50 साल के बाद हर तीसरी भारतीय महिला को ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा क्यों?

भारत में 50 साल से अधिक उम्र की हर तीन में से एक महिला को ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा है. हर साल करीब 14 लाख महिलाओं को इससे जुड़े फ्रैक्चर होते हैं. हड्डियों को कमजोर करने वाली इस बीमारी की शुरुआती पहचान के लिए OSI ने Bone Health Score Card लॉन्च किया है. जानिए बीमारी के खतरे, लक्षण और बचाव के तरीके.

क्या बिना लक्षण के कमजोर हो रही हैं आपकी हड्डियां? जानिए खतरा
क्या बिना लक्षण के कमजोर हो रही हैं आपकी हड्डियां? जानिए खतरा
Osteoporosis in India: भारत में 50 साल और उससे अधिक उम्र की हर तीन में से एक महिला को ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा है. यह ऐसी स्थिति है, जिसमें हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है और वे कमजोर होकर आसानी से टूट सकती हैं. इंटरनेशनल ऑस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन (IOF) के 2021 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस से जुड़े करीब 14 लाख फ्रैक्चर होते हैं.

ऑस्टियोपोरोसिस को अक्सर ‘साइलेंट डिजीज’ यानी खामोशी से बढ़ने वाली बीमारी कहा जाता है. इसकी वजह यह है कि हड्डियां कमजोर होती रहती हैं, लेकिन फ्रैक्चर होने तक आमतौर पर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. उम्र बढ़ने के साथ इसका खतरा भी बढ़ता जाता है. खासतौर पर मेनोपॉज यानी मासिक धर्म स्थायी रूप से बंद होने के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर घटने लगता है. इससे हड्डियों का घनत्व तेजी से कम हो सकता है.

इस बीमारी के कारण होने वाले फ्रैक्चर से व्यक्ति की चलने-फिरने की क्षमता और आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकती है. बुजुर्गों में कूल्हे की हड्डी का फ्रैक्चर विशेष रूप से गंभीर साबित हो सकता है.

ऑस्टियोपोरोसिस सोसाइटी ऑफ इंडिया (OSI) के मुताबिक, भारत की करीब 22.9 फीसदी वयस्क आबादी इस बीमारी से प्रभावित है. यह संख्या लगभग 33 करोड़ लोगों के बराबर है. ऑस्टियोपोरोसिस के कारण होने वाले फ्रैक्चर से भारत पर हर साल करीब 14,000 से 20,000 करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ पड़ता है. ये आंकड़े बताते हैं कि फ्रैक्चर होने से पहले ही जोखिम वाले लोगों की पहचान करना कितना जरूरी है.

इसी चुनौती को देखते हुए ऑस्टियोपोरोसिस सोसाइटी ऑफ इंडिया ने सन फार्मा के सहयोग से ‘Why Wait? Till It Breaks’ अभियान के तहत एक साल तक चलने वाली पहल शुरू की है. इसके अंतर्गत ‘Bone Health Score Card’ लॉन्च किया गया है. इस टूल का मकसद डॉक्टरों को मरीजों में ऑस्टियोपोरोसिस के जोखिम का आकलन करने और उन लोगों की पहचान करने में मदद करना है, जिन्हें आगे जांच की जरूरत हो सकती है.

OSI के अध्यक्ष डॉ. सुश्रुत बभुलकर ने बताया कि इस तरह के स्क्रीनिंग टूल की जरूरत इसलिए महसूस हुई, क्योंकि ऑर्थोपेडिक्स, गायनेकोलॉजी, एंडोक्राइनोलॉजी, रूमेटोलॉजी और नेफ्रोलॉजी जैसे अलग-अलग विशेषज्ञता वाले डॉक्टर ऑस्टियोपोरोसिस के प्रबंधन के लिए अलग-अलग दिशानिर्देश अपना सकते हैं. इससे मरीजों के जोखिम का आकलन करने के तरीके में अंतर आ सकता है.

डॉ. बभुलकर के मुताबिक, चिंता सिर्फ ऑस्टियोपोरोसिस तक सीमित नहीं है. उन्होंने कहा, “ऑस्टियोमलेशिया, जिसमें हड्डियों का खनिजीकरण ठीक से नहीं हो पाता और जिसका संबंध अक्सर कैल्शियम या विटामिन D की कमी से होता है, और सारकोपीनिया, जिसमें मांसपेशियों का आकार और ताकत घटने लगती है, ऑस्टियोपोरोसिस के साथ मौजूद हो सकते हैं. इन स्थितियों के एक साथ होने से फ्रैक्चर के बाद इलाज और रिकवरी की प्रक्रिया जटिल हो सकती है.”

उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के एक आंकड़े का हवाला देते हुए बताया कि ऑस्टियोपोरोसिस के कारण कूल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर झेलने वाले 25 से 30 फीसदी मरीजों की एक साल के भीतर मौत हो जाती है, जबकि उन्हें इलाज भी दिया जाता है. यह आंकड़ा खासतौर पर बुजुर्गों और अन्य कमजोर मरीजों में इस तरह के फ्रैक्चर के गंभीर परिणामों को दिखाता है.

कैसे काम करता है Bone Health Score Card?

Bone Health Score Card गत्ते से बना एक घूमने वाला पहिया है. इसके जरिए आठ मानकों के आधार पर किसी व्यक्ति में ऑस्टियोपोरोसिस के जोखिम का आकलन किया जाता है.

डॉ. बभुलकर के अनुसार, इन आठ मानकों में उम्र, बॉडी मास इंडेक्स (BMI), परिवार में बीमारी का इतिहास, पहले से मौजूद अन्य बीमारियां, धूम्रपान, लंबे समय तक स्टेरॉयड का इस्तेमाल और कैंसर के कुछ इलाज शामिल हैं. इनमें स्तन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ थेरेपी भी शामिल हैं.

हर मानक के लिए व्यक्ति को अपनी स्थिति के मुताबिक विकल्प चुनना होता है. इसके बाद संबंधित रिंग को घुमाकर लाल निशान के सामने लाया जाता है. लाल निशान उस मानक के लिए मिलने वाला स्कोर बताता है. इस तरह सभी आठ मानकों के स्कोर को जोड़कर कुल अंक निकाले जाते हैं.

डॉ. बभुलकर ने उदाहरण देते हुए बताया, “अगर कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है तो उसे इस मानक के लिए दो अंक मिलेंगे, जबकि धूम्रपान नहीं करने वाले व्यक्ति का स्कोर शून्य होगा. अंतिम स्कोर के आधार पर व्यक्ति को जोखिम की अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है. शून्य से तीन तक का स्कोर कम जोखिम दर्शाता है, जबकि 12 से अधिक स्कोर बहुत अधिक जोखिम की श्रेणी में आता है.”

हालांकि, 40 साल की उम्र के बाद मामूली गिरने या हल्की चोट से हड्डी टूटने का इतिहास होने पर व्यक्ति को सीधे बहुत अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा जाएगा. ऐसा कुल स्कोर चाहे जो भी हो, किया जाएगा.

इसे फ्रेजिलिटी फ्रैक्चर (Fragility Fracture) कहा जाता है. यानी ऐसा फ्रैक्चर जो गिरने या किसी मामूली चोट के कारण हो जाए, जबकि सामान्य तौर पर इतनी हल्की चोट से स्वस्थ हड्डी नहीं टूटनी चाहिए.

यह स्कोर कार्ड शुरुआती स्क्रीनिंग के लिए तैयार किया गया है. इसे बीमारी की पुष्टि करने वाला टेस्ट नहीं माना जाना चाहिए.

स्क्रीनिंग में जिन लोगों को अधिक या बहुत अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा जाएगा, डॉक्टर उनके लिए आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं. इसमें ड्यूल-एनर्जी एक्स-रे एब्जॉर्प्टियोमेट्री (DXA या DEXA) स्कैन और क्वांटिटेटिव कंप्यूटेड टोमोग्राफी (QCT) शामिल हो सकते हैं. इन जांचों के जरिए हड्डियों के घनत्व का पता लगाया जा सकता है.

जरूरत के मुताबिक खून की जांच भी कराई जा सकती है, जिसमें कैल्शियम, विटामिन D और पैराथायरॉइड हार्मोन के स्तर की जांच शामिल है.

डॉ. बभुलकर ने कहा कि ये जांच महंगी हो सकती हैं और खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में इनकी उपलब्धता भी सीमित हो सकती है. स्कोर कार्ड का उद्देश्य ऐसे लोगों की पहचान करना है, जिन्हें आगे जांच की जरूरत हो सकती है. इसका मकसद हर व्यक्ति को बिना जरूरत स्कैन कराने के लिए कहना नहीं है.

डॉक्टरों और आम लोगों तक कैसे पहुंचेगा यह टूल?

इस टूल को चरणबद्ध तरीके से लोगों तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है. शुरुआत में जनरल प्रैक्टिशनर्स और निजी क्लीनिकों में काम करने वाले डॉक्टरों सहित स्वास्थ्य विशेषज्ञों को इसके इस्तेमाल से परिचित कराया जाएगा.

इसके बाद इसे आम लोगों के लिए उपलब्ध कराने और इसका ऑनलाइन या डाउनलोड किया जा सकने वाला संस्करण जारी करने पर काम किया जाएगा.

डॉ. बभुलकर ने बताया कि शुरुआती लक्ष्य देश के 800 जिलों में डॉक्टरों तक इस टूल को पहुंचाना है.

सन फार्मा के इंडिया बिजनेस, सुपर क्लस्टर-II के CEO जोसेफ जेराल्ड ने कहा कि इस स्कोर कार्ड का डिजिटल संस्करण भी उपलब्ध कराया जाएगा. इसे दिसंबर 2026 के पहले सप्ताह तक डॉक्टरों और आम लोगों के लिए मुफ्त में उपलब्ध कराने की योजना है. हालांकि, उनके बयान के समय इसका डिजिटल संस्करण जारी नहीं हुआ था.

इसका फिजिकल संस्करण गत्ते से बने घूमने वाले पहिए के रूप में तैयार किया गया है. इसे कम से कम A4 आकार में रखने की योजना है, ताकि इसमें दी गई जानकारी आसानी से पढ़ी जा सके.

स्कोर कार्ड के नतीजों को मरीज कैसे समझें?

डॉक्टरों के मुताबिक, इस स्क्रीनिंग टूल की सेंसिटिविटी और स्पेसिफिसिटी 95 फीसदी से अधिक है.

सेंसिटिविटी का मतलब है कि कोई टेस्ट बीमारी से प्रभावित लोगों की सही पहचान कितनी अच्छी तरह कर सकता है. वहीं, स्पेसिफिसिटी बताती है कि टेस्ट बीमारी से प्रभावित नहीं होने वाले लोगों की सही पहचान कितनी प्रभावी ढंग से करता है.

इस स्कोर कार्ड के साथ दी गई सामग्री में कई संदर्भों का उल्लेख किया गया है. इनमें US Preventive Services Task Force की 2025 की ऑस्टियोपोरोसिस स्क्रीनिंग संबंधी सिफारिश, पॉल टीवी और उनके सहयोगियों की ओर से 2021 में भारत में ऑस्टियोपोरोसिस स्क्रीनिंग टूल पर प्रकाशित समीक्षा और FRAX फ्रैक्चर-रिस्क असेसमेंट रिसोर्स शामिल हैं.

इस स्कोर कार्ड का उद्देश्य ऑस्टियोपोरोसिस के जोखिम का आकलन आसान बनाना और लोगों को समय रहते डॉक्टर से सलाह लेने के लिए प्रोत्साहित करना है.

हालांकि, कम स्कोर आने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को ऑस्टियोपोरोसिस नहीं है. इसी तरह अधिक स्कोर आने से बीमारी की पुष्टि भी नहीं होती. बीमारी का सही पता लगाने और इलाज तय करने के लिए डॉक्टर की जांच और जरूरत पड़ने पर आगे की मेडिकल जांच जरूरी है.

ये भी पढ़ें- ज्यादा नींद और सुबह थकान क्या डिप्रेशन की नई पहचान हो सकती है?

कुल मिलाकर, ऑस्टियोपोरोसिस का सबसे बड़ा खतरा यही है कि यह लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के हड्डियों को कमजोर कर सकता है. ऐसे में समय रहते जोखिम की पहचान और डॉक्टर से सलाह लेना फ्रैक्चर जैसी गंभीर स्थिति से बचाव में अहम भूमिका निभा सकता है.

Last Updated on November 4, 2026 9:13 am

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