Aravalli फैसले से उठा बड़ा सवाल: पर्यावरण संरक्षण में CEC की भूमिका अब क्या रह गई?

नई दिल्ली: अरावली पहाड़ियों (Aravalli hills) से जुड़े हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले (Supreme Court Aravalli verdict) ने देश में पर्यावरण संरक्षण (Environmental Protection in India) को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। फैसले को गहराई से पढ़ने पर इसके भीतर ऐसे अंतर्विरोध सामने आते हैं, जिनके असर सिर्फ अरावली तक सीमित नहीं रह सकते, बल्कि पूरे देश की पारिस्थितिक सुरक्षा पर पड़ सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में 2010 की सर्वे-आधारित परिभाषा को आधार बनाने की अनुमति दी गई है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में 2018 के बाद आए उन न्यायिक अवलोकनों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया, जिनमें खुद अदालत ने अरावली क्षेत्र में पहाड़ियों के बड़े पैमाने पर गायब होने और गंभीर पारिस्थितिक क्षरण को स्वीकार किया था।

क्या दिल्ली रिज भी खतरे में आ सकता है?

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही तर्क भविष्य में भी लागू किया गया, तो इसका असर दिल्ली रिज (Delhi Ridge) जैसे अन्य नाज़ुक और अधिसूचित पारिस्थितिक क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। दिल्ली रिज भी अरावली की तरह एक संवेदनशील प्राकृतिक संरचना है, और उस पर सुरक्षा कमजोर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि पुरानी परिभाषाओं के आधार पर फैसले लेना, वर्तमान ज़मीनी हालात और वैज्ञानिक साक्ष्यों की अनदेखी कर सकता है, जिससे अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय नुकसान हो सकता है।

संस्थागत भूमिका पर सवाल: FSI बनाम CEC

इस फैसले के बाद संस्थागत भूमिकाओं को लेकर भी बहस तेज़ हो गई है। यदि फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया (Forest Survey of India – FSI) को ही अंतिम विशेषज्ञ प्राधिकरण माना जाए, तो फिर यह सवाल उठता है कि सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (Central Empowered Committee – CEC) की भूमिका क्या रह जाती है?

CEC का गठन सुप्रीम कोर्ट ने इसी उद्देश्य से किया था कि वह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में अदालत को स्वतंत्र, विशेषज्ञ और समग्र सलाह दे सके। ऐसे में आलोचकों का कहना है कि CEC की भूमिका को दरकिनार करना, पर्यावरणीय मामलों में संस्थागत संतुलन को कमजोर करता है।

2024 में 14 साल पुरानी परिभाषा क्यों?

आलोचकों का तर्क है कि वर्ष 2024 में 14 साल पुरानी परिभाषा को अपनाना, और बाद के वैज्ञानिक आंकड़ों, न्यायिक निष्कर्षों और ज़मीनी सच्चाई को शामिल न करना, पर्यावरणीय न्यायशास्त्र (Environmental Jurisprudence) की मूल भावना के खिलाफ है।

पर्यावरण कानून का उद्देश्य केवल नियम तय करना नहीं होता, बल्कि

  • एहतियात का सिद्धांत (Precautionary Principle)

  • पीढ़ी-दर-पीढ़ी न्याय (Inter-generational Equity)

  • और अपूरणीय प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित करना होता है।

सिर्फ अरावली नहीं, पूरे देश का सवाल

विशेषज्ञों के मुताबिक यह मामला सिर्फ अरावली पहाड़ियों तक सीमित नहीं है। यह फैसला देशभर में मौजूद जंगलों, पहाड़ियों और अन्य पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

अंततः सवाल यही है—
क्या विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाते समय पर्यावरणीय चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?
और अगर ऐसा हुआ, तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को कितनी भारी चुकानी पड़ेगी?

पर्यावरण एक्टिविस्ट अनिल सूद के ट्विटर हैंडल वाले इनपुट के साथ…

Last Updated on December 21, 2025 9:56 am

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