SIR विवाद और प्रदर्शनों के बीच मोहन भागवत ने ‘वैश्विक साजिश’ का मुद्दा क्यों उठाया?

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में विजयादशमी संबोधन के दौरान देश में विरोध प्रदर्शनों, सामाजिक विभाजन और कथित वैश्विक साजिश को लेकर चिंता जताई. संघ के 101वें स्थापना दिवस पर उन्होंने SIR विवाद के बीच आंदोलनों के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठाए. साथ ही वंदे मातरम, राष्ट्रीय एकता और भारत को विश्वगुरु बनाने की बात कही.

मोहन भागवत ने बंगाल विभाजन और 1947 का जिक्र क्यों किया?
मोहन भागवत ने बंगाल विभाजन और 1947 का जिक्र क्यों किया?
Mohan Bhagwat Speech: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को विजयादशमी के अवसर पर अपने संबोधन में देश के भीतर ऐसी गतिविधियों के प्रति सतर्क रहने की अपील की, जो व्यवस्था, विचारधाराओं और व्यक्तियों के खिलाफ नफरत फैलाने का प्रयास करती हैं. नागपुर में संघ के 101वें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने आरोप लगाया कि भारत को कमजोर रखने की इच्छा रखने वाली वैश्विक ताकतें भी ऐसी परिस्थितियों का फायदा उठाती हैं.

उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब विपक्षी दलों के साथ-साथ छात्र और युवा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों में Cockroach Janta Party (CJP) के नेतृत्व में भी आंदोलन हुए हैं.

‘देश में सत्ता परिवर्तन नहीं होगा’

भागवत ने कहा कि जब कोई आंदोलन किसी व्यक्ति, समूह या विचारधारा के प्रति दुश्मनी और विरोध की भावना से प्रेरित होकर राजनीति का औजार बन जाता है, तो भारत को कमजोर करने वाली ताकतें इसका फायदा उठाती हैं.

उन्होंने कहा कि मतभेदों को आपसी दुश्मनी में बदलना, लोगों में पीड़ित होने की भावना पैदा करना और देश की व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ाना ऐसी ताकतों की कार्यप्रणाली का हिस्सा है. उनके मुताबिक, इसका परिणाम सामाजिक तनाव, असंतोष, अलगाववाद, अव्यवस्था और अराजकता के रूप में सामने आ सकता है.

RSS प्रमुख ने कहा कि समाज को विभाजनकारी विचारों से पैदा होने वाले बौद्धिक भ्रम के प्रति सतर्क रहना चाहिए. उन्होंने लोगों से उकसावे में नहीं आने और आपसी सद्भाव बनाए रखने की अपील की. साथ ही उन्होंने भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाने के लक्ष्य की दिशा में लगातार काम करने पर जोर दिया.

भागवत ने स्पष्ट किया कि देश में सत्ता परिवर्तन नहीं होगा. उनके बयान में हाल के दिनों में दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों का संदर्भ देखा गया.

‘वैश्विक साजिश’ की ओर इशारा

भागवत ने कहा कि कुछ वैश्विक ताकतें भारत को अपने प्रभाव में बनाए रखना चाहती हैं और इस प्रक्रिया में समय-समय पर अपनी भूमिका निभाती हैं. उन्होंने प्रदर्शनों के पीछे संभावित वैश्विक साजिश की आशंका भी जताई.

उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में हाल में हुए विरोध प्रदर्शनों और अशांति का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में ऐसे आंदोलन अस्थिरता पैदा कर रहे हैं.

हालांकि, अपने संबोधन में उन्होंने इस कथित वैश्विक साजिश के समर्थन में कोई विशिष्ट सबूत या किसी विशेष ताकत की पहचान नहीं बताई.

वंदे मातरम और राष्ट्रीय एकता पर जोर

भागवत ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का उल्लेख करते हुए कहा कि बंगाल विभाजन के समय इसने राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

उन्होंने कहा कि जब ब्रिटिश शासन के दौरान लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का प्रयास किया, तब समाज ने इसका विरोध किया और अंग्रेजों को विभाजन का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा.

भागवत ने सवाल उठाया कि 1947 में देश का विभाजन क्यों नहीं रोका जा सका, जबकि बंगाल विभाजन के समय एकता की भावना प्रभावी रही थी.

उनके मुताबिक, लोगों के बीच यह धारणा मजबूत की गई कि अलग दिखने वाले समुदाय अलग हैं और उनके हित भी एक-दूसरे से अलग हैं. उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक और कट्टरपंथी विचारधाराओं के प्रभाव में समाज भी इस सोच को स्वीकार करने लगा.

भागवत ने आरोप लगाया कि अलगाववाद, राजनीतिक वर्चस्व की इच्छा और स्वार्थ ने देश को एकजुट रखने वाले आधार को कमजोर किया. उन्होंने यह भी कहा कि तुष्टीकरण की मानसिकता ने विभाजनकारी सोच को बढ़ावा दिया और अंततः देश का विभाजन हुआ.

उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद देश को सीमाओं पर और आंतरिक स्तर पर लंबे समय तक अशांति, अविश्वास, असुरक्षा और संघर्ष का सामना करना पड़ा.

RSS प्रमुख ने ‘वंदे मातरम’ को आज भी राष्ट्रीय एकता का प्रभावशाली प्रतीक बताया. उन्होंने कहा कि यह भारत का राष्ट्रीय गीत है और इसे पूरा गाने को लेकर किसी तरह की हिचक या आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

भारतीय दृष्टिकोण और दुनिया से सीखने की जरूरत

भागवत ने कहा कि आज दुनिया जिन समस्याओं और भय का सामना कर रही है, उनकी जड़ जीवन को देखने के अधूरे नजरिए में है.

हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मानवीय प्रयास और मेहनत के मामले में भारत को दुनिया के अन्य देशों से सीखने की जरूरत है.

उन्होंने कहा कि दूसरे देशों से सीखने के साथ-साथ भारतीयों को अपनी राष्ट्रीय पहचान को समझना, एकता बनाए रखना और सामूहिक प्रयासों के लिए संगठित होकर काम करना चाहिए.

RSS की छवि का बचाव

अपने संबोधन में भागवत ने संघ की नीयत और उसके कामकाज पर सवाल उठाने की कोशिशों का भी जवाब दिया. उन्होंने कहा कि कुछ स्थानों पर होने वाली अवांछित या अप्रत्याशित घटनाओं का इस्तेमाल संघ की सद्भावना और उद्देश्यों पर संदेह पैदा करने के लिए किया जाता है, जबकि उनके अनुसार संघ का उन घटनाओं से कोई संबंध या समर्थन नहीं होता.

भागवत ने कहा कि संघ का काम निस्वार्थ, सद्भावपूर्ण और सद्गुणों पर आधारित प्रेम से प्रेरित है. उन्होंने बताया कि उनकी हाल की विदेश यात्राओं का उद्देश्य विदेशों में भारत और RSS की सही तस्वीर प्रस्तुत करना भी था.

विदेशी शासन और भारत की ऐतिहासिक यात्रा का जिक्र

भागवत ने संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए भारत को ऐसा समाज बताया, जो विविधताओं के बावजूद भावनात्मक एकता से जुड़ा हुआ है.

उन्होंने कहा कि भारत के पास गहरी सांस्कृतिक समझ और उच्च दर्शन होने के बावजूद उसका व्यवहार कई बार इन मूल्यों के अनुरूप नहीं रहा. उनके मुताबिक, इसी कारण देश को लंबे समय तक विदेशी शासन का सामना करना पड़ा और वह विश्वगुरु के स्थान से दूर हो गया.

उन्होंने कहा कि कठिन दौर से निकलने और अनेक बलिदानों के बाद भारत एक बार फिर एकता और प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ा है.

अपने भाषण की शुरुआत में भागवत ने संत रविदास और आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद को श्रद्धांजलि दी. संत रविदास को पंजाब और उत्तर प्रदेश के दलित समुदायों में विशेष सम्मान प्राप्त है. ये दोनों राज्य आगामी चुनावों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं.

ये भी पढ़ें- इमरान खान को Leave India Notice, क्या विरोध करना भारत छोड़ने की वजह?

संदर्भ: यह रिपोर्ट दिए गए मूल लेख पर आधारित है. इसमें मोहन भागवत के बयानों और आरोपों को उन्हीं के वक्तव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है; वैश्विक साजिश संबंधी दावे को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना गया है.

Last Updated on October 20, 2026 4:24 pm

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