SC ruling on Aravali: पाकिस्तान पहुंचेगा मानसून, राजस्थान-हरियाणा-दिल्ली सूखे की चपेट में!

अरावली की यह दीवार कमजोर पड़ती है, तो मानसूनी हवाएं बिना टकराए आगे निकल जाएंगी। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ऐसी स्थिति में भारत के हिस्से की बड़ी मात्रा में बारिश पाकिस्तान की ओर बह सकती है, जबकि राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली जैसे इलाके सूखे की चपेट में आ सकते हैं।

Aravalli Hills Pakistan rainfall
Aravalli Hills Pakistan rainfall

नई दिल्ली:
अरावली पर्वतमाला को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने पर्यावरण संरक्षण से आगे बढ़कर अब रणनीतिक और जलवायु सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक अरावली की कानूनी परिभाषा में किया गया बदलाव सिर्फ खनन का रास्ता नहीं खोलेगा, बल्कि यह भारत के मानसून सिस्टम को कमजोर कर सकता है—जिसका सीधा लाभ पाकिस्तान को मिलने की आशंका है।

सुप्रीम कोर्ट ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया है कि 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा नहीं माना जाएगा। यह फैसला उस समय आया है जब पहले ही अरावली का बड़ा हिस्सा अवैध और अंधाधुंध खनन की भेंट चढ़ चुका है।

जब 90% पहाड़ कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएं

राजस्थान में अरावली की अनुमानित 1.60 लाख चोटियों में से केवल 1048 चोटियां ही 100 मीटर की ऊंचाई की शर्त पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि राज्य की 90 प्रतिशत से ज्यादा पहाड़ियां अब कानूनी रूप से अरावली नहीं मानी जाएंगी

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव कागज पर भले तकनीकी लगे, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर बेहद गंभीर होगा। खनन पर रोक की बात आदेश में जरूर है, लेकिन सच्चाई यह है कि अवैध खनन पहले से ही खुलेआम चल रहा है।

पहले ही तबाह हो चुकी है अरावली का बड़ा हिस्सा

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करने वाली सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान में अरावली की करीब 25% पहाड़ियां पहले ही नष्ट हो चुकी हैं। अलवर जिले में तो हालात और भयावह हैं, जहां 128 में से 31 पहाड़ियां पूरी तरह समतल हो चुकी हैं

विशेषज्ञों के अनुसार नई परिभाषा के बाद इस विनाश की रफ्तार और तेज हो सकती है।

मानसून की दीवार कमजोर हुई तो बारिश कहां जाएगी?

भूगोल और जलवायु विशेषज्ञ इस फैसले को भारत के मानसून के लिए खतरे की घंटी मान रहे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के मुताबिक, अरावली पर्वतमाला ही वह प्राकृतिक अवरोध है जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली मानसूनी हवाओं को रोककर उत्तर और पश्चिम भारत में वर्षा कराती है।

अगर अरावली की यह दीवार कमजोर पड़ती है, तो मानसूनी हवाएं बिना टकराए आगे निकल जाएंगी। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ऐसी स्थिति में भारत के हिस्से की बड़ी मात्रा में बारिश पाकिस्तान की ओर बह सकती है, जबकि राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली जैसे इलाके सूखे की चपेट में आ सकते हैं।

यानी मामला अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, राष्ट्रीय जल-सुरक्षा का बन चुका है।

खेती और नदियों की जीवनरेखा पर खतरा

अरावली से निकलने वाली बनास, चंबल, सहाबी, कासावती, गंभीरी और काटली जैसी नदियां पूर्वी राजस्थान की खेती की रीढ़ मानी जाती हैं। बारिश का पानी अरावली की चट्टानों में रिसकर साल भर इन नदियों और भूजल स्रोतों को जीवित रखता है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अरावली की संरचना प्रति हेक्टेयर सालाना लगभग 20 लाख लीटर भूजल रिचार्ज करने में सक्षम है। लेकिन अत्यधिक खनन के चलते कई इलाकों में भूजल स्तर 1000 से 2000 फीट तक नीचे चला गया है

रेगिस्तान दिल्ली की ओर बढ़ रहा है

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि अरावली में खनन के कारण अब तक 12 से ज्यादा बड़े गैप बन चुके हैं। इन दरारों के चलते थार रेगिस्तान की धूल दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच रही है, जिससे वायु प्रदूषण और गर्मी दोनों बढ़ रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, नई परिभाषा के बाद अगर खनन और बढ़ा, तो यह प्रक्रिया और तेज हो सकती है।

अभ्यारण और जैव विविधता भी संकट में

अरावली सिर्फ पत्थरों की श्रृंखला नहीं है। यही पर्वतमाला रणथंभौर, सरिस्का, मुकुंदरा, जवाई और झालाना जैसे अभ्यारणों की आधारशिला है। यहां पाई जाने वाली दुर्लभ वनस्पतियां और वन्य जीव पूरी दुनिया में विशिष्ट माने जाते हैं।

नई परिभाषा के बाद इन क्षेत्रों की कानूनी सुरक्षा कमजोर पड़ने का खतरा भी विशेषज्ञ जता रहे हैं।

खनन माफिया, हिंसा और गांवों का उजड़ना

नीमकाथाना, कोटपूतली, सीकर, झुंझुनूं और अलवर जैसे इलाकों में 550 से ज्यादा स्टोन क्रेशर और बजरी प्लांट सक्रिय हैं। रोजाना 1700 से अधिक डंपर सड़कों पर दौड़ते हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि

  • आबादी से महज 500 मीटर दूर ब्लास्टिंग हो रही है

  • हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं

  • गांवों पर खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है

  • बीते महीनों में 100 से ज्यादा सड़क हादसों में 40 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है

सवाल जो देश को सोचने पर मजबूर करते हैं

विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली को कमजोर करना सिर्फ राजस्थान का नुकसान नहीं है। यह

  • भारत के मानसून सिस्टम को कमजोर करता है

  • जल संकट को गहराता है

  • और अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान को मौसमीय लाभ पहुंचाता है

सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या खनन के नाम पर भारत अपनी बारिश, खेती और भविष्य की पीढ़ियों को जोखिम में डाल सकता है?

अरावली पर लिया गया यह फैसला आने वाले वर्षों में सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि भारत की जलवायु और राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा तय करेगा।

Last Updated on December 21, 2025 10:40 am

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