Balaghat में 32 आदिवासी बच्चों की मौत, स्वास्थ्य व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक क्यों?

मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों की जांच में स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियां सामने आई हैं. केंद्र की NJORT रिपोर्ट के मुताबिक, जिला महामारी विशेषज्ञ और माइक्रोबायोलॉजिस्ट के पद खाली थे, प्रभावित गांव में एक साल से आशा कार्यकर्ता नहीं थी और कुपोषण बड़े पैमाने पर दर्ज हुआ. जांच में खसरा और मलेरिया के मामले भी मिले.

बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत, बीमारी की पहचान और इलाज में देरी क्यों हुई?
बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत, बीमारी की पहचान और इलाज में देरी क्यों हुई?
Balaghat में 32 आदिवासी बच्चों की मौत: मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों की जांच करने वाली केंद्र सरकार की National Joint Outbreak Response Team (NJORT) ने स्वास्थ्य व्यवस्था में गंभीर कमियां पाई हैं. जांच के मुताबिक, बीमारी की निगरानी से लेकर लैब जांच, टीकाकरण के रिकॉर्ड, कुपोषण की पहचान और गंभीर बच्चों को बड़े अस्पतालों तक पहुंचाने की व्यवस्था में कई स्तरों पर खामियां थीं.

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जून से अब तक करीब 32 आदिवासी बच्चों की मौत के मामले सामने आए हैं. बच्चों की उम्र एक से 13 साल के बीच थी. उनमें तेज बुखार, त्वचा पर चकत्ते, लाल निशान, पेट दर्द और मुंह में छाले जैसे लक्षण मिले. जांच में खसरा और मलेरिया के साथ डेंगू, चिकनगुनिया और एंटरोवायरस संक्रमण के कुछ मामले भी सामने आए. हालांकि, रिपोर्ट ने सभी मौतों के लिए किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया.

स्वास्थ्य व्यवस्था में कहां-कहां मिलीं खामियां?

जांच रिपोर्ट के मुताबिक, जिले की निगरानी इकाई – जिसका काम बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानना और संक्रमण फैलने से रोकना है – एक डेटा मैनेजर के भरोसे चल रही थी.

  • जिला महामारी विशेषज्ञ (District Epidemiologist) का पद खाली था. यह अधिकारी बीमारी की निगरानी, संक्रमण की जांच और आंकड़ों के विश्लेषण में अहम भूमिका निभाता है.

  • जिले में District Public Health Laboratory नहीं थी और माइक्रोबायोलॉजिस्ट का पद भी खाली था.

  • सबसे ज्यादा प्रभावित गांव कुंडेकासा में एक साल से अधिक समय से आशा कार्यकर्ता (ASHA worker) नहीं थी. रिपोर्ट के मुताबिक, इससे बीमार बच्चों की समय पर पहचान, लोगों को जागरूक करने और मरीजों की निगरानी में बड़ी कमी आई.

  • निगरानी, लैब, टीकाकरण और पोषण कार्यक्रमों के बीच आंकड़े जुटाने, साझा करने और रिपोर्ट करने में भी गंभीर समस्याएं थीं.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह संकट किसी एक बीमारी या एक अधिकारी की चूक का नतीजा नहीं दिखता. गांव में बीमार बच्चे की पहचान से लेकर उसे अस्पताल पहुंचाने और सही इलाज मिलने तक, स्वास्थ्य व्यवस्था के कई स्तरों पर कमजोरियां सामने आईं.

सरकार के आंकड़ों और जांच रिपोर्ट में अंतर

मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने पहले कहा था कि अगस्त में चार दूरस्थ, बैगा आदिवासी बहुल गांवों में 8 बच्चों की मौत हुई और करीब 100 बच्चे बीमार पड़े. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 29 अगस्त को बालाघाट का दौरा भी किया था.

हालांकि, सितंबर में केंद्रीय स्वास्थ्य अधिकारियों को सौंपी गई NJORT की रिपोर्ट ने इस पूरे मामले में स्वास्थ्य व्यवस्था की व्यापक विफलताओं की ओर इशारा किया. रिपोर्ट में मौतों की कोई अंतिम संख्या निर्धारित नहीं की गई.

बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शत्रुघ्न दहिया ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जून से अब तक बताए गए लक्षणों के साथ करीब 12 मौतों की जांच में जानकारी मिली है. हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार ने मुआवजे के लिए 32 मामलों को चिह्नित किया है.

तीन बच्चों की मौत की जांच में क्या सामने आया?

NJORT की टीम ने 13 से 18 अगस्त के बीच बालाघाट के दौरे के दौरान तीन बच्चों की मौत की विस्तार से जांच की. चौथे परिवार ने जांच में शामिल होने से इनकार कर दिया था.

1. कुंडेकासा में चार साल के बच्चे की मौत

रिपोर्ट के मुताबिक, चार साल के एक बच्चे को त्वचा पर चकत्ते, बुखार, मुंह में छाले, भूख न लगने और दौरे पड़ने जैसे लक्षण थे. उसकी 6 अगस्त को घर पर मौत हो गई.

रिपोर्ट में कहा गया कि मौत से तीन दिन पहले आशा कार्यकर्ता बच्चे के घर गई थी और परिवार को अस्पताल ले जाने की सलाह दी थी. लेकिन परिवार बच्चे को अस्पताल नहीं ले गया.

2. कुंडेकासा में तीन साल की बच्ची की मौत

एक अन्य मामले में तीन साल की बच्ची की 22 जुलाई को उसकी नानी के घर पर मौत हो गई. रिपोर्ट के अनुसार, आशा कार्यकर्ता और एक मल्टी-पर्पज वर्कर ने परिवार से बच्ची की मलेरिया जांच कराने को कहा था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

परिवार ने कथित तौर पर बीमारी को ‘माता’ से जोड़कर देखा और पारंपरिक तरीकों से इलाज कराने की कोशिश की. NJORT ने देरी से इलाज मिलने के साथ सांस्कृतिक मान्यताओं, अधूरे टीकाकरण रिकॉर्ड और लैब जांच की अनुपस्थिति को भी इस मामले से जुड़ी समस्याओं के रूप में दर्ज किया.

3. बोंदारी गांव की तीन साल की बच्ची

तीसरी बच्ची को परिवार ने गांव से करीब 35 किलोमीटर दूर एक पारंपरिक चिकित्सक से इलाज दिलाने के बाद 9 अगस्त को जिला अस्पताल, बालाघाट में भर्ती कराया.

रिपोर्ट के मुताबिक, भर्ती के समय बच्ची का वजन सिर्फ 4.9 किलोग्राम और लंबाई 66 सेंटीमीटर थी. 11 अगस्त को अस्पताल में उसकी मौत हो गई.

टीम ने बच्ची में गंभीर पोषण की कमी दर्ज की, लेकिन उसकी मौत का निश्चित कारण स्थापित नहीं किया.

357 आंगनवाड़ी केंद्रों में कुपोषण की गंभीर स्थिति

जांच टीम ने बिरसा ब्लॉक के क्षेत्रों में 357 आंगनवाड़ी केंद्रों के आंकड़ों और बच्चों की स्थिति की पड़ताल की.

रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 604 बच्चों को गंभीर तीव्र कुपोषण (Severe Acute Malnutrition) और 1,985 बच्चों को मध्यम तीव्र कुपोषण (Moderate Acute Malnutrition) की श्रेणी में दर्ज किया गया.

पहले की फील्ड टीमों ने बैगा समुदाय के बच्चों में लगभग 20-25% तक स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली कमजोरी या गंभीर दुबलापन मिलने की जानकारी दी थी.

लेकिन NJORT ने पाया कि केवल 30-35% बच्चे ही Poshan Tracker पर दर्ज थे. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा बच्चों का हर सप्ताह वजन करने की प्रक्रिया भी नियमित नहीं थी.

Poshan Tracker सरकार की डिजिटल व्यवस्था है, जिसके जरिए आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों के पोषण और विकास की निगरानी की जाती है. इसका उद्देश्य कुपोषित बच्चों की पहचान करना और समय के साथ उनकी स्थिति पर नजर रखना है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सहायक नर्स दाइयों (ANM), आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के संयुक्त दौरे नियमित नहीं थे. इससे मातृ स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं के बीच समन्वय प्रभावित हुआ.

इसके अलावा, Poshan Tracker में दर्ज माप और NJORT की फील्ड जांच में मिले माप के बीच भी महत्वपूर्ण अंतर पाए गए.

जांच में किन बीमारियों के प्रमाण मिले?

NJORT ने अलग-अलग संक्रमणों की जांच के लिए नमूने लिए. रिपोर्ट में दर्ज परिणाम इस प्रकार थे:

जांच कुल नमूने पॉजिटिव
खसरा (Measles) 64 25
मलेरिया (Malaria) 32 27
डेंगू (Dengue) 28 2
चिकनगुनिया (Chikungunya) 28 1
एंटरोवायरस (Enterovirus) 24 2

पानी के पांचों नमूनों में एडेनोवायरस की जांच पॉजिटिव आई. वहीं, कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की जांच किए गए नौ नमूनों में से आठ पॉजिटिव मिले.

हालांकि, रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन परिणामों से पूरे प्रकोप के लिए किसी एक कारण की पुष्टि नहीं होती. टीम ने इस स्थिति को मिश्रित बुखार संबंधी बीमारी का समूह (Mixed Febrile Illness Cluster) बताया.

सरकार का क्या कहना है?

बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शत्रुघ्न दहिया ने कहा कि जांच में सामने आई कमियां मुख्य रूप से कर्मचारियों की कमी से जुड़ी थीं और उन्हें दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि क्षेत्र में कुपोषण बड़ी समस्या रही है. आपूर्ति व्यवस्था में भी परेशानी आई थी, लेकिन अब बच्चों तक लगातार पोषण पहुंचाने पर ध्यान दिया जा रहा है.

दहिया के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग ने लगभग 3,500 बच्चों का उनके घरों पर इलाज किया. इसके अलावा गंभीर स्थिति वाले करीब 750 बच्चों का उपचार किया गया. उन्होंने दावा किया कि गंभीर स्थिति में पहुंचे लगभग 800 बच्चों की जान बचाने में सफलता मिली.

सरकार ने पहले यह भी बताया था कि बालाघाट में चार ब्लॉक महिला विकास अधिकारियों की तैनाती की गई है. क्षेत्र में 14 उप-स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं.

राहुल गांधी ने सरकार पर क्या आरोप लगाए?

पिछले सप्ताह प्रभावित परिवारों से मुलाकात के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बच्चों की मौतों को “सरकार की पूरी तरह विफलता” बताया था. उन्होंने कहा था कि बच्चे बीमारी और कुपोषण से जूझ रहे थे, जबकि क्षेत्र में बुनियादी सरकारी सहायता तक पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं थी.

इससे पहले सितंबर के मध्य में कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीप्ते ने भी बालाघाट का दौरा किया था.

स्थानीय कांग्रेस विधायक संजय उइके ने दावा किया कि उनके अनुमान के मुताबिक मृत बच्चों की संख्या 40 से अधिक है. उन्होंने कहा कि काफी दबाव के बाद सरकार ने 30 से अधिक परिवारों के लिए मुआवजे की घोषणा की. उन्होंने उम्मीद जताई कि स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता केवल अस्थायी कदम बनकर न रह जाए.

सबसे बड़ा सवाल: बच्चों तक समय पर मदद क्यों नहीं पहुंची?

बालाघाट की जांच रिपोर्ट एक ऐसे संकट की ओर इशारा करती है, जिसमें बीमारी की पहचान, स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, लैब जांच, टीकाकरण के रिकॉर्ड और पोषण सेवाओं के बीच समन्वय जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं में कमियां सामने आईं.

हालांकि, जांच ने सभी मौतों के लिए किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया है. ऐसे में बच्चों की मौतों के कारणों और स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी तय करने के लिए विस्तृत जांच और पारदर्शी आंकड़े जरूरी हैं.

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सवाल यह है कि जब बच्चों में बुखार, चकत्ते और कुपोषण जैसे गंभीर संकेत मौजूद थे, तो समय रहते उनकी पहचान, जांच और इलाज सुनिश्चित क्यों नहीं हो सका?

Last Updated on October 9, 2026 9:07 am

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