बीजेपी अपने सहयोगी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रख रही है. वहीं, कांग्रेस की नजर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के प्रमुख और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी पर है. जगन ने अभी तक संभावित राजनीतिक गठबंधन को लेकर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है.
हाल ही में जगन ने नरेंद्र मोदी सरकार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को पारित कराने में समर्थन देने पर अफसोस जताया और इसे अपनी गलती बताया. इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है. आलोचकों का कहना है कि इस व्यवस्था में सरकार का प्रभाव अधिक है.
जगन के इस बयान और नायडू की तमिलनाडु के मुख्यमंत्री तथा TVK प्रमुख सी. जोसेफ विजय से मुलाकात ने दक्षिण भारत में नए राजनीतिक समीकरणों की अटकलों को तेज कर दिया है.
नायडू और विजय की मुलाकात के राजनीतिक मायने
दशहरा उत्सव के दौरान आयोजित आंध्र प्रदेश के प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम विजयवाड़ा उत्सव 2.0 में विजय शामिल हुए. मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने उनका स्वागत किया. राजनीतिक जानकार इस मुलाकात को केवल सांस्कृतिक मेल-मिलाप नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के नेताओं तक नायडू की पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं.
आंध्र प्रदेश बीजेपी के साथ काम कर चुके एक वरिष्ठ बीजेपी नेता के मुताबिक, नायडू दक्षिण भारत में संभावित गठबंधन के जरिए राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनके अनुसार, इससे बीजेपी नेतृत्व को यह संदेश भी जाता है कि नायडू अलग-अलग राजनीतिक पक्षों के साथ संवाद करने की क्षमता रखते हैं और भविष्य में एक स्वतंत्र दबाव समूह के रूप में उभर सकते हैं.
बीजेपी नेता ने कहा कि नायडू की इन गतिविधियों का समय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीजेपी कई मुद्दों पर दबाव का सामना कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक गठबंधन अक्सर आपसी जरूरतों पर आधारित होते हैं.
तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के एक नेता ने इस मुलाकात को युवा मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश के तौर पर देखा. उनका कहना था कि देश की मौजूदा राजनीति और युवाओं का असंतोष तमिलनाडु में हुए राजनीतिक बदलावों से भी जुड़ा है, जहां Gen Z यानी नई पीढ़ी के समर्थन ने विजय और उनकी पार्टी TVK को सत्ता तक पहुंचाने में भूमिका निभाई.
हालांकि, TDP संसदीय दल के नेता लावू कृष्ण देवरायलु ने इस मुलाकात को राजनीतिक गठबंधन से जोड़ने से इनकार किया. उन्होंने कहा कि नायडू का मुख्य ध्यान बुनियादी ढांचे, पर्यावरण और नदियों को आपस में जोड़ने जैसी परियोजनाओं पर है.
देवरायलु के मुताबिक, नदियों को जोड़ने की योजना आंध्र प्रदेश के साथ ओडिशा, तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक के लिए भी लाभकारी हो सकती है. उन्होंने दावा किया कि 2019 से 2024 के बीच पिछली सरकार के दौरान सिंचाई परियोजनाओं पर पर्याप्त काम नहीं हुआ, इसलिए मौजूदा सरकार कई परियोजनाओं को आगे बढ़ा रही है.
तमिलनाडु में DMK की मुश्किलें क्यों बढ़ीं?
तमिलनाडु में कांग्रेस के DMK से संबंध तोड़कर विजय के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने के बाद द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के सामने अपनी आगे की राजनीतिक रणनीति तय करने की चुनौती है.
बीजेपी ने महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने के लिए परिसीमन से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक पर DMK का समर्थन हासिल करने की कोशिश की है. यह विधेयक अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में पारित नहीं हो पाया था. लेकिन DMK के लिए बीजेपी के साथ सीधे गठबंधन का फैसला लेना आसान नहीं है.
DMK से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, पार्टी कांग्रेस का विरोध करना चाहती है, लेकिन बीजेपी के साथ सीधे हाथ मिलाना उसके लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल हो सकता है. ऐसे में पार्टी गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी दलों के साथ तीसरा मोर्चा बनाने की संभावनाएं तलाश सकती है.
पिछले महीने DMK सांसद कनिमोझी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के नेताओं शरद पवार और सुप्रिया सुले तथा तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी से मुलाकात की थी. इस बातचीत का उद्देश्य गैर-कांग्रेसी विपक्षी गठबंधन की संभावनाओं को तलाशना बताया गया.
DMK के लोकसभा में 22 और राज्यसभा में आठ सांसद हैं. हाल ही में पार्टी सांसदों की बैठक के बाद नेतृत्व ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को खत्म करने और चुनावों में बैलेट पेपर की वापसी की मांग की. बीजेपी पहले ही बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग को खारिज कर चुकी है.
DMK के सूत्रों के अनुसार, पार्टी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता में कथित गिरावट और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का बीजेपी द्वारा लगातार बचाव किए जाने को लेकर चिंतित है.
2029 से पहले दक्षिण भारत में क्या बदल सकता है?
चंद्रबाबू नायडू की विजय से मुलाकात, जगन मोहन रेड्डी का चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर बदला हुआ रुख और DMK की तीसरे मोर्चे की संभावनाओं पर चर्चा दक्षिण भारत की राजनीति में नए विकल्पों की तलाश की ओर इशारा करती है.
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हालांकि, इन घटनाक्रमों से किसी नए गठबंधन के बन जाने की पुष्टि नहीं होती. फिलहाल सवाल यही है कि क्या दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दल 2029 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी और कांग्रेस, दोनों से अलग कोई राजनीतिक विकल्प तैयार कर पाएंगे, या उनकी रणनीति राज्य-स्तरीय हितों और मौजूदा गठबंधनों तक ही सीमित रहेगी?
Last Updated on October 21, 2026 9:04 am
