Panchayat season 4 Cast: Jitendra Kumar, Raghubir Yadav, Neena Gupta, Faisal Malik, Chandan Roy, Sanvikaa, Durgesh Kumar, Sunita Rajwar, Ashok Pathak, and Pankaj Jha
प्रिय फेसबुक वासियों,
मैं कुशल मंगल से हूं. आशा है आप भी होंगे. काफी दिनों बाद आपको लिख रहा हूं. लिखना इसलिए पड़ रहा है क्योंकि फुलेरा में पिछले दिनों घटी घटनाओं पर क्रिया- प्रतिक्रिया काफी तेज़ हैं. मैंने काफी विचार के बाद तय किया कि आपके साथ इस विषय पर कुछ साझा किया जाए.
दोस्तो, फुलेरा के रिजीम चेंज को मेरा समर्थन इस सीज़न से पहले ही था, इसलिए जब प्रधान जी की प्रधानी गई तो मुझे बहुत दुख नहीं हुआ. लोकतंत्र पालने वाले हर देश और समाज को समझना चाहिए कि सत्ता रोटी की तरह है, जिसे आंच पर उलटते पलटते रहना चाहिए.
हमने अभी तक के सभी सीज़न में बृजभूषण दुबे उर्फ प्रधान जी का शासन देखा है जो असल में प्रधान हैं भी नहीं. उनकी पत्नी मंजू देवी असल प्रधान हैं लेकिन देखने में यही आया कि वो प्रधान पति बनकर एकछत्र शासन चला रहे हैं. प्रधान जी ना केवल मंजू देवी को निर्णय लेने से रोकते रहते हैं बल्कि उनके प्रभाव में उप प्रधान प्रह्लाद पांडे तक अकर्मण्य बने हैं.
सरकारी कामकाज के लिए रखा गया विकास शुक्ला केवल प्रधान जी का दुमछल्ला है. हद तो तब हो गई जब पंचायत सचिव अभिषेक त्रिपाठी उनके राजनीतिक प्रचार तक में साथ दिखा. एक सरकारी कर्मचारी को चुनावी कार्य में लगाने का चक्कर ही था जिसके चलते इंदिरा की कुर्सी गई और फिर डेढ़ साल इमरजेंसी लगी. प्रधान जी को सरकारी नौकरों से राजनीतिक प्रचार कराने में कोई हिचक नहीं दिखती.
हिचक उन्हें पंचायत कार्यालय के भीतर और सड़क पार सार्वजनिक स्थान पर मद्यपान तक में नहीं. प्रधान जी अब तक मुख्य मार्ग से गांव तक आने वाली कच्ची सड़क को पक्का नहीं करा सके, अलबत्ता स्थानीय विधायक को पूरे गांव का शत्रु बना दिया. उन्होंने बड़ी चालाकी से अपनी मिसहैंडलिंग को गांव के स्वाभिमान का मुद्दा बनाकर बातचीत डीरेल कर दी.
बंदूकें निकल आईं जिससे लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति बिगड़ने के कगार पर पहुंची. ताज़ा सीज़न में इस बात का संकेत मिलने के बावजूद की गोली विधायक ने नहीं चलवाई उन्होंने प्रचार में फिर भी यही दोहराया. उप प्रधान प्रह्लाद पांडे और अन्य सहयोगियों के चेहरे पर इस बयान पर काफी असंतोष था लेकिन चुनावी मौके में वो चुप्पी लगाए रहे. ये बात स्पष्ट है कि ‘हमारे कंधे पर गोली लगने से तुमको विधायकी का टिकट मिल जाता है, रिंकी की मम्मी इलेक्शन जीत जाती है और गांव का सड़क बन जाता है तो ऐसी गोली खाने से हमको कोई दिक्कत नहीं है’ जैसे वाक्य केवल हाई लेवल मैनिपुलेशन हैं.
प्रधान जी यहां दिखाते हैं कि उनके गोली खाने से दूसरों के काम हो रहे हैं जबकि वो जानते हैं कि तीनों काम हो गए तो सत्ता मज़बूत उनकी होगी. आपको ध्यान रखना चाहिए कि चक्का वाला कुर्सी मामले में वो पंचायत सचिव तक से इनसिक्योर हो गए थे और तब भी मैनिपुलेशन किया था.
आप इन सब बातों को दरकिनार कर दें तो भी प्रधान जी एक जातिवादी व्यक्ति दिखाई देते हैं. उनके निकट सहयोगियों के उपनामों पर ध्यान दें. इसके विपरीत भूषण शर्मा उर्फ बनराकस के निकट सहयोगियों बिनोद और माधव की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति किसी से छिपी नहीं. खुद हम सभी ने बनराकस का घर देखा है जो प्रधान जी के भव्य घर की तुलना में एकदम सादा है. ये भी ध्यातव्य है कि बनराकस गांव के उस पूर्वी हिस्से से आते हैं जो उपेक्षित पड़ा है.
राजनीतिक कारणों से इस हिस्से के विकास पर कभी प्रधान जी ने ध्यान नहीं दिया. उनके घर के सामने नाली साफ है और सोलर लाइट तक लगी है लेकिन शेष गांव की स्थिति उनके अपने सगे ससुर ने देख जो कुछ कहा, मुझे विश्वास है पंचायत सचिव महोदय को भविष्य के सीज़न में भी याद रहेगा. वैसे खुद उनकी भूमिका असंदिग्ध नहीं है. वो चुनाव में ना केवल पक्षधरता करते दिखे बल्कि इसके पूर्व में भी जितने मसले हुए उन्होंने उसे उलझाया है.
हैरानी पहली बार तब हुई थी जब वो गांव में लगे सीसीटीवी की फुटेज डिलीट करने को तैयार हो गए ताकि बनराकस को मारपीट का सबूत हाथ ना लगे. इसके बाद वो निरंतर गांव की राजनीति में एक पक्ष होते चले गए. शादी के दौरान वो गणेश से चक्का वाला कुर्सी पर अड़ गए, फोटो लेने गए तो फकौली बाज़ार में बबलू से उलझे, विधायक के साथ उनकी तनी, ताज़ा सीज़न में वो छुट्टन को थप्पड़ मारते दिखे. अस्पताल के सामने भी उनका हिंसक व्यवहार हम सबने देखा. कानून की राह लेने के बजाय वो जिस तरह हर बार निजी हुए ये किसी तरह एक सरकारी कर्मचारी को शोभा नहीं देता.
फिलहाल वो रिंकी के साथ व्यस्त हैं जो दिखाता है कि अगर भविष्य में उन्हें क्रांति देवी शर्मा का सचिव बनना पड़ा तो संभवत: कामकाज के दौरान निष्पक्षता न बरत सकें. विकास के बारे में तो कुछ कहना व्यर्थ है क्योंकि वो इसी गांव का न केवल वासी है बल्कि साफ साफ प्रधान जी की पार्टी का कार्यकर्ता है.
विकास कार्यों के पैरामीटर पर प्रधान जी असफल हैं. ना सड़क बन रही हैं, ना गांव में सफाई है, ट्रांसफॉर्मर फुंकने की स्थिति में बिजली कर्मचारी तक नहीं. हम सभी को मालूम है ना टंकी की सफाई होती है, ना पंचायत ऑफिस के आसपास की घास कटी है. बच्चों के स्कूल की टॉयलेट का हाल देख तो सब उल्टी करते हैं. मंदिर के भंडारे में योगदान भी प्रधान जी प्रतिस्पर्धा में कर रहे हैं और इस सीज़न में साफ सफाई भी.
जनरेटर का मसला पुराना नहीं. वहां भी हमने होड़ देखी है. उनसे बेहतर काम मंजू देवी ने बोनस ऐपिसोड्स में किए हैं लेकिन उनकी अपनी कोई छवि नहीं. पूरा गांव जानता है कि वो प्रधान जी की छाया में हैं. मुझे संदेह है कि सोलर लाइट जैसा बंदरबांट उन्होंने किया, हो सकता है बाकी योजनाओं में वो भ्रष्टाचार करते रहे हों. उन पर करप्शन का आरोप लगा भी है. बस इतनी गनीमत है कि उन्होंने प्रह्लाद पांडे के शहीद बेटे के नाम वोट नहीं मांग लिए, हो सकता है विधानसभा चुनाव के लिए बचाकर रखा हो.
हम नहीं जानते कि क्रांति देवी या उनके पति बनराकस गांव को कैसे चलाएंगे लेकिन कौन जानता है कि वो प्रधान जी से बेहतर साबित हों. कम से कम अवसरों को भंजा लेने में उनका कोई सानी नहीं. अब तक वो अपनी तमाम ख़ामियों के बावजूद सत्ता के विरुद्ध एक मज़बूत विपक्ष बनकर भूमिका निभा रहे थे और अब शानदार चुनावी प्रबंधन से जीत कर आए हैं.
ऐसा नहीं कि बनराकस साम, दाम, दंड, भेद नहीं करते परंतु जिससे उनका सामना है वो भी ये सब कर रहा है. ऐसे में फुलेरा के सामने क्या विकल्प था? ये अच्छे बुरे के बीच का युद्ध था नहीं, बल्कि साफ साफ दो राजनीतिक ताकतों का घर्षण है. बनराकस को मैंने कहीं जाति, धर्म की राजनीति करते नहीं देखा. उन्होंने हमेशा बातचीत से विवाद हल करने को तरज़ीह दी. एक ग्राम प्रधान की जो ट्यूनिंग स्थानीय विधायक से होनी चाहिए ताकि गांव के विकास कार्य अनवरत चलें वो बनराकस की रही.
मद्यपान हो या धूम्रपान उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से नहीं किया. उनकी राजनीति का आधार सामान्य जन की बुनियादी समस्याएं रही हैं. उन्होंने अब तक सत्ता की आंख में आंख मिलाकर दलीलें रखी हैं. ताज़ा सीज़न में उन्होंने अपने रूठे हुए समर्थक को मना कर दिखा दिया कि संगठन क्षमता भी सवालों से परे है. बनराकस की लोकप्रियता का कारण उनकी सादगी और जनता से सीधा जुड़ाव है.
मुझे उनमें तभी संभावना दिखी थी जब वो सरकारी स्तर से चले नारे – दो बच्चे मीठी खीर, उससे ज़्यादा बवासीर पर आपत्ति कर रहे थे. ये नारा ना केवल बच्चों के प्रति असंवेदनशील था, बल्कि बवासीर से पीड़ित मरीज़ों के लिए भी अपमानजनक था. वो ये भांप गए थे कि आम जन ऐसे नारों का प्रतिकार करने में उनका साथ देगा. इसका प्रमाण हमें मिला जब बीडीओ साहब ने फोन पर पंचायत सचिव को सूचित किया कि ज़िले भर में विरोध हुआ है और डीएम ने अब निर्णय वापस ले लिया है.
जनता की नब्ज़ पकड़ने की इस हुनर ने आज बनराकस की पार्टी को 73 वोट से फुलेरा में विजयी बनाया है. सत्ता से सदा दूर रहे माधव का सीज़न के अंतिम दृश्यों में प्रह्लाद से पूछना कि जब वो पहली बार उप प्रधान बने थे तो कैसा लगा था, समाज के सबसे पिछड़े वर्ग की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है. थोड़ी देर बाद जीत की घोषणा हुई और माधव कहते हैं- सच में प्रह्लाद भाई बहुत अच्छा लगता है. माधव की ये अभिव्यक्ति लोकतंत्र के सुनहरे पक्ष को उजागर करती है.
इसी पक्ष को देखने के लिए 75 साल पहले भारत ने लोकतंत्र को अपनाया था और इसीलिए हम सभी को फुलेरा के इस रिजीम चेंज का स्वागत करना चाहिए. शुभकामनाएं देनी चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि बनराकस एक और प्रधान जी ना बनें.
Last Updated on July 1, 2025 11:20 am
