Hate Speech Surge in 2025: क्या बढ़ता ध्रुवीकरण भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन रहा है?

– कृष्णा राव

Hate Speech Surge in 2025: क्या हम अनजाने में आंतरिक सुरक्षा के जाल की ओर बढ़ रहे हैं?
(भारत में हेट स्पीच, ध्रुवीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल)

भारत में साल 2025 के दौरान औसतन हर दिन तीन हेट स्पीच की घटनाएं दर्ज की गईं। पूरे वर्ष में कुल 1,318 मामले रिकॉर्ड हुए। यह कोई फुसफुसाहट नहीं थी, न ही अनाम दीवारों पर लिखी गई नारेबाज़ी। यह सार्वजनिक भाषण था। डिजिटल प्रसारण था। चुनावी बयानबाज़ी थी। वायरल तस्वीरें थीं।

सवाल यह है—यह कब “राजनीति” से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा का जोखिम बन जाता है?

चुनावी चक्रों के साथ ध्रुवीकरण अब अस्थायी नहीं रहा। यह संरचनात्मक हो चुका है। अल्पसंख्यकों को जनसांख्यिकीय खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बहुसंख्यकों को सभ्यतागत पीड़ित के तौर पर चित्रित किया जाता है। धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल प्रदर्शन और उकसावे के लिए किया जाता है। आक्रोश को गढ़ा जाता है, उससे कमाई की जाती है और एल्गोरिद्म उसे पुरस्कृत करते हैं।

और हर बार हम इसे प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा मान लेते हैं।

लेकिन गंभीर राष्ट्र एक असहज सवाल पूछते हैं—समाज में बढ़ती साम्प्रदायिक दरार से आखिर लाभ किसे होता है?

न भारतीय अर्थव्यवस्था को।
न भारत की वैश्विक छवि को।
न उसकी सैन्य तैयारी को।
न उसकी आंतरिक स्थिरता को।

खंडित समाजों को भटकाना आसान होता है। उकसाना आसान होता है। कूटनीतिक रूप से घेरना आसान होता है। बिना गोली चलाए कमजोर करना आसान होता है।

आधुनिक संघर्ष अब अक्सर घोषित नहीं होते, बल्कि पैदा किए जाते हैं।

हाइब्रिड वॉरफेयर का सिद्धांत—जिसका अध्ययन और अभ्यास बड़ी शक्तियां खुले तौर पर कर रही हैं—प्रतिद्वंद्वी देशों के भीतर विभाजन को गहरा करने पर आधारित है। यह पहचान-आधारित आशंकाओं को बढ़ाता है। अतिवादी आवाज़ों को प्रमुखता देता है। मध्यमार्गियों को भोला और संयम को कमजोरी जैसा दिखाता है।

उद्देश्य सीधा है—लक्ष्य समाज को खुद से लड़ने पर मजबूर करना।

डिजिटल युग में धार्मिक पहचान से जुड़ी भड़काऊ तस्वीरें स्थानीय नहीं रहतीं। वे मिनटों में वैश्विक हो जाती हैं। बॉट नेटवर्क उन्हें बढ़ाते हैं। विदेशी ट्रोल समूह उन्हें दोहराते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्हें हथियार बनाया जाता है। समाज के दोनों पक्षों को ऐसा कंटेंट परोसा जाता है जो उनके सबसे बुरे संदेहों की पुष्टि करता है।

और आक्रोश का चक्र कसता जाता है।

इसके लिए किसी फिल्मी जासूसी नेटवर्क की जरूरत नहीं।
सिर्फ दो चीजें काफी हैं—
• ऐसे राजनीतिक तत्व जो बयानबाज़ी को लगातार तीखा करें।
• ऐसे विरोधी जो उसे बढ़ा-चढ़ाकर फैलाने को तैयार हों।

भले ही हर भड़काऊ बयान घरेलू चुनावी गणना का परिणाम हो, रणनीतिक नतीजा वही रहता है। शत्रुतापूर्ण तत्वों को विभाजन पैदा करने की जरूरत नहीं पड़ती; वे सिर्फ उसकी गति तेज कर देते हैं।

यही इसे खतरनाक बनाता है।

महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला भारत साम्प्रदायिक दरार को चुनावी रंगमंच नहीं मान सकता। आंतरिक एकजुटता ही रणनीतिक पूंजी है। हर बार जब राजनीतिक संदेशों में धार्मिक पहचान को निशाना बनाया जाता है, यह पूंजी क्षीण होती है।

एक कठिन सवाल पूछिए—अगर किसी प्रतिद्वंद्वी खुफिया एजेंसी को अगले दशक में भारत को कमजोर करने का काम सौंपा जाए, तो उसकी रणनीति कैसी होगी?

वह सीमा पर टैंकों से शुरुआत नहीं करेगी।
वह मोहल्लों में अविश्वास से शुरुआत करेगी।
वह वायरल क्लिप्स से शुरुआत करेगी।
वह प्रतीकात्मक अपमान से शुरुआत करेगी।
वह सुनिश्चित करेगी कि हर चुनाव समाज को पहले से अधिक ध्रुवीकृत छोड़ जाए।

क्या यह परिचित नहीं लगता?

यह किसी विशेष व्यक्ति पर समझौता होने का आरोप नहीं है। इसका कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की सोच संरचनात्मक कमजोरियों को पहचानने की मांग करती है, आपदा के प्रमाण का इंतजार करने की नहीं।

21वीं सदी में अभिजात वर्ग का समझौता हमेशा जासूसी जैसा नहीं दिखता। यह वित्तीय उलझाव, डिजिटल दबाव, प्रतिष्ठा-आधारित प्रभाव या सूचना-प्रबंधन के रूप में हो सकता है। या शायद कोई प्रत्यक्ष रूप ही न हो—सिर्फ ऐसा राजनीतिक माहौल हो जो ध्रुवीकरण का इतना आदी हो जाए कि वह बाहरी हितों से अलग न दिखे।

जब प्रभाव शत्रुतापूर्ण उद्देश्यों से मेल खाने लगे, तो मंशा अप्रासंगिक हो जाती है।

और प्रभाव स्पष्ट है—साम्प्रदायिक शत्रुता का सामान्यीकरण।

रणनीतिक लागत चुपचाप बढ़ती है। सुरक्षा बलों का ध्यान भीतर की ओर बंटता है। निवेशक सामाजिक अस्थिरता का जोखिम जोड़ते हैं। कूटनीतिक आलोचक “कमजोर लोकतंत्र” की कहानी को बढ़ाते हैं। घरेलू विश्वास क्षीण होता है।

इतिहास में कोई भी महाशक्ति अपने घर के भीतर संप्रदायिक संदेह को बढ़ाते हुए ऊपर नहीं उठी।

भारत की सभ्यतागत ताकत हमेशा उसकी समावेशी क्षमता रही है—समाहित करने, संवाद करने और साथ रहने की। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए इस संतुलन को कमजोर करना सशक्त राजनीति नहीं, रणनीतिक दूरदर्शिता की कमी है।

प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र और आत्म-निर्मित कमजोरी के बीच एक रेखा होती है। हम उसके करीब पहुंच रहे हैं।

राष्ट्रीय परिपक्वता की परीक्षा यह नहीं है कि राजनीतिक तत्व पहचान की भावना को कितना भड़का सकते हैं। असली परीक्षा यह है कि वे कब पहचानें कि ऐसा करना उनके अपने हितों से आगे जाकर किन शक्तियों को लाभ पहुंचा सकता है।

एक आत्मविश्वासी राष्ट्र विविधता से नहीं डरता।
एक सुरक्षित राज्य को स्थायी आंतरिक दुश्मनों की जरूरत नहीं होती।
एक उभरती शक्ति सामाजिक एकता के साथ जुआ नहीं खेलती।

अगर ध्रुवीकरण इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो सवाल यह नहीं रहेगा कि क्या बाहरी ताकतें हमारी दरारों का फायदा उठा रही हैं।

सवाल यह होगा—क्या हमने उन्हें यह अवसर खुद दिया?

#जय_हिंद

(यह विचार लेखक के निजी हैं, जो एक पूर्व @BSF_India अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने ऑपरेशनल यूनिट्स का नेतृत्व किया है और सीमा प्रबंधन, CI/CT/LWE ऑपरेशंस तथा खुफिया रणनीति में विशेषज्ञता रखते हैं।)

Last Updated on February 12, 2026 4:31 pm

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