New India: डिजिटली स्मार्ट, लेकिन बतौर नागरिक कमजोर हो रहे?

– कृष्णा राव

भारत खुद को दुनिया का सबसे युवा देश कहने में गर्व महसूस करता है। 35 वर्ष से कम आयु की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी के साथ यह माना जाता है कि देश जनसांख्यिकीय लाभ (डेमोग्राफिक डिविडेंड) का बड़ा फायदा उठाने की स्थिति में है। युवाओं को आर्थिक विकास, नवाचार और वैश्विक पहचान का इंजन बताया जाता है। लेकिन यह लाभ अपने आप नहीं मिलता, इसे कमाना पड़ता है। आज एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है—क्या हम जिम्मेदार नागरिक तैयार कर रहे हैं या सिर्फ डिग्रीधारी ऐसे लोग, जिनके नागरिक मूल्य कमजोर हैं?

शहरी और अर्ध-शहरी भारत की रोजमर्रा की तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक व्यवहार, कतारों का सम्मान न करना और सेवा क्षेत्र में काम करने वालों के प्रति असम्मान—ये सब अब अपवाद नहीं, आम बात बन चुके हैं। दिलचस्प यह है कि यही लोग विदेशों में नियमों का पूरी तरह पालन करते दिखाई देते हैं, जहां कानून सख्ती से लागू होते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत में नागरिक भावना भीतर से नहीं, बल्कि बाहरी दबाव से संचालित होती है।

हर साल लाखों स्नातक तैयार करने के बावजूद शिक्षा को नागरिक चेतना में बदलने में देश सफल नहीं हुआ है। स्कूल और कॉलेज अंकों, रैंकिंग और प्लेसमेंट पर जोर देते हैं, जबकि नागरिक शिक्षा केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। इसे न गंभीरता से पढ़ाया जाता है, न व्यवहार में उतारा जाता है। शिष्टाचार, संयम और सार्वजनिक जिम्मेदारी को जीवन कौशल की बजाय अतिरिक्त गुण माना जाता है। परिणामस्वरूप, एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो डिजिटल रूप से सक्षम है, लेकिन नागरिक अनुशासन में कमजोर है।

एक और चिंता का विषय है बढ़ती असहिष्णुता और सामाजिक ध्रुवीकरण, जिसमें युवा अक्सर अग्रिम पंक्ति में दिखते हैं। भाषा, क्षेत्र, धर्म या सोशल मीडिया पर मतभेद—असहमति को स्वीकार करने की जगह सिकुड़ती जा रही है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज किया है। एल्गोरिद्म तर्क की नहीं, उत्तेजना की सराहना करते हैं। बहस की जगह अपशब्द ले लेते हैं। तुरंत मान्यता पाने की आदत ने धैर्य और समझ की क्षमता को कम किया है। यदि युवा भिन्न विचारों को स्वीकार नहीं कर पाएंगे, तो लोकतंत्र की मजबूती पर सवाल खड़े होंगे।

काम के प्रति नजरिया भी बदलता दिख रहा है। युवाओं में महत्वाकांक्षा तो है, लेकिन बिना लंबी मेहनत के परिणाम पाने की चाह बढ़ रही है। रातों-रात सफलता और वायरल प्रसिद्धि की संस्कृति ने लगातार प्रयास के मूल्य को कमजोर किया है। दूसरी ओर, उच्च बेरोजगारी, कड़ी प्रतिस्पर्धा और सीमित अवसरों ने भी अपेक्षाओं को प्रभावित किया है।

सरकारी श्रम सर्वेक्षणों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर अपेक्षाकृत अधिक है। इसके बावजूद कौशल विविधीकरण या छोटे स्तर के उद्यमों की ओर बढ़ने के बजाय सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरियों—खासतौर पर सरकारी नौकरी—की ओर झुकाव बढ़ा है, भले ही वह योग्यता या उत्पादकता से मेल न खाती हो। शारीरिक श्रम और व्यावसायिक कार्य आज भी सामाजिक रूप से कमतर माने जाते हैं।

इन रुझानों के पीछे एक मनोवैज्ञानिक बदलाव भी देखा जा रहा है—अधिकार की भावना में वृद्धि और सहनशीलता में कमी। कई अध्ययनों में युवाओं में कम निराशा सहन करने की क्षमता, भावनात्मक नियंत्रण की कमजोरी और सहानुभूति की कमी की ओर इशारा किया गया है। अत्यधिक सुरक्षा में पले-बढ़े और असफलता का सीमित अनुभव रखने वाले युवा अक्सर परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की बजाय उनसे अपेक्षा रखते हैं कि वे उनके अनुकूल हों।

हालांकि पूरी जिम्मेदारी युवाओं पर डालना उचित नहीं होगा। यह स्थिति सामूहिक रूप से बनी है। परिवार अंकों को प्राथमिकता देते हैं, व्यवहार को नहीं। शिक्षण संस्थान चरित्र से ज्यादा स्मरण शक्ति को महत्व देते हैं। सार्वजनिक व्यवस्था अनुशासन की बात करती है, लेकिन पालन में ढिलाई दिखती है। राजनीतिक विमर्श में आक्रामकता सामान्य हो गई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म उत्तेजना को बढ़ावा देते हैं। युवा उसी समाज का प्रतिबिंब हैं, जिसमें वे बड़े हो रहे हैं।

यदि इस दिशा को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो जनसांख्यिकीय लाभ बोझ में बदल सकता है। समाधान नैतिक भाषणों में नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार में है। नागरिक शिक्षा को अनिवार्य, मूल्यांकित और व्यवहारिक बनाया जाना चाहिए। सामुदायिक सेवा को शिक्षा का हिस्सा बनाना चाहिए। कानूनों का समान रूप से पालन सुनिश्चित होना चाहिए। श्रम के सम्मान को नीतियों और नेतृत्व के उदाहरण से मजबूत किया जाना चाहिए। डिजिटल साक्षरता में संयम और जिम्मेदारी पर भी जोर होना चाहिए।

भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन नागरिक चरित्र की कमी चिंता का विषय है। केवल बुद्धिमत्ता से राष्ट्र नहीं बनते। उन्हें शिष्टाचार, सहिष्णुता, अनुशासन और बिना अधिकार भावना के मेहनत की भी आवश्यकता होती है। जब तक ये मूल्य मजबूत नहीं होंगे, तब तक युवा आबादी एक संभावना तो रहेगी, लेकिन पूरी ताकत में नहीं बदल पाएगी।

#जयहिंद

(उपरोक्त विचार लेखक के निजी हैं। लेखक पूर्व @BSF_India अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने परिचालन इकाइयों का नेतृत्व किया है और सीमा प्रबंधन, आंतरिक सुरक्षा व उग्रवाद-रोधी अभियानों में विशेषज्ञता रखी है।)

Last Updated on February 12, 2026 3:26 pm

Related Posts