PTI की खबर के मुताबिक लोकसभा का मॉनसून सत्र गुरुवार को खत्म हो गया। PRS Legislative Research के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार लोकसभा में तय समय का सिर्फ 15 प्रतिशत ही काम हो पाया। पिछले 22 वर्षों में यह सबसे कम काम करने वाले सत्रों में शामिल रहा।
आसान भाषा में समझें तो संसद के लिए जितना समय तय किया गया था, उसका बहुत कम हिस्सा ही सदन के कामकाज में इस्तेमाल हो सका। बाकी समय अलग-अलग मुद्दों पर विरोध, हंगामे और राजनीतिक टकराव के कारण प्रभावित हुआ।
PRS के आंकड़ों के मुताबिक साल 2004 के बाद लोकसभा के केवल दो सत्र ऐसे रहे हैं, जिनकी उत्पादकता इस मॉनसून सत्र से भी कम रही। इनमें 2010 और 2013 के शीतकालीन सत्र शामिल हैं।
2010 के शीतकालीन सत्र में लोकसभा की उत्पादकता सिर्फ 5 प्रतिशत रही थी। वहीं, 2013 के शीतकालीन सत्र में यह आंकड़ा 8 प्रतिशत था। इसके बाद मौजूदा मानसून सत्र 15 प्रतिशत उत्पादकता के साथ सबसे कम काम करने वाले सत्रों में शामिल हो गया है।
PRS के मुताबिक, 2016 का शीतकालीन सत्र भी 15 प्रतिशत उत्पादकता के साथ इसी स्तर पर था। यानी मौजूदा मॉनसून सत्र की स्थिति 2016 के शीतकालीन सत्र जैसी ही रही।
पिछले 22 वर्षों में संसद के कामकाज में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। कुछ सत्रों में लोकसभा ने अपने तय समय से ज्यादा काम किया, जबकि कुछ सत्रों में राजनीतिक विवाद और हंगामे के कारण कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ।
इस मॉनसून सत्र में भी कई मुद्दों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार टकराव देखने को मिला। विपक्षी सांसदों ने अलग-अलग मुद्दों पर सरकार के खिलाफ विरोध किया। कई बार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही रोकनी पड़ी और बाद में इसे दोबारा शुरू किया गया।
इस तरह सदन के लिए तय किया गया काफी समय प्रभावी चर्चा और दूसरे संसदीय कामों में इस्तेमाल नहीं हो पाया। इसका सीधा असर लोकसभा की कुल उत्पादकता पर पड़ा।
संसद में विधेयकों पर चर्चा करना, सवाल पूछना, सरकार से जवाब लेना और जनता से जुड़े मुद्दों पर बहस करना सांसदों के प्रमुख कामों में शामिल है। लेकिन जब सदन की कार्यवाही लगातार बाधित होती है तो इन कामों के लिए उपलब्ध समय कम हो जाता है।
PRS Legislative Research संसद के कामकाज से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करता है। उसके आंकड़ों के आधार पर किसी सत्र की उत्पादकता का अंदाजा लगाया जाता है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि इस बार लोकसभा अपने निर्धारित समय का केवल 15 प्रतिशत ही प्रभावी रूप से इस्तेमाल कर सकी।
हालांकि, संसद में हंगामा और विरोध लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माने जाते हैं। विपक्ष अक्सर सरकार का ध्यान महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर खींचने के लिए विरोध करता है। वहीं, सरकार की ओर से कई बार विपक्ष पर सदन का कामकाज बाधित करने का आरोप लगाया जाता है।
मॉनसून सत्र की कम उत्पादकता ने एक बार फिर संसद के सुचारू संचालन और सत्ता पक्ष-विपक्ष के बीच सहमति की जरूरत पर सवाल खड़े किए हैं।
PRS के आंकड़ों के मुताबिक, 15 प्रतिशत उत्पादकता के साथ यह मानसून सत्र 2004 के बाद लोकसभा के सबसे कम उत्पादक सत्रों में तीसरे स्थान पर रहा।
Last Updated on August 13, 2026 7:53 pm
