अग्निवीरों के पहले बैच के 75 फीसदी जवानों का चार साल का कार्यकाल दिसंबर तक पूरा हो जाता. यानी वे अग्निपथ पर अपनी यात्रा पूरी करके अपने घरों और गांवों में लौट जाते. इनमें से बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और यहां तक कि मणिपुर लौटती. ये सभी राज्य अगले फरवरी में विधानसभा चुनाव के लिए जाने वाले हैं. ये राज्य परंपरागत रूप से सेना में भर्ती के बड़े केंद्र भी रहे हैं.
बीजेपी के लिए इनमें से पहले दो राज्य बेहद अहम हैं. पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती. चार साल की सेवा के बाद लौटने वाले इन जवानों के विपक्षी रैलियों में शामिल होने या कॉकरोच जनता पार्टी जैसे किसी संगठन से जुड़ने की आशंका बीजेपी के लिए डरावनी थी. कुछ समय पहले तक बीजेपी जिस अजेय आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही थी, अब वह किसी भी तरह का चुनावी जोखिम लेने को तैयार नहीं दिख रही.
इसके अलावा, अगले साल नवंबर के आसपास हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. गुजरात को लेकर बीजेपी अब भी निश्चिंत हो सकती है. लेकिन हिमाचल प्रदेश उसका वह पारंपरिक गढ़ है, जिसे पिछली बार कांग्रेस ने उससे छीन लिया था. हिमाचल सेना में भर्ती का एक बड़ा केंद्र है और वहां पूर्व सैनिकों का एक बड़ा मतदाता वर्ग भी है.
अब बीजेपी इतनी ज्यादा जोखिम से बचने वाली पार्टी बन गई है कि जिस सुधार को कभी वह अपनी सबसे पसंदीदा उपलब्धियों में गिनती थी, उसे चुनावी कसौटी पर परखने का साहस भी नहीं जुटा पा रही. हालांकि, अग्निपथ वास्तव में एक सुधार था. हम इस पर भी बात करेंगे कि यह सुधार क्यों था और पहली ही बड़ी परीक्षा में यह क्यों ढह गया.
सरकारों को आमतौर पर तीन तरह के कामों के लिए याद किया जाता है. लेकिन एक चौथी श्रेणी भी है – ऐसे अच्छे विचार, जिन्हें सरकार लागू तो करती है, लेकिन दबाव या घबराहट में वापस ले लेती है.
पहली दो श्रेणियां अच्छी और बुरी नीतियों की हैं. तीसरी उन अच्छे विचारों की है, जिन्हें सरकारें प्रस्तावित तो करती हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का साहस या कौशल नहीं दिखा पातीं.
उदाहरण के लिए, यूपीए सरकार के ऐसे कई फैसले गिनाए जा सकते हैं. आधार और उस पर आधारित इंडिया स्टैक, कल्याणकारी योजनाओं का डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), यहां तक कि सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडर को केवल गरीब और जरूरतमंद लोगों तक सीमित करने की योजना.
इसके अलावा, राष्ट्रीय महत्व की कई बड़ी और महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भी थीं. इनमें से ज्यादातर या तो सरकार की निर्णयहीनता, पार्टी और सरकार के बीच आंतरिक विरोधाभासों या वैचारिक विरोध के कारण अटक गईं.
बाद में इनमें से कई परियोजनाओं को मोदी सरकार ने पूरा किया. श्रीनगर तक रेल पहुंचाने की परियोजना, मुंबई मेट्रो, ट्रांस हार्बर लिंक, नए एक्सप्रेसवे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) का पूरा होना और यहां तक कि सशस्त्र माओवादी आंदोलन का लगभग सफाया – ये सभी ऐसी परियोजनाएं थीं, जिन्हें यूपीए सरकार बीच में छोड़ गई थी. मोदी सरकार ने इन्हें पूरा करने में शानदार काम किया.
लेकिन अपनी ही कुछ नीतियों के मामले में वह लड़खड़ा गई.
पत्रकारिता में हम तीन उदाहरणों के नियम का इस्तेमाल करते हैं. इसका मतलब है कि तीन उदाहरण मिलकर एक सीधी रेखा खींचते हैं और आपके तर्क को मजबूत बनाते हैं.
मोदी सरकार के यू-टर्न की बात करें तो पहला उदाहरण तीन कृषि कानून हैं. इन्हें 2020 में पूरे आत्मविश्वास के साथ लाया गया, लेकिन किसानों के विरोध के सामने 2021 में पूरी तरह वापस लेना पड़ा.
दूसरा उदाहरण अब अग्निवीर योजना है.
तीसरे उदाहरण के लिए मेरी पसंद जाति जनगणना होगी. मोदी सरकार लंबे समय तक इसका विरोध करती रही, लेकिन अचानक इसे अब कराई जा रही देरी से शुरू हुई 2021 की जनगणना में शामिल करने का फैसला कर लिया गया. यह राहुल गांधी के लगातार दबाव का नतीजा था.
अगर आपको नहीं लगता कि यह तीसरा उदाहरण बनाने के लिए पर्याप्त मजबूत है – हालांकि इसके दूरगामी प्रभावों को देखते हुए मुझे लगता है कि यह पर्याप्त है – तो मैं आपको एक और उदाहरण दे सकता हूं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार मुफ्त की योजनाओं की संस्कृति की आलोचना करते रहे हैं. उन्होंने इसे तिरस्कार के साथ ‘रेवड़ी संस्कृति’ कहा.
जुलाई 2022 में उत्तर प्रदेश के जालौन में बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के दौरान उन्होंने कहा था, “यह रेवड़ी संस्कृति देश के विकास के लिए बहुत खतरनाक है. रेवड़ी संस्कृति वाले लोग आपके लिए कभी नए एक्सप्रेसवे, नए एयरपोर्ट या डिफेंस कॉरिडोर नहीं बनाएंगे.”
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा था, “हमें मिलकर इस सोच को हराना है और देश की राजनीति से रेवड़ी संस्कृति को खत्म करना है.”
लेकिन फिर 2023 की सर्दियों में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के आसपास उन्होंने घोषणा कर दी कि कोविड महामारी के दौरान शुरू की गई मुफ्त अनाज योजना जारी रहेगी.
इसी चुनावी दौर में बीजेपी ने महिलाओं को सीधे नकद राशि देने के लिए ‘लाडली बहना योजना’ भी शुरू की. इसके बाद, संभवतः 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत गंवाने से पैदा हुई राजनीतिक बेचैनी के कारण, पार्टी ने मुफ्त योजनाओं की एक बड़ी ‘रेवड़ी क्रांति’ ही शुरू कर दी.
बिहार में एकमुश्त 10,000 रुपये तक की राशि महिलाओं के खातों में भेजी गई. साथ ही वादा किया गया कि यदि कोई महिला अपना उद्यम शुरू करती है, तो उसे 2 लाख रुपये तक दिए जाएंगे.
यह योजना इतनी महंगी साबित हुई कि महाराष्ट्र जैसा अमीर राज्य भी इसके भुगतान में मुश्किलों का सामना कर रहा है. अब लाभार्थियों की संख्या कम करने के लिए रास्ते तलाशे जा रहे हैं. महिलाएं पहले से ही विरोध कर रही हैं कि उन्हें उनकी ‘लाडकी बहिन’ योजना की किस्तें नहीं मिली हैं.
अगर आप चाहें तो इसे तीसरे उदाहरण के रूप में भी देख सकते हैं.
आप इसे जिस नजरिए से भी देखें, मोदी सरकार ने जोखिम लेने की अपनी इच्छा काफी हद तक खो दी है. यहां तक कि उन सुधारों के मामले में भी, जिनके प्रति उसने कभी मजबूत विश्वास और प्रतिबद्धता दिखाई थी.
ये चारों उदाहरण यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि मोदी सरकार को उन अच्छे विचारों के लिए भी याद किया जाएगा, जिन्हें उसने खुद लागू किया और बाद में वापस ले लिया. अग्निपथ भी उनमें से एक है. रिकॉर्ड के लिए बता दूं कि इस कॉलम ने इन सभी विचारों का समर्थन किया था.
कृषि कानूनों और अग्निपथ के बीच आप कह सकते हैं कि मोदी सरकार ‘जय जवान, जय किसान’ के दोनों हिस्सों की परीक्षा में असफल रही.
उसने अपने सबसे महत्वपूर्ण और वफादार मतदाता समूहों को हल्के में लेने की गलती की – हिंदी पट्टी के किसान और सेना के जवान.
सबसे निराशाजनक बात यह है कि सरकार इन लोगों तक पहुंचने और इतने बड़े बदलावों के लिए उनकी सहमति बनाने में नाकाम रही.
आमतौर पर लोग ऐसी बड़ी नीतिगत तब्दीलियों को लेकर संदेह में रहते हैं, जिनका उनके जीवन पर गहरा असर पड़ सकता है. खासकर तब, जब उन्हें अचानक और बिना पर्याप्त तैयारी के लागू कर दिया जाए.
लेकिन यही इस सरकार की कार्यशैली रही है. अचानक नोटबंदी का फैसला हो या कोविड के दौरान लगाया गया लॉकडाउन. किसानों और सैनिकों को प्रभावित करने वाले फैसले भी लगभग इसी तरीके से लिए गए.
पहले दो फैसलों के विपरीत, जिनकी एक निश्चित समय-सीमा थी, ये नीतिगत बदलाव स्थायी रूप से लागू रहने के लिए बनाए गए थे. यही वजह है कि सरकार को अपने ही समर्थक आधार से विरोध का सामना करना पड़ा और अंततः उसे पीछे हटना पड़ा.
शासन चलाना सिर्फ घोषणा करना नहीं है
सरकार चलाना एक बेहद मेहनत वाला, लंबा और कई बार उबाऊ काम है. इसके लिए पहले से तैयारी, संभावित परिस्थितियों का आकलन, अलग-अलग परिदृश्यों पर विचार और रणनीतिक अभ्यास की जरूरत होती है. सेना की भाषा में इसे ‘स्टाफ वर्क’ कहा जाता है.
सिविल सेवाएं और नौकरशाही इसी काम के लिए होती हैं. लेकिन इन योजनाओं में इसी बुनियादी तैयारी की कमी दिखाई दी. यह हैरान करने वाला है, क्योंकि मोदी सरकार अपने कामकाज के लिए नौकरशाहों पर काफी निर्भर रहती है.
क्या अधिकारियों से पहले पूरी तैयारी करने को कहा गया था या उन्हें सीधे फैसला थमा दिया गया था?
हो सकता है कि सरकार को डर रहा हो कि ज्यादा विश्लेषण करने से फैसले लेने में देरी होगी और मामला ‘एनालिसिस पैरालिसिस’ में फंस जाएगा. लेकिन आप हर बार उस कमांडो की तरह व्यवहार नहीं कर सकते, जो पैराशूट की जांच किए बिना ही विमान से कूद जाए.
यह निडरता नहीं है. यह लापरवाही है.
जब अग्निपथ योजना लागू की गई, तब यह बात पहले से साफ थी कि अग्निवीरों का पहला बैच इन राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सेवा से बाहर होगा.
अगर चार साल की सेवा के बीच से ही उनके पुनर्वास और रोजगार की एक व्यापक योजना शुरू कर दी जाती, तो इस फैसले के असर को कम किया जा सकता था.
लेकिन अब तो बच्चा भी हाथ से निकल गया और उसके साथ नहाने का पानी भी.
OROP और अग्निपथ: तैयारी की कमी की कीमत
वन रैंक, वन पेंशन (OROP) लागू करने से पहले भी इसी तरह की तैयारी की कमी देखने को मिली थी.
यह एक चुनावी वादा था. सभी राजनीतिक दल इसके समर्थन में थे और किसी भी भारतीय को सैनिकों को यह लाभ दिए जाने पर आपत्ति नहीं होती.
लेकिन अगर इससे होने वाले अतिरिक्त खर्च का पहले सही आकलन किया जाता और रक्षा बजट में उसके लिए जरूरी अतिरिक्त राशि उपलब्ध कराई जाती, तो शायद कहानी कुछ अलग होती.
OROP के कारण पेंशन पर अचानक बढ़ा खर्च ऐसे रक्षा बजट से आया, जो वर्षों तक महंगाई की रफ्तार के साथ भी नहीं बढ़ पाया था. इसका सीधा असर रक्षा क्षेत्र के पूंजीगत खर्च और हथियारों की खरीद के बजट पर पड़ा.
जब इस तरह की चिंताएं बढ़ने लगीं, तब अग्निपथ योजना जल्दबाजी में लागू कर दी गई.
तैयारी और योजना की कमी ने सेना में दो तरह के सैनिक पैदा कर दिए. दो तरह के वेतन और यहां तक कि युद्ध में किसी सैनिक की मौत होने पर उसके परिवार को मिलने वाले लाभों में भी अंतर पैदा हो गया.
दुनिया की ज्यादातर बड़ी सेनाओं में कम अवधि के लिए सेवा देने वाले सैनिक होते हैं. लेकिन वहां कम अवधि के लिए भर्ती किए गए सैनिकों को नियमित पूर्णकालिक सेवा करने वाले सैनिकों से अलग श्रेणी में नहीं रखा जाता.
भारत में तो उन्हें अलग से संबोधित तक किया जाने लगा. हर सैन्य यूनिट के भीतर अग्निवीरों की एक अलग सब-यूनिट बना दी गई.
यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती थी.
अग्निपथ के पीछे दो बड़े विचार थे. पहला, भविष्य में पेंशन का बोझ कम करना. दूसरा, सशस्त्र बलों की औसत उम्र को 32 साल से घटाकर 24-26 साल के बीच लाना.
दोनों ही विचार अपने आप में अच्छे और जरूरी थे. लेकिन खराब योजना, जल्दबाजी में लागू करने और अब वापसी के फैसले ने इन दोनों उद्देश्यों को ही नुकसान पहुंचाया है.
अग्निवीरों का यह पहला बैच 2029 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अपनी सेवा के छठे साल में होगा.
अब इस अच्छे विचार को फिर से बचा पाना किसी राजनीतिक चमत्कार से कम नहीं होगा.
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फिलहाल तो यह मामला उस कहावत जैसा लग रहा है – न खुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम. यानी न मंजिल मिली और न ही वह हासिल हुआ, जिसके लिए पूरी कोशिश की गई थी.
Last Updated on November 8, 2026 8:18 am
