Medical Device Safety India: भारतीय औषधकोश आयोग (Indian Pharmacopoeia Commission – IPC) ने पहली बार देश में मेडिकल डिवाइस यानी चिकित्सा उपकरणों के इस्तेमाल से होने वाली गंभीर प्रतिकूल घटनाओं (Serious Adverse Events – SAEs) के आंकड़े सार्वजनिक किए हैं. साल 2020 से अब तक ऐसी 9,373 घटनाएं दर्ज की गई हैं. पिछले छह वर्षों में इनकी संख्या में करीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई है. साल 2020 में जहां 808 गंभीर घटनाएं दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 2,176 हो गया.
गंभीर प्रतिकूल घटनाएं वे चिकित्सकीय घटनाएं होती हैं, जिनकी वजह से मरीज की जान को खतरा हो सकता है या उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है.
द इंडियन एक्सप्रेस ने ये आंकड़े 27 अक्टूबर को सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत हासिल किए. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की एक पीठ ने 10 सितंबर को आंशिक अनुपालन का आदेश जारी किया था, जिसके बाद यह जानकारी उपलब्ध कराई गई.
ये आंकड़े IPC की ओर से ‘प्राप्त और समीक्षा की गई’ गंभीर प्रतिकूल घटनाओं से संबंधित हैं. IPC केंद्र सरकार का एक स्वायत्त निकाय है, जो दवाओं के आधिकारिक मानक प्रकाशित करता है.
अब तक IPC अपनी वार्षिक रिपोर्ट में देशभर के 775 निगरानी केंद्रों पर दर्ज मेडिकल डिवाइस प्रतिकूल घटनाओं (Medical Device Adverse Events – MDAEs) की संख्या तो बताता रहा है, लेकिन गंभीर घटनाओं के आंकड़ों को प्रतिबंधित जानकारी के तौर पर रखता था.
मिसाल के तौर पर, पिछले तीन वर्षों की वार्षिक रिपोर्ट में MDAEs के कुल आंकड़े तो दिए गए, लेकिन उनमें गंभीर घटनाओं को अलग से वर्गीकृत नहीं किया गया. इन रिपोर्टों में संदिग्ध मेडिकल डिवाइस की सूची में अपेक्षाकृत सामान्य और छोटी चीजें भी शामिल थीं, जैसे सर्जिकल दस्ताने, सिरिंज और यूरिन बैग. साल 2022-23 की रिपोर्ट में तो एक पुरुष कंडोम को भी ‘नकली मेडिकल डिवाइस’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया था.
मेडिकल डिवाइस से होने वाली गंभीर घटनाओं में करीब तीन गुना बढ़ोतरी
इस अखबार की अपील के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के आंकड़ों को लेकर जारी 11 पन्नों के आदेश में सूचना आयुक्त जया वर्मा सिन्हा ने IPC की उस दलील का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि मेडिकल डिवाइस की श्रेणी और उसके निर्माता का नाम सार्वजनिक करना ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ का उल्लंघन होगा.
आदेश में कहा गया कि जिन मेडिकल डिवाइस के इस्तेमाल से प्रतिकूल घटनाएं दर्ज हुई हैं, उनके ब्रांड की जानकारी और प्रत्येक डिवाइस का विस्तृत विवरण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. इसकी वजह यह बताई गई कि अभी यह निर्णायक रूप से स्थापित नहीं हुआ है कि ये घटनाएं किसी चिकित्सकीय प्रक्रिया में हुई चूक के कारण हुईं या खुद मेडिकल डिवाइस की वजह से.
केंद्रीय सूचना आयोग के सामने IPC ने दलील दी थी कि मेडिकल डिवाइस के निर्माता का नाम सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(d) के तहत सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. आयोग के मुताबिक, यह जानकारी व्यावसायिक गोपनीयता और तीसरे पक्ष से संबंधित है. इसे सार्वजनिक करने से संबंधित कंपनी की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को नुकसान पहुंच सकता है.
2018 में Abbott के स्टेंट को लेकर भी सामने आई थी बड़ी रिपोर्ट
साल 2018 में द इंडियन एक्सप्रेस ने मेडिकल डिवाइस उद्योग, डॉक्टरों और अस्पतालों के बीच कथित गठजोड़ पर ‘इम्प्लांट फाइल्स’ (Implant Files) नाम से खोजी रिपोर्टों की एक श्रृंखला प्रकाशित की थी.
इसी दौरान अखबार ने पहली बार मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं के वर्गीकरण पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी. उस रिपोर्ट में सामने आया था कि दवा क्षेत्र की बड़ी कंपनी Abbott के बनाए कोरोनरी स्टेंट से जुड़े मामले उस साल दर्ज कुल प्रतिकूल घटनाओं के 50 फीसदी से ज्यादा थे.
उस वर्ष कुल 566 मेडिकल डिवाइस प्रतिकूल घटनाएं दर्ज की गई थीं. इनमें से 290 मामले Abbott के कोरोनरी स्टेंट से संबंधित थे.
उस समय Abbott ने कहा था कि उसके स्टेंट दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने और सबसे अधिक अध्ययन किए गए स्टेंट में शामिल हैं. कंपनी ने अपने स्टेंट के सुरक्षा रिकॉर्ड को भी बेहतरीन बताया था.
इसके बाद द इंडियन एक्सप्रेस ने 2018 के आंकड़ों को अपडेट कराने के लिए कई RTI आवेदन दायर किए, लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों का हवाला देकर जानकारी देने से इनकार कर दिया गया.
आखिरकार, 2025 में इस अखबार की ओर से केंद्रीय सूचना आयोग में अंतिम अपील दायर किए जाने के बाद छह वर्षों के आंकड़े जारी किए गए.
CIC की पीठ के सामने IPC ने यह भी दलील दी कि प्रत्येक MDAE के मेडिकल डिवाइस की श्रेणी और निर्माता का नाम जैसी जानकारियां बहुत अधिक मात्रा में हैं. इन्हें जुटाने और व्यवस्थित करने में सार्वजनिक प्राधिकरण का समय और संसाधन खर्च होंगे.
लाखों प्रतिकूल घटनाएं दर्ज, लेकिन CDSCO को भेजे गए गिने-चुने मामले
IPC की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में कुल 14,584 मेडिकल डिवाइस प्रतिकूल घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें से केवल 22 मामलों को ‘जरूरी कार्रवाई’ के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (Central Drugs Standard Control Organisation – CDSCO) के पास भेजा गया.
इन 22 संदिग्ध मेडिकल डिवाइस की सूची में मुख्य रूप से सर्जिकल दस्ताने, सिरिंज और यूरिन बैग जैसे उत्पाद शामिल थे. इसके अलावा एक-एक मामला मैकेनिकल वेंटिलेटर और ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेट से भी जुड़ा था.
इसी तरह, वित्त वर्ष 2023-24 में IPC ने 10,269 मेडिकल डिवाइस प्रतिकूल घटनाएं दर्ज की थीं, लेकिन इनमें से केवल 16 मामलों की सूची CDSCO को भेजी गई.
इस सूची में प्रेग्नेंसी टेस्ट किट, कैथेटर और ब्लड प्रेशर मॉनिटर जैसे संदिग्ध मेडिकल डिवाइस शामिल थे. इसके अलावा एक मामला ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट से भी जुड़ा था.
वित्त वर्ष 2022-23 में कुल 3,868 मेडिकल डिवाइस प्रतिकूल घटनाएं दर्ज की गई थीं. उस साल 12 मामलों को CDSCO के पास भेजा गया था. इनमें एक संदिग्ध इनहेलर, एक इन्क्यूबेटर और एक कोरोनरी स्टेंट से जुड़ा मामला शामिल था.
IPC की समिति ने जिन 12 संदिग्ध मेडिकल डिवाइस को आगे की कार्रवाई के लिए चिह्नित किया था, उनमें एक पुरुष कंडोम भी शामिल था.
मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा पर नजर रखने के लिए 2015 में शुरू हुआ था कार्यक्रम
मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं का संकलन IPC की ओर से भारत के मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम (Materiovigilance Programme of India – MvPI) के तहत किया जाता है. इस कार्यक्रम की शुरुआत साल 2015 में हुई थी.
IPC ने मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग को व्यवस्थित करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल Adverse Drug Monitoring System (ADRMS) विकसित किया है.
नियमों के मुताबिक, सभी गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की जानकारी 15 दिनों के भीतर IPC को देना जरूरी है.
वैश्विक मानकों के अनुसार, किसी मेडिकल डिवाइस से जुड़ी घटना को ‘गंभीर’ तब माना जाता है, जब उसके कारण मरीज की मौत हो जाए, उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़े, उसकी जान को खतरा पैदा हो या वह किसी तरह की स्थायी अक्षमता का शिकार हो जाए.
अमेरिका में मेडिकल डिवाइस से होने वाली मौतों और चोटों का सार्वजनिक डेटाबेस
दुनिया के दूसरे देशों में भी मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा पर नजर रखने के लिए व्यवस्था मौजूद है.
उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में Manufacturer and User Facility Device Experience (MAUDE) नाम का डेटाबेस है. यह एक सार्वजनिक प्लेटफॉर्म है, जिसमें सभी श्रेणियों के मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं और समस्याओं की रिपोर्ट उपलब्ध होती है.
इस डेटाबेस में मेडिकल डिवाइस से जुड़ी मौतों और चोटों की विस्तृत जानकारी मौजूद रहती है. आम लोग इसमें ब्रांड, निर्माता, मॉडल और दर्ज की गई प्रतिकूल घटना के प्रकार जैसी जानकारियां भी देख सकते हैं.
भारत में पहली बार जारी किए गए गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के आंकड़े मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर नए सवाल खड़े करते हैं. खास बात यह है कि हजारों गंभीर घटनाएं दर्ज होने के बावजूद मेडिकल डिवाइस की पहचान और उनके निर्माताओं से जुड़ी विस्तृत जानकारी अब भी सार्वजनिक नहीं है.
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महत्वपूर्ण आंकड़े एक नजर में
- 2020 से अब तक गंभीर प्रतिकूल घटनाएं: 9,373
- 2020 में गंभीर घटनाएं: 808
- 2025 में गंभीर घटनाएं: 2,176
- देशभर में मेडिकल डिवाइस निगरानी केंद्र: 775
- 2024-25 में दर्ज कुल MDAEs: 14,584
- 2024-25 में CDSCO को भेजे गए मामले: 22
नोट: MDAE और SAE अलग-अलग श्रेणियां हैं. MDAE मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटना है, जबकि SAE गंभीर प्रतिकूल घटना को दर्शाती है. दोनों के आंकड़ों को एक-दूसरे के बराबर नहीं समझना चाहिए.
Last Updated on November 6, 2026 7:41 am
