन किया. जयपुर में तीन छात्र नेताओं ने छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी.
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ऐसे में प्रधानमंत्री की Gen Z वाली रीलें एकतरफा बातचीत तो हो सकती हैं, लेकिन क्या ये असली संवाद भी बन पाएंगी?
बडूनी के मुताबिक, अगर सरकार युवाओं से सीधे बात नहीं करती, तो ये रीलें उल्टा Gen Z को सरकार के खिलाफ और ज्यादा कंटेंट बनाने का मौका ही देंगी.
Last Updated on August 4, 2026 8:06 pm
