US Midterm Elections 2026 में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को राहत क्यों?

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स ने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर नियंत्रण हासिल कर लिया है. इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ और इमिग्रेशन नीतियों पर अंकुश लगने की उम्मीद है. भारत को व्यापार, H-1B वीजा और भारतीय प्रवासियों के मुद्दों पर राहत मिल सकती है, लेकिन SIR और घरेलू राजनीति पर अमेरिकी सवाल भी बढ़ सकते हैं.

अमेरिका में ट्रंप कमजोर, क्या भारत के लिए नई कूटनीतिक राह खुलेगी?
अमेरिका में ट्रंप कमजोर, क्या भारत के लिए नई कूटनीतिक राह खुलेगी?

US Midterm Elections 2026: भारत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चितता पिछले कुछ समय से लगातार चिंता का विषय रही है. मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव के बाद ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराया है. इसके बाद से ही उनके बयानों, फैसलों और अचानक बदलते रुख ने भारत-अमेरिका संबंधों को उतार-चढ़ाव के दौर में डाल दिया था.

लेकिन बुधवार को दिल्ली में राहत की एक सामूहिक भावना देखने को मिली. अमेरिका के मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स ने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया. इससे राष्ट्रपति ट्रंप की अब तक लगभग बेलगाम रही शक्तियों पर अंकुश लगाने की संभावना बढ़ गई है. ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दो साल पूरे होने के बाद यह नतीजा अमेरिकी सत्ता व्यवस्था में नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) को फिर मजबूत कर सकता है.

दक्षिण ब्लॉक के अधिकारी मंगलवार रात से ही चुनावी नतीजों पर नजर रख रहे थे. द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में अधिकारियों ने कहा कि भारत-अमेरिका संबंधों में करीब डेढ़ साल से जारी उथल-पुथल के बाद वे इन नतीजों को लेकर “सतर्क रूप से आशावादी” हैं.

पिछले 19 महीनों में ट्रंप प्रशासन के कई फैसलों ने भारत की चिंता बढ़ाई थी. इनमें भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ, H-1B वीजा पर प्रतिबंध, भारतीय छात्रों के वीजा पर सख्ती, पाकिस्तान के साथ ट्रंप की नजदीकी और चीन के साथ अमेरिका का दोबारा जुड़ाव शामिल है.

इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने ऊर्जा की कीमतों को बढ़ाया है, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है. भू-राजनीतिक मोर्चे पर भारत की नजर अब ईरान के खिलाफ ट्रंप के रुख पर रहेगी. खासतौर पर इस बात पर कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति घरेलू राजनीतिक मुश्किलों से ध्यान हटाने के लिए तेहरान के खिलाफ नए सिरे से सैन्य कार्रवाई शुरू करते हैं.

एक भारतीय अधिकारी ने कहा, “परंपरागत रूप से जब अमेरिकी राष्ट्रपति का प्रशासन अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में होता है और घरेलू स्तर पर उसकी राजनीतिक ताकत सीमित होने लगती है, तो वह विदेश नीति पर ज्यादा ध्यान देता है. आने वाले दिनों और महीनों में हमें इस पहलू को ध्यान में रखना होगा.”

अधिकारी ने कहा कि चीन और रूस को लेकर अमेरिका के अगले कदमों पर भी भारत की नजर रहेगी. इस महीने के अंत में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ट्रंप की शेनझेन में बैठक की योजना भी बनाई जा रही है.

सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, दोनों में डेमोक्रेट्स के नियंत्रण से ट्रंप के लिए एकतरफा निर्देश जारी करना पहले की तुलना में मुश्किल हो सकता है. इससे अमेरिकी प्रशासन में संस्थागत नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था फिर सक्रिय होगी.

भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहे हैं. इनका सीधा असर भारतीय निर्यात पर पड़ा है. अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कम हुई और दूसरे देशों के उत्पादों को इसका फायदा मिला.

ट्रंप के टैरिफ से भारत-अमेरिका के रणनीतिक भरोसे को नुकसान

ट्रंप ने पिछले साल भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया था. इसकी वजह भारत का रूस से ऊर्जा खरीदना बताया गया था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने युद्धकालीन कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला लिया था. इससे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के साथ-साथ पिछले ढाई दशकों में राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर तैयार हुआ भरोसा भी प्रभावित हुआ.

हालांकि, इस साल की शुरुआत में ट्रंप ने टैरिफ हटा लिए थे. इसके पीछे भारत की ओर से रूस से ऊर्जा आयात कम करना और व्यापार समझौते के अंतरिम ढांचे पर सहमति बनना प्रमुख कारण बताया गया. लेकिन तब तक दोनों देशों के बीच रणनीतिक विश्वास को काफी नुकसान पहुंच चुका था.

एक भारतीय अधिकारी ने कहा, “अमेरिकी प्रशासन ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक भरोसे को नुकसान पहुंचाया है. भारत में जनमत भी अमेरिका के खिलाफ हुआ है. इस नुकसान की भरपाई करने और भरोसा दोबारा कायम करने में कई साल लगेंगे.”

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की ओर से ट्रंप के टैरिफ पर सवाल उठाए जाने के बाद सितंबर में अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति को उन देशों पर टैरिफ लगाने का अधिकार दिया था, जो रूस से ऊर्जा खरीदते हैं. इस व्यवस्था के दायरे में भारत और चीन भी शामिल हैं.

अब भारतीय अधिकारी यह देखना चाहते हैं कि डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली नई अमेरिकी कांग्रेस, रिपब्लिकन नेतृत्व वाली पिछली कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति को दिए गए टैरिफ लगाने के अधिकारों पर कोई अंकुश लगा पाती है या नहीं.

दरअसल, अमेरिका में आम लोगों के लिए रोजमर्रा की चीजों की कीमतें और उनकी खरीदने की क्षमता भी इस मुद्दे से सीधे जुड़ी हैं. आयातित उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ का असर अमेरिकी बाजार में कीमतों पर पड़ता है. ऐसे में टैरिफ का मुद्दा अमेरिकी घरेलू राजनीति में भी अहम बना रहेगा.

इसका असर भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार समझौते की बातचीत पर भी पड़ सकता है. दोनों देशों के बीच मार्च 2025 से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है, जिसे फरवरी 2026 में नई गति मिली थी. भारतीय वार्ताकार समझौते को अंतिम रूप देने से पहले अमेरिकी राजनीतिक परिस्थितियों और बदलते समीकरणों पर नजर रख रहे हैं.

अमेरिका में भारतीयों के लिए क्या बदल सकता है?

भारत के लिए दूसरा बड़ा मुद्दा अमेरिका में भारतीयों की आवाजाही और वहां रहने वाले भारतीय समुदाय से जुड़ा है.

डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली अमेरिकी कांग्रेस में ऐसे कई सांसद होंगे, जिनका संबंध प्रवासी परिवारों से है. ऐसे में इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) की छापेमारी और भारतीयों समेत दूसरे प्रवासी समुदायों पर लगाई गई पाबंदियों के खिलाफ कुछ राजनीतिक विरोध देखने को मिल सकता है.

पिछले करीब एक साल से भारत लगातार अमेरिकी सीनेटरों और कांग्रेस सदस्यों के संपर्क में रहा है. इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद भी शामिल हैं. भारत ने H-1B वीजा पर पाबंदियों और ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर अपनी चिंताएं अमेरिकी सांसदों के सामने रखी थीं.

लेकिन कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण और स्टीफन मिलर तथा टॉम होमन जैसे सख्त इमिग्रेशन अधिकारियों के प्रभाव के चलते भारत की अपीलों को खास तवज्जो नहीं मिली.

अब भारतीय अधिकारियों को उम्मीद है कि स्थिति कुछ बदल सकती है. उनका मानना है कि डेमोक्रेटिक सांसदों का एक बड़ा वर्ग इमिग्रेशन के मुद्दे पर ज्यादा संवेदनशील रुख अपना सकता है.

हालांकि, अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधियों के बीच सक्रिय लॉबिंग या हस्तक्षेप से बचेगी. लेकिन जहां भारत के हितों से जुड़े मुद्दे होंगे, वहां अमेरिकी सांसदों से संपर्क जरूर किया जाएगा.

इनमें भारतीयों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव का मुद्दा भी शामिल है. पिछले महीने एक मंदिर में भारतीयों को निशाना बनाकर किए गए हमलों के बाद यह चिंता और बढ़ गई है.

डेमोक्रेट्स की जीत से भारत सरकार पर भी बढ़ सकते हैं सवाल

हालांकि, भारतीय अधिकारियों ने इस राजनीतिक बदलाव को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत भी बताई है. डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली अमेरिकी कांग्रेस का मतलब यह भी हो सकता है कि भारत सरकार की घरेलू नीतियों और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर अमेरिकी सांसद ज्यादा तीखे सवाल पूछें.

इसकी एक मिसाल पिछले महीने देखने को मिली थी. अमेरिकी कांग्रेस की सदस्य प्रमिला जयपाल ने भारत में SIR और मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया का मुद्दा उठाते हुए भारत सरकार के कदमों पर “गहरी चिंता” जताई थी.

इसके जवाब में अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने जयपाल की ओर से भारत की चुनावी और राजनीतिक प्रक्रियाओं पर की गई टिप्पणियों को “भारत के आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य हस्तक्षेप” बताया था.

क्वात्रा ने कहा था कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, जहां मजबूत और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं मौजूद हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का लंबा इतिहास रहा है.

हालांकि, उन्होंने बातचीत का रास्ता भी खुला रखा था. क्वात्रा ने कहा था कि जयपाल की गलतफहमियों को दूर करने के लिए वह उनसे रचनात्मक बातचीत करने को हमेशा तैयार हैं.

भारत अब डेमोक्रेटिक सांसदों से रिश्ते मजबूत करने की तैयारी में

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स की जीत के बाद भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा और उनकी टीम आने वाले दिनों में अमेरिकी कांग्रेस के डेमोक्रेटिक सांसदों से संपर्क बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं.

भारत के सामने अब एक नई चुनौती है. उसे ट्रंप प्रशासन के साथ अपने संबंधों को संभालने के साथ-साथ अमेरिकी कांग्रेस में बदलते राजनीतिक समीकरणों के अनुसार नए रिश्ते भी बनाने होंगे.

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का अगला दो साल का राजनीतिक चक्र अब शुरू होगा. ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी होगा कि वह दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सांसदों के साथ संवाद बनाए रखे.

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक भारतीय राजनयिक ने कहा, “अब समय आ गया है कि हम डेमोक्रेटिक सांसदों से संपर्क बढ़ाएं. पिछले कुछ समय से वे अल्पमत में थे और अगला चुनावी चक्र शुरू होने से पहले उनके साथ रिश्ते मजबूत करना जरूरी है.”

ये भी पढ़ें- Iran पर परमाणु हमले की तैयारी में अमेरिका? पाकिस्तान से भारत तक रेडिएशन का खतरा

कुल मिलाकर, अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स की जीत भारत के लिए राहत की खबर हो सकती है. इससे ट्रंप के टैरिफ, वीजा और विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर राजनीतिक अंकुश लगने की संभावना है. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि भारत की घरेलू राजनीति, चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में सवाल और तेज हो सकते हैं.

Last Updated on November 5, 2026 8:25 am

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