‘फ्री दवा योजना’ और बच्चों की मौत! गरीबों के बच्चों की जान सस्ती क्यों?

Cough Syrup Case: राजस्थान में मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना के तहत मिलने वाले खांसी सिरप ने एक बार फिर बच्चों की जान ले ली। भरतपुर जिले के वैर क्षेत्र के लुहासा गांव में 2 साल के बच्चे की मौत के बाद गांव में मातम है, लेकिन असली सवाल यह है कि जब यह सिरप पहले से ही विवादों में था, ब्लैकलिस्टेड था, और बार-बार फेल हो रहा था—तो सरकार और स्वास्थ्य विभाग इसे क्यों बांट रहे थे?

मौत की कड़वी हकीकत

निहाल सिंह का दो साल का बेटा तीर्थराज जुकाम-खांसी से पीड़ित था। 23 सितंबर को परिजन उसे वैर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए। डॉक्टर ने खांसी की वही सिरप लिख दी, जो योजना के तहत मुफ्त मिलती है। बच्चा सिरप पीकर सो गया… और फिर कभी उठ नहीं पाया। चार दिन की जद्दोजहद के बाद जयपुर के जेके लोन अस्पताल में उसकी मौत हो गई।

यह वही सिरप है, जिससे पहले भी सीकर और भरतपुर में बच्चों की हालत बिगड़ चुकी थी।

मौत के सौदागर कौन?

अब खुलासा हो रहा है कि यह कफ सिरप ‘डेक्स्ट्रोमेथोर्फन हाइड्रोब्रोमाइड’ केयसंस फार्मा कंपनी का है। हैरानी की बात यह है कि—

  • यह कंपनी पहले से ही ब्लैकलिस्टेड थी।

  • सिर्फ दो साल में 40 बार इसके सैंपल फेल हुए

  • इसके बावजूद सिरप धड़ल्ले से सरकारी अस्पतालों में बांटा गया।

सरकार के लिए सवाल सीधा है—क्या बच्चों की जान मुफ्त दवा योजना की ‘साइड इफेक्ट’ लिस्ट में शामिल थी?

‘नि:शुल्क दवा योजना’ या ‘नि:शुल्क मौत योजना’?

राजस्थान में यह योजना गरीबों को राहत देने के लिए शुरू की गई थी। लेकिन जब मुफ्त दवा ही जानलेवा साबित हो रही है, तो फिर यह योजना राहत से ज्यादा भय का कारण क्यों बन गई है?

गांव-गांव में लोग दवा लेने से डर रहे हैं। बच्चे बीमार हों तो परिजन सोच में पड़ जाते हैं कि अस्पताल ले जाएं या न ले जाएं। यह भरोसे का संकट है, और भरोसा एक बार टूट जाए तो वापस नहीं आता।

राजनीति और सिस्टम पर सवाल

कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सीधे सवाल उठाए हैं—
👉 जब सीकर, जयपुर, झुंझुनू और बांसवाड़ा में इसी दवा से बच्चे बीमार पड़े और मौतें हुईं, तब सरकार ने कंपनी पर कार्रवाई क्यों नहीं की?
👉 ब्लैकलिस्टेड कंपनी की दवाएं सरकारी अस्पतालों में पहुंचीं कैसे?
👉 अगर 40 बार सैंपल फेल हुए थे, तो स्वास्थ्य विभाग सोया क्यों रहा?

सवाल तो और भी हैं—

  • क्या गरीबों के बच्चों की जान इतनी सस्ती है कि उन्हें एक्सपायरी और फेल दवाएं पिला दी जाएं?

  • क्या इस सिस्टम में डॉक्टर से लेकर मंत्री तक किसी की कोई जवाबदेही नहीं है?

  • क्या स्वास्थ्य विभाग का मतलब अब सिर्फ टेंडर और सप्लाई चेन तक ही सीमित रह गया है?

मौत के बाद की औपचारिकताएं

मामला मीडिया में आया तो स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी ने सिरप का वितरण रोक दिया। जांच बैठ गई। रिपोर्ट बन रही है। कागज खड़खड़ा रहे हैं। लेकिन सवाल वही पुराना है—क्या जांच की फाइलें भी उस मासूम की जिंदगी लौटा सकती हैं?

नतीजा

सरकारें बदलती हैं, योजनाओं के नाम बदलते हैं, लेकिन हालात नहीं बदलते। नि:शुल्क दवा योजना का असली चेहरा यही है—गरीब की झोली में मौत डाल दी जाती है और जिम्मेदार लोग बयान जारी करके आगे बढ़ जाते हैं।

जब ब्लैकलिस्टेड दवा बच्चों तक पहुंच रही है तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि अपराध है। और अपराधियों को केवल फार्मा कंपनी तक सीमित मानना भी ग़लत होगा—यह पूरा सिस्टम ‘दरिंदे’ बन चुका है, जो बच्चों तक की जान नहीं बख्शता।

Last Updated on October 3, 2025 12:55 pm

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