इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के 47 वर्षों के अस्तित्व में से 45 वर्षों तक अली खामेनेई (Ali Khamenei) ने देश की आंतरिक और बाहरी राजनीति पर लगभग पूर्ण नियंत्रण बनाए रखा।
रविवार को जब हवाई हमले में सर्वोच्च नेता की मौत की खबरें सामने आने लगीं, तो ईरानी शासन एक अभूतपूर्व स्थिति का सामना कर रहा था। ऐसे में सवाल उठता है—अब ईरान का क्या होगा? क्षेत्र का क्या होगा? दुनिया और भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा? ये अहम प्रश्न उस समय सामने हैं जब ईरानी बलों और अमेरिका-इजरायल गठबंधन के बीच संघर्ष जारी है।
खामेनेई की मौत का ईरान पर क्या मतलब?
सर्वोच्च नेता अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी ने 1979 में पहलवी शासन को हटाकर ईरानी क्रांति का नेतृत्व किया और इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना की। दो साल बाद अली खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति बने। 1989 में उन्होंने खुमैनी के निधन के बाद सर्वोच्च नेता का पद संभाला।
खामेनेई ने धर्मतांत्रिक राज्य को एक शक्तिशाली खिलाड़ी में बदल दिया और अमेरिका व इजरायल के कट्टर विरोधी के रूप में स्थापित किया। उन्होंने पूरे क्षेत्र में प्रॉक्सी नेटवर्क खड़ा किया—जिसे “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” कहा जाता है। उनके कार्यकाल में ईरान ने स्वदेशी तकनीक और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के रूप में मजबूत सैन्य ताकत विकसित की।
अमेरिका ने इसके जवाब में प्रतिबंध लगाए, जिससे व्यापक आर्थिक संकट पैदा हुआ। आंतरिक स्तर पर खामेनेई ने राजनीतिक विपक्ष, सिविल सोसाइटी और सड़कों पर उतरने वाले आम लोगों के विरोध को कठोरता से कुचला। दिसंबर और जनवरी में हुए बड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान हजारों लोगों की मौत हुई।
उनकी मौत के बाद ईरानी सड़कों पर दो तरह की तस्वीरें दिखीं। सोशल मीडिया पर इस्फहान, तेहरान और शिराज में जश्न के दृश्य दिखाई दिए, जबकि सरकारी टीवी पर लोगों को शोक मनाते और रोते हुए दिखाया गया।
अब ईरान में क्या होगा?
खामेनेई के अलावा ईरानी शासन के कई वरिष्ठ सदस्य भी मारे गए हैं। सरकारी समाचार एजेंसी IRNA ने मेजर जनरल मोहम्मद पकपौर की मौत की घोषणा की, जिन्होंने पिछले जून 12 दिन के युद्ध में इजरायल द्वारा पिछले कमांडर की हत्या के बाद IRGC की कमान संभाली थी। खामेनेई के लंबे समय से शीर्ष सुरक्षा सलाहकार अली शामखानी की भी मौत हुई।
हालांकि खामेनेई के उत्तराधिकारी की तैयारी वर्षों से चल रही थी, क्योंकि उनकी खराब सेहत की खबरें आती रही थीं। फिलहाल तीन संभावित परिदृश्य हैं:
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शासन की निरंतरता
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सैन्य अधिग्रहण
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शासन का पतन
पहले विकल्प को सुनिश्चित करने के लिए शासन सक्रिय है।
88 सदस्यीय धार्मिक निकाय—असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स—खामेनेई के उत्तराधिकारी का चयन करेगा। तब तक राष्ट्रपति सहित एक अस्थायी परिषद संक्रमण की देखरेख करेगी।
संभावित दावेदार
मई 2024 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत के बाद, खामेनेई ने कथित रूप से तीन धर्मगुरुओं के नाम सुझाए थे। नाम सार्वजनिक नहीं हुए, लेकिन संभावित चेहरों में शामिल हैं:
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होज्जत-ओल-इस्लाम मोहसिन कोमी
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अयातुल्ला मोहसिन अराकी
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अयातुल्ला गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई
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अयातुल्ला हाशेम हुसैनी बुशेहरी
ये सभी खामेनेई के वफादार माने जाते हैं। एजेई को छोड़कर किसी के पास शीर्ष प्रशासनिक अनुभव नहीं है। सामूहिक नेतृत्व की भी चर्चा है, हालांकि खामेनेई के समय इसे समर्थन नहीं मिला था।
संभावित उम्मीदवारों में इस्लामिक रिपब्लिक के संस्थापक के पोते हसन खुमैनी का नाम भी चर्चा में है।
क्या सेना सत्ता संभाल सकती है?
दूसरा परिदृश्य सैन्य अधिग्रहण का है। IRGC शासन के हितों की रक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है। विरोध प्रदर्शनों को दबाने में रिवोल्यूशनरी गार्ड और बसीज मिलिशिया अहम रहे हैं।
ऐसे में सैन्य पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति की नियुक्ति शासन की स्थिरता के लिए आकर्षक विकल्प हो सकती है। संसद के स्पीकर और खामेनेई के करीबी अली लारीजानी संभावित दावेदार माने जा रहे हैं। हालांकि IRGC की साख को भी झटका लगा है, क्योंकि वह अपने शीर्ष नेतृत्व और संसाधनों की रक्षा नहीं कर सका।
क्या शासन परिवर्तन संभव है?
तीसरा परिदृश्य शासन का पतन है—जो ट्रंप प्रशासन का घोषित लक्ष्य रहा है और जिसे इजरायली नेतृत्व समर्थन देता रहा है।
ट्रंप ने कहा है कि “यह ईरानी जनता के लिए अपना देश वापस लेने का सबसे बड़ा मौका है।”
लेकिन शासन को गिराना आसान नहीं है। इसके लिए जमीनी समर्थन, हथियारों की आपूर्ति और सैन्य तैनाती की जरूरत होगी। यह रणनीतिक और राजनीतिक निर्णय होगा, खासकर ट्रंप के MAGA आधार को संतुलित करते हुए।
यदि शासन गिरता है, तो अमेरिका को नए नेतृत्व की व्यवस्था भी करनी होगी।
क्षेत्रीय तनाव
ईरान ने कतर, बहरीन, यूएई, कुवैत, सऊदी अरब और जॉर्डन सहित कम से कम छह देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए हैं। यूएई के कुछ नागरिक इलाकों को भी निशाना बनाया गया है।
संघर्ष के फैलाव से खाड़ी और मध्य पूर्व में अनिश्चितता बढ़ गई है। सऊदी अरब और यूएई के बीच हालिया तनाव कम होते दिख रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप को ईरानी नेतृत्व को निशाना बनाने के लिए इजरायल और सऊदी अरब ने राजी किया।
दुनिया पर असर
ईरान ने 21 किमी चौड़े होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है, जिससे लगभग 20% वैश्विक तेल आपूर्ति गुजरती है। इससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
यदि अमेरिकी बेड़ा जलडमरूमध्य खोलने के लिए मजबूर होता है, तो संघर्ष और बढ़ सकता है। पूर्ण युद्ध और अस्थिर ईरान के लिए दुनिया तैयार नहीं है।
भारत पर प्रभाव
खाड़ी और मध्य पूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं। इनकी सुरक्षा भारत की प्राथमिकता है। अनुमान है कि भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस का लगभग 38% हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।
ऊर्जा सुरक्षा पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। भारत के लगभग 60% ऊर्जा आयात इसी क्षेत्र से आते हैं—तेल का लगभग 50% और LNG का 70% हिस्सा।
ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने पर भारतीय अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लग सकता है, खासकर तब जब रूस से तेल खरीदने पर पहले से दबाव बना हुआ है।
निष्कर्ष
अली खामेनेई की मौत केवल ईरान की आंतरिक राजनीति का मुद्दा नहीं है। यह मध्य पूर्व की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत की रणनीतिक स्थिति से जुड़ा सवाल है।
अब यह देखना होगा कि ईरान सत्ता की निरंतरता चुनता है, सैन्य नियंत्रण की ओर बढ़ता है या फिर किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन का सामना करता है। आने वाले दिन न केवल ईरान, बल्कि पूरी दुनिया के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
Last Updated on March 1, 2026 7:08 pm
