– कृष्णा राव
दशकों से पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (POK) की स्थिति दक्षिण एशिया के सबसे भावनात्मक और विवादित मुद्दों में रही है। भारत और पाकिस्तान द्वारा नियंत्रित कश्मीर के हिस्सों को बांटने वाली नियंत्रण रेखा (LoC) भारत के लिए एक तरफ “अधूरा एजेंडा” का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ यह एक बड़ी सुरक्षा चुनौती भी है।
भारत और पाकिस्तान – दोनों देशों में ऐतिहासिक दुश्मनी ने कई बार फैसलों, बयानों, नीतियों और सैन्य बयानबाज़ी को प्रभावित किया है। कई बार ऐसे राजनेता टिप्पणी करते हैं जिनके पास सामरिक समझ का अभाव होता है, और कई बार सक्रिय या पूर्व सैन्य अधिकारी बढ़-चढ़कर दावे करते हैं। भारत में बड़ी आबादी यह मानती है कि POK को वापस लेना एक वास्तविक संभावना है, जबकि पाकिस्तान भारत के हिस्से को IIOJK कहकर प्रचार करता है। दोनों देशों के लोगों के बीच disconnect ऐतिहासिक कारणों से ही पैदा हुआ है।
लेकिन परमाणु प्रतिरोध वाले इस युग में, वैश्विक कूटनीति और असममित युद्ध के दौर में सवाल उठता है—क्या आज भारत सैन्य कार्रवाई के ज़रिये POK वापस ले सकता है?
इस प्रश्न का निष्पक्ष विश्लेषण—रणनीतिक, सामरिक, कूटनीतिक, भौगोलिक और राजनीतिक बाधाओं तथा संभावित रास्तों—को समझना आवश्यक है।
रणनीतिक और भू-राजनीतिक पहलू
भारत की नीति स्पष्ट है: भारत POK को पाकिस्तान द्वारा “ग़ैर-क़ानूनी रूप से कब्ज़ा किया हुआ” क्षेत्र मानता है। वर्षों से भारत यह साफ संकेत देता रहा है कि POK की स्थिति किसी भी वार्ता में समझौते का विषय नहीं है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान के लिए यह क्षेत्र उसकी सैन्य-सोच में गहराई से समाहित है—यह पाकिस्तान को रक्षात्मक गहराई, पहाड़ी भूगोल का फायदा और LoC के पार घुसपैठ के लिए staging zone देता है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। ऐसे में कोई भी बड़े पैमाने की सैन्य कार्रवाई अत्यधिक जोखिम भरी है, जहां escalation threshold कम हो जाते हैं और परमाणु प्रतिरोध प्रमुख कारक बन जाता है।
इसके अलावा, चीन की भूमिका भी महत्व रखती है। CPEC जैसे प्रोजेक्ट, निवेश और सामरिक हित पाकिस्तान के पश्चिमी हिस्से को चीन के लिए भी अहम बनाते हैं। भारत की किसी भी कार्रवाई पर बीजिंग की प्रतिक्रिया अवश्य जुड़ेगी।
भूगोल और ज़मीन की सच्चाई: एक पहाड़ी चुनौती
POK कोई समतल क्षेत्र नहीं है। इसका बड़ा हिस्सा बेहद कठिन पहाड़ों में बसा है—लीपा वैली, नीलम वैली, गिलगिट-बाल्टिस्तान जैसी जगहें, जहां रसद और सैनिकों की आपूर्ति बेहद कठिन है और ‘defender advantage’ सबसे मजबूत होता है।
ऐतिहासिक तौर पर भी यह साबित हुआ है—जैसे 1965 में हाजी पीर पास को भारतीय सेना ने जीत लिया था, लेकिन बेहद कठिन भूगोल और परिस्थितियों ने इसे एक कठिन अभियान बनाया।
साफ है—क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लेना एक बात है, लेकिन उसे स्थायी रूप से पकड़कर रखना बिल्कुल अलग चुनौती है।
सैन्य तैयारी और अभियान की व्यवहार्यता
हाल के अभियानों से पता चलता है कि भारत सटीक स्ट्राइक करने की क्षमता बढ़ा चुका है। उदाहरण के लिए, मई 2025 के ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में भारत ने पाकिस्तान तथा POK में आतंकी ढांचे को निशाना बनाया। इसे “फोकस्ड, मीज़र्ड और नॉन-एस्कलेटरी” बताया गया।
भारत ने दावा किया कि लीपा वैली–POK क्षेत्र में पाकिस्तानी सैन्य संरचना को भारी नुकसान पहुंचा, और पाकिस्तान को इसे फिर से खड़ा करने में 8–12 महीने लगेंगे।
यह दिखाता है कि भारत सीमित offensive action करने में सक्षम है। लेकिन POK को पूरा ‘वापस लेने’ का अभियान इससे बिल्कुल अलग और कहीं अधिक विशाल स्तर का होगा।
मुख्य सैन्य चुनौतियाँ
1. फोर्स रेशियो और लॉजिस्टिक्स: पहाड़ी युद्ध में रक्षक को लाभ होता है। हमलावर को कई गुना अधिक सैनिक, हथियार और रसद की आवश्यकता होती है। क्या वर्तमान भारतीय तैनाती इस क्षमता के लिए पर्याप्त है?
2. इलाके पर नियंत्रण: क्षेत्र पर कब्ज़ा होने के बाद insurgency, आपूर्ति, प्रशासन और स्थिरता बनाए रखना सबसे भारी बोझ होगा।
3. एस्कलेशन कंट्रोल: यदि पाकिस्तान इसे अस्तित्वगत खतरा समझे, तो सैन्य escalations या परमाणु threshold तक पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। चीन की प्रतिक्रिया भी इसमें जुड़ जाती है।
4. अंतरराष्ट्रीय माहौल: बड़े युद्ध पर वैश्विक दवाब—प्रतिबंध, मध्यस्थता, आर्थिक प्रभाव—सब भारत को प्रभावित करेंगे।
राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक सीमाएं
किसी भी बड़े सैन्य अभियान की लागत सिर्फ युद्धक्षेत्र में नहीं होती—
राजनीतिक चुनौतियाँ
-
भारी सैनिक हानि
-
दूरस्थ इलाकों में सप्लाई लाइन
-
नए क्षेत्र का प्रशासन
-
टैक्सpayer पर भारी बोझ
कूटनीतिक परिणाम
-
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों, OIC, चीन, रूस से समर्थन मांगेगा
-
भारत पर दबाव, आलोचना, प्रतिबंध की आशंका
आर्थिक प्रभाव
-
व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन प्रभावित
-
युद्ध की कीमत सैन्य लाभ से कहीं अधिक हो सकती है
चीनी फैक्टर
-
CPEC पर असर
-
चीन का कूटनीतिक या सैन्य प्रतिक्रिया देना
-
लद्दाख जैसे क्षेत्रों में दबाव बढ़ाना
संभावित रास्ते और व्यावहारिक विकल्प
वर्तमान परिस्थितियों में POK को पूर्ण रूप से सैन्य शक्ति से वापस लेना अत्यंत असंभव दिखता है।
लेकिन कुछ वास्तविक और व्यावहारिक विकल्प हैं—
✔ सीमित सैन्य कार्रवाई
मुख्य पहाड़ी पास, अहम चोटियाँ—पूरे POK के बजाय चुनिंदा रणनीतिक स्थान।
✔ कूटनीतिक, आर्थिक और सूचना अभियानों का इस्तेमाल
-
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की जिम्मेदारी उजागर करना
-
स्थानीय असंतोष का समर्थन
-
आर्थिक दबाव
-
POK में हालिया विरोध प्रदर्शनों को leverage करना
✔ धीरे-धीरे स्थितियों को अपने पक्ष में करना
छोटे-छोटे लाभ, बातचीत की स्थिति मजबूत करना।
✔ आंतरिक अस्थिरता बढ़ाना
POK और पाकिस्तान के भीतर आंतरिक दबाव बढ़ने से पाकिस्तान को पीछे हटना पड़े।
यथार्थवादी निष्कर्ष
तो क्या भारत आज सैन्य कार्रवाई से POK वापस ले सकता है?
सैद्धांतिक रूप से—हाँ।
व्यावहारिक रूप से—बहुत कम संभावना।
कारण:
-
भीषण भूगोल
-
रक्षक की बढ़त
-
परमाणु प्रतिरोध
-
रसद और सैन्य बोझ
-
वैश्विक कूटनीतिक परिणाम
-
प्रशासनिक चुनौतियाँ
ज्यादा यथार्थवादी तरीका यह है—धीमी, बहु-स्तरीय रणनीति:
रक्षा मजबूत करना, सीमित कार्रवाइयाँ, निरंतर दबाव, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय narrative को अपने पक्ष में करना।
समय के साथ—बिना बड़े युद्ध के—पाकिस्तान की स्थिति कमजोर हो सकती है और ताकत का संतुलन भारत की ओर झुक सकता है।
युद्ध नहीं, रणनीति—यही वास्तविक रास्ता है।
#जयहिंद 🇮🇳
(लेखक की राय अपने फील्ड अनुभव और भारत-पाक सीमा पर BSF की सेवा के आधार पर व्यक्त की गई है। आप उन्हें उनके एक्स हैंडल पर भी पढ़ सकते हैं-
Last Updated on December 10, 2025 10:32 am
