– नितिन ठाकुर
बंगाल से खबर आई कि शुभेंदु अधिकारी ने कार्यकर्ताओं को ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने से रोक दिया और कहा- “मैं सबका सीएम हूँ।” सुनने में ये बात उनके कट्टर समर्थकों को अजीब लग सकती है, लेकिन राजनीति के गलियारों में इसे The Paradox of Power कहते हैं। इतिहास गवाह है, चाहे भारत हो या दुनिया, दक्षिणपंथी नेताओं के साथ ये पैटर्न रहा है। आप सत्ता की सीढ़ियाँ तो अपनी कोर विचारधारा और ध्रुवीकरण के दम पर चढ़ जाते हैं लेकिन शासन चलाने के लिए आपको एक Statesman का चोला पहनना ही पड़ता है।
इसे आप Ideology vs Governance की जंग कह सकते हैं। इसके कुछ बड़े उदाहरण हैं- अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी- भारत में ये सबसे बड़े उदाहरण हैं। अटल जी ने हिंदू हृदय सम्राट की छवि से निकलकर ‘गठबंधन धर्म’ को अपनाया। वहीं आडवाणी जी ने अपनी Hardliner छवि को सॉफ्ट करने के लिए जिन्ना की मज़ार पर जाकर उन्हें ‘सेकुलर’ तक कह दिया।
दरअसल ये अपनी Political Acceptability बढ़ाने की एक छटपटाहट थी। यहां प्रधानमंत्री मोदी के आकस्मिक पाकिस्तान दौरे पर जाकर सबको हैरान कर देनेवाली घटना भी याद आती है क्योंकि उनकी इमेज ऐसे नेता की थी जो पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कदम लेगा। इसके उलट वो नवाज़ शरीफ के घर एक शादी में जा पहुंचे थे।
रिचर्ड निक्सन- निक्सन को अमेरिका में कट्टर ‘कम्युनिस्ट विरोधी’ माना जाता था। उनकी पूरी राजनीति चीन और रूस के विरोध पर टिकी थी। लेकिन राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने Realpolitik का रास्ता चुना और 1972 में खुद चीन की यात्रा कर सबको चौंका दिया। जो नेता कल तक चीन को दुश्मन कहता था, वही ग्लोबल लीडर बनने के लिए हाथ मिला रहा था।
एरियल शेरोन- इजरायल के सबसे कट्टर राइट-विंग नेताओं में से एक। उन्हें ‘The Bulldozer’ कहा जाता था और वो फिलिस्तीन के खिलाफ बेहद सख्त थे। लेकिन जब वे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने ही गाजा पट्टी से इजरायली बस्तियों को हटाने का ऐतिहासिक फैसला लिया। उनकी अपनी पार्टी Likud दंग रह गई, लेकिन शेरोन समझ चुके थे कि ‘War-time Hero’ होना और ‘Peace-time Leader’ होना दो अलग बातें हैं।
रोनाल्ड रीगन- रीगन ने सोवियत संघ को Evil Empire यानि शैतानी साम्राज्य घोषित किया था। उनके समर्थकों को लगता था कि वे युद्ध करेंगे, लेकिन सत्ता में रहकर उन्होंने गोर्बाचेव के साथ हाथ मिलाया और शीत युद्ध को खत्म करने की दिशा में बढ़े।
मोहम्मद अली जिन्ना- विभाजन के लिए मजहब का कार्ड खेला, लेकिन जैसे ही पाकिस्तान की गद्दी मिली, 11 अगस्त 1947 को कहने लगे कि “अब राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा।
सत्ता की कुर्सी का चरित्र कुछ ऐसा है कि वह अपनी वैचारिक कट्टरता की म्यान में लंबे समय तक तलवार नहीं रख सकती, क्योंकि Polarizing Rhetoric से चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन Stable Governance के लिए Inclusivity एक अनिवार्य शर्त बन जाती है।
अक्सर देखा गया है कि जब कोई नेता Identity Politics और Hardline Ideology के रथ पर सवार होकर सत्ता के शिखर तक पहुँचता है, तो उसे अपनी Political Legitimacy को विस्तार देने के लिए एक Statesman का मुखौटा पहनना ही पड़ता है। यह बस हृदय परिवर्तन नहीं बल्कि Realpolitik की एक कड़वी मजबूरी है।
इतिहास गवाह है कि चाहे वैश्विक पटल के बड़े चेहरे हों या भारतीय राजनीति के दिग्गज, सड़कों पर कट्टरता की घुट्टी पिलाने वाला हर नेता संवैधानिक पद पर बैठते ही Centrist Shift की ओर भागने लगता है क्योंकि उसे पता है कि प्रशासन नारों से नहीं, बल्कि Social Cohesion और व्यवस्था के संतुलन से चलता है।
दरअसल ये सत्ता का वह विरोधाभास है जहाँ नेता अपने उस Core Voter Base की अपेक्षाओं और Constitutional Propriety के बीच में पिसने लगता है। वो जानता है कि इतिहास उसे एक विभाजनकारी चेहरा नहीं बल्कि एक समावेशी शासक के रूप में याद करे, और इसी ‘लीगेसी’ की तलाश में वह अपनी पुरानी वैचारिक चमड़ी उतारकर एक ‘Universal Leader’ दिखने की जद्दोजहद शुरू कर देता है, भले ही इसके लिए उसे अपने ही पुराने बयानों और समर्थकों की नाराजगी क्यों न झेलनी पड़े।
पर सवाल वही है- क्या कट्टर समर्थकों को ये उदारवाद हजम होगा? या फिर विचारधारा का बोझ उन्हें वापस खींच लेगा?
(लेखक सीनियर पत्रकार हैं और News 24, TV 9 Bharatvarsh, Zee News और Aajtak जैसे कई संस्थानों में काम कर चुके हैं. मौजूदा दौर में एक निजी चैनल के पॉडकास्ट विभाग का कार्यभार संभाल रहे हैं और ‘पढ़ाकू नितिन’ नाम से एक प्रसिद्ध कार्यक्रम का संचालन कर रहे हैं.)
Last Updated on May 10, 2026 5:15 pm
