Live-In Relationship Case: लिव-इन पार्टनर के अपहरण, शादी के बहाने बहलाने और बलात्कार के एक मामले में आरोपी व्यक्ति की सज़ा को रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं, तो लड़कों और पुरुषों के खिलाफ FIR दर्ज होती है और उन्हें दोषी ठहरा दिया जाता है, क्योंकि मौजूदा कानून महिलाओं के पक्ष में हैं और वे उस दौर में बनाए गए थे जब लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा अस्तित्व में ही नहीं थी।
यह टिप्पणी हाईकोर्ट ने महाराजगंज जिले की स्पेशल जज (POCSO एक्ट) अदालत के 6 मार्च 2024 के आदेश के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान की। आरोपी के खिलाफ अगस्त 2021 में मामला दर्ज हुआ था। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की डिवीजन बेंच ने कहा—
“यह मामला पश्चिमी विचारधाराओं के प्रभाव में बिना विवाह के साथ रहने की बढ़ती प्रवृत्ति का उदाहरण है। ऐसे संबंध टूटने के बाद FIR दर्ज होती है और चूंकि कानून महिलाओं के पक्ष में हैं, इसलिए उन कानूनों के आधार पर लड़कों/पुरुषों को दोषी ठहरा दिया जाता है, जो उस समय बनाए गए थे जब लिव-इन की अवधारणा मौजूद ही नहीं थी।”
क्या है पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, OBC समुदाय से जुड़े एक युवक पर आरोप था कि उसने फरवरी 2021 में अपने गांव की एक दलित युवती को शादी का झांसा देकर अपने साथ ले गया। युवती अगस्त 2021 में अपने माता-पिता के घर लौट आई। उसकी मां ने आरोप लगाया कि युवक ने शादी का वादा किया लेकिन बाद में शादी नहीं की और उसे घर से निकाल दिया। सामाजिक शर्म के कारण वह पहले पुलिस के पास नहीं जा सकी। शिकायत के समय आधार कार्ड के अनुसार युवती की जन्मतिथि 1 जनवरी 2003 दर्ज थी।
आरोपी का पक्ष
स्थानीय अदालत में बयान देते हुए युवक ने सभी आरोपों को झूठा बताया। उसने कहा कि युवती की मां आदतन मुकदमेबाज़ है और झूठे केस दर्ज कराकर पैसे ऐंठती है। आरोपी ने यह भी दावा किया कि यह केस सामाजिक कल्याण विभाग से 8,25,000 रुपये का मुआवज़ा पाने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया।
किन धाराओं में चार्जशीट दाखिल हुई?
इस मामले में आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 323, 363, 366, 376, 506, POCSO एक्ट की धारा 6 और SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(V) के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी।
निचली अदालत का फैसला
महाराजगंज की अदालत ने आरोपी को सभी धाराओं में दोषी ठहराते हुए—
- IPC 363 और 366 में 7 साल,
- IPC 323 में 1 साल,
- POCSO एक्ट में 20 साल,
- SC/ST एक्ट में उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की सज़ा?
डिवीजन बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने CMO महाराजगंज द्वारा जारी उम्र प्रमाण पत्र पर विचार नहीं किया, जिससे यह साबित होता है कि 19 अगस्त 2021 को पीड़िता की उम्र लगभग 20 वर्ष थी। FIR और मां के बयान के अनुसार युवती 22 फरवरी 2021 को अपनी मर्जी से घर से गई थी।
कोर्ट ने कहा कि FIR में पहले पीड़िता की उम्र 18½ साल बताई गई थी, लेकिन बाद में कानूनी सलाह पर अदालत में 17 साल बताई गई।
हाईकोर्ट के अनुसार, पीड़िता बालिग थी और अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई, सार्वजनिक परिवहन से गोरखपुर और फिर बेंगलुरु गई। वह छह महीने तक आरोपी के साथ ऐसे इलाके में रही जहां कई अन्य घर थे। ऐसे में जबरन अपहरण या जबरन शादी का आरोप टिकता नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पीड़िता बालिग थी, तो POCSO एक्ट की धारा 6 और IPC की धारा 376 के तहत सज़ा भी उचित नहीं है, क्योंकि दोनों के बीच सहमति से संबंध थे।
SC/ST एक्ट पर भी टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(V) स्वतंत्र धारा नहीं है और तभी लागू होती है जब IPC के तहत 10 साल या उससे अधिक की सज़ा दी गई हो। इसलिए इस धारा के तहत दी गई सज़ा भी टिकाऊ नहीं है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने कहा—
“उपरोक्त सभी तथ्यों के मद्देनज़र ट्रायल कोर्ट का फैसला टिकाऊ नहीं है और उसे निरस्त किया जाता है। आरोपी जेल में है, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।”
Last Updated on January 26, 2026 7:46 pm
