जॉली एलएलबी 3 में सुभाष कपूर ने बीकानेर टु बॉस्टन के रूपक के बहाने काशी को क्योटो और दिल्ली को सिंगापुर बनाने की झूठी चमक-दमक वाली सियासत के कुचक्र को सिनेमा के माध्यम से उघाड़ने और इसके लिए सिस्टम को घेरने की हिम्मत दिखाई है. इसके लिए सुभाष बधाई के हक़दार हैं. सुभाष कपूर पत्रकार रहे हैं और उनकी फिल्मों में मसाला सिनेमा के दायरे में एक संजीदा कोशिश रहती है. जॉली एलएलबी 3 मसाला सिनेमा के सांचे में एक पॉलिटिकल फिल्म है. फिल्म भट्टा परसौल के किसान आंदोलन से प्रेरित बताई गई है.
विकास के लिए भूमि अधिग्रहण का मुद्दा राजनीति में गरमाया हुआ है. किसानों की ज़मीन सस्ते में लेकर उसे कॉरपोरेट को व्यावसायिक हितों के लिए सौंप देने के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए सुभाष कपूर ने अक्षय कुमार, अरशद वारसी, सौरभ शुक्ला, सीमा बिस्वास, गजराज राव, राम कपूर, हुमा कुरेशी, अमृता राव के किरदारों के ज़रिये जो कहानी कही है, वह हल्के-फुल्के अंदाज़ के बावजूद गंभीर प्रभाव छोड़ती है.
सुभाष कपूर ने जॉली एलएलबी की पहली फिल्म में अरशद वारसी को नायक लेकर जो जनपक्षधर सिनेमा रचा था, तीसरी कड़ी में वह फिर उस पर लौटे हैं. वहां बीएमडब्ल्यू कांड की झलक थी, ‘फुटपाथ सोने के लिए नहीं होते’ जैसा संवाद था. यहां विकास के नाम पर छोटे किसानों, कर्ज़, आत्महत्याओं की बात है.
सीमा बिस्वास अरसे बाद किसी दमदार भूमिका में दिखी हैं. व्यवस्था की साज़िश का शिकार होकर खुदकुशी कर चुके एक किसान की गांधीवादी सत्याग्रही किस्म की पत्नी जानकी की भूमिका में उन्होंने कम संवादों के बावजूद अपनी प्रतिभा बखूबी दिखाई है. उनकी बकरी कहीं न कहीं मासूमियत और बेचारगी के साथ-साथ गांधी से भी जोड़ देती है. मुक्तिबोध की तस्वीर देख कर वह लाइन याद आ गई- कैसी ट्रेजेडी है नीच.
फिल्म में दो दो जॉली हैं- अरशद और अक्षय. चूंकि सबसे पहले अरशद वारसी जगदीश त्यागी उर्फ जॉली के किरदार में नज़र आए थे इसलिए सुभाष कपूर ने अक्षय कुमार से एक संवाद में उनको सीनियर कहलवा दिया है. काम दोनों का ही अच्छा है लेकिन अरशद वारसी बेहतर लगे. मगर दोनों पर भारी पड़े हैं जज सुंदर लाल त्रिपाठी की भूमिका में सौरभ शुक्ला. अदालती दृश्यों में भाषणबाज़ी कम की जा सकती थी. फिल्म यह सवाल पूछती है कि विकास के नाम पर कुर्बानी के लिए गरीब ही क्यों आगे आए ?
धनकुबेर खलनायक हरि भाई खेतान के किरदार में गजराज राव का अभिनय तो अच्छा है लेकिन उनका किरदार लिखने में शायद उतनी कसावट नहीं आ पाई. फिल्म की लंबाई कम होती तो असर और अच्छा हो सकता था. संगीत कतई याद रखने लायक नहीं हैं. मेरी राय में तो इस फिल्म में गानों की ज़रूरत ही नहीं थी.
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से..
Last Updated on September 20, 2025 1:14 pm
