‘आतंकी कृत्य’ की व्यापक परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी, दिल्ली दंगा केस में अहम आदेश

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार (5 जनवरी) को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में सात आरोपियों में से पांच को जमानत दे दी, जबकि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को जमानत देने (Umar Khalid and Sharjeel Imam) से इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “रिकॉर्ड से स्पष्ट होता है कि दोषारोपण के संदर्भ में सभी आरोपी समान स्तर पर नहीं हैं। मुख्य आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप कथित आतंकी कृत्य की परिकल्पना, योजना और समन्वय में उनकी केंद्रीय और निर्देशात्मक भूमिका की ओर इशारा करते हैं, जबकि कुछ सह-आरोपियों के खिलाफ उपलब्ध सामग्री सहायक या सुविधा प्रदान करने वाली भूमिका को दर्शाती है।” इस फैसले के जरिए अदालत ने आरोपियों की भूमिकाओं का अलग-अलग मूल्यांकन किया और अपराधियों की एक तरह से श्रेणी तय की, भले ही सभी पर समान धाराओं के तहत मामले दर्ज हों।

सभी आरोपियों पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), आर्म्स एक्ट और दंड कानून की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। इस मामले के केंद्र में दो मुख्य सवाल रहे— “आतंकी कृत्य” की परिभाषा क्या है और उसे कौन तय करता है, तथा क्या मुकदमे की शुरुआत से पहले लंबे समय तक हिरासत को आतंकवाद-रोधी कानून के तहत उचित ठहराया जा सकता है। उमर ख़ालिद और अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी का प्रतीक भी बन गई थीं। आरोपियों पर पड़ने वाले तत्काल प्रभावों के अलावा, इस जमानत आदेश ने “आतंकी कृत्य” की एक व्यापक व्याख्या को भी स्वीकार किया है।

आतंक की परिभाषा

UAPA की धारा 15 के तहत आतंकी कृत्य को ऐसा कार्य बताया गया है, जो “भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को खतरे में डालने के इरादे से या लोगों में या लोगों के किसी वर्ग में आतंक फैलाने या फैलाने की संभावना के साथ” किया गया हो।

हालांकि, इस धारा में यह भी कहा गया है कि आतंक फैलाने का कृत्य “बम, डायनामाइट या अन्य विस्फोटक पदार्थों, ज्वलनशील पदार्थों या आग्नेयास्त्रों… या किसी अन्य माध्यम” से किया जा सकता है। अभियोजन पक्ष का तर्क है कि उमर ख़ालिद और अन्य आरोपियों द्वारा कथित रूप से आयोजित किए गए “चक्का जाम” को भी “किसी अन्य माध्यम” के तहत रखा जा सकता है। उमर ख़ालिद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चक्का जाम या सड़क अवरोध की वकालत करना लोकतंत्र में विरोध का एक वैध तरीका है। आरोपियों की मुख्य दलील यह रही कि चूंकि यह प्रावधान हिंसक तरीकों की बात करता है, इसलिए “किसी अन्य माध्यम” की व्याख्या भी केवल अन्य हिंसक माध्यमों के रूप में ही की जानी चाहिए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर निर्णय देते हुए इस परिभाषा की समीक्षा की और अभियोजन पक्ष की व्याख्या से सहमति जताई।

अदालत ने कहा, “ऐसे कृत्य जिन माध्यमों से किए जा सकते हैं, वे केवल बम, विस्फोटक, आग्नेयास्त्र या अन्य पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं हैं। संसद ने जानबूझकर ‘किसी भी प्रकृति के किसी अन्य माध्यम’ शब्दों का प्रयोग किया है, जिसे निरर्थक नहीं किया जा सकता। इसलिए वैधानिक जोर केवल इस्तेमाल किए गए साधन पर नहीं, बल्कि कृत्य की रूपरेखा, मंशा और उसके प्रभाव पर है।”

Last Updated on January 6, 2026 10:34 am

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