द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक, नशे का यह कारोबार अब नए जिलों तक फैल रहा है. पुलिस को आशंका है कि सस्ते नशीले पदार्थों की पहुंच किशोरों और आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं तक बढ़ रही है. दूसरी ओर, नशामुक्ति केंद्रों और इलाज की सुविधाओं का विस्तार इस चुनौती के मुकाबले पर्याप्त नहीं दिखता.
आंकड़े बता रहे हैं नशे के बढ़ते कारोबार की कहानी
बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के शुरुआती पांच महीनों में NDPS एक्ट के तहत 1,905 मामले दर्ज हुए. यह संख्या पूरे 2022 में दर्ज मामलों से 83 अधिक है. वर्ष 2019 में ऐसे मामलों की संख्या 697 थी.
गांजे की जब्ती भी तेजी से बढ़ी है. पुलिस ने 2022 में 16,691.81 किलोग्राम गांजा जब्त किया था, जबकि 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 31,915.29 किलोग्राम हो गया.
नशीली गोलियों की जब्ती में इससे भी बड़ा उछाल दर्ज हुआ. 2022 में 29,762 गोलियां जब्त हुई थीं, जबकि 2026 के पहले पांच महीनों में ही यह संख्या बढ़कर 9.29 लाख पहुंच गई. इनमें अवैध रूप से हासिल की गई नींद की दवाएं, ओपिओइड दर्द निवारक, चिंता कम करने वाली दवाएं और नकली गोलियां शामिल हो सकती हैं.
बिहार पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) में पिछले साल अप्रैल में नशीले पदार्थों की तस्करी से निपटने के लिए एक विशेष नारकोटिक्स सेल बनाया गया था. इस सेल ने 10 अक्टूबर 2026 तक 52.32 करोड़ रुपये मूल्य के नशीले पदार्थ जब्त किए और 315 लोगों को गिरफ्तार किया. इसमें से 25.58 करोड़ रुपये की जब्ती इसी साल हुई.
किशोरों से जुड़े आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं. 2016 से 2023 के बीच NDPS एक्ट के तहत 11 किशोरों को हिरासत में लिया गया था, जबकि 2024 में ही यह संख्या 50 दर्ज की गई.
नशामुक्ति केंद्रों पर बढ़ता दबाव
नशे की समस्या का असर इलाज की जरूरत के आंकड़ों में भी दिखाई देता है. केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, बिहार में मंत्रालय समर्थित नशामुक्ति केंद्रों से लाभ लेने वालों की संख्या 2022-23 में 1,487 थी, जो 2024-25 में बढ़कर 29,429 हो गई. यानी लगभग 20 गुना वृद्धि.
पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) के मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. राजेश कुमार ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि समस्या केवल नशा करने वालों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि नशीले पदार्थों के प्रकार भी बदल रहे हैं.
उनके मुताबिक, पहले गांजा और दूसरे पौधों से मिलने वाले पदार्थों पर निर्भरता ज्यादा देखने को मिलती थी. अब अर्ध-सिंथेटिक और सिंथेटिक नशीले पदार्थों के साथ हेरोइन की लत के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं.
बिहार पुलिस के विशेष शाखा एवं ऑपरेशन के महानिदेशक कुंदन कृष्णन ने इस समस्या से निपटने के लिए समाज की भागीदारी पर जोर दिया. उनका कहना है कि केवल पुलिस कार्रवाई से नशे के बढ़ते कारोबार पर काबू पाना मुश्किल होगा. समुदाय, परिवार और राज्य सरकार को मिलकर काम करना होगा.
सरकार ने सितंबर 2025 में निषेध एवं राज्य नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाया था. इसमें 2022 में गठित एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स और पुलिस की मौजूदा निषेध शाखा को शामिल किया गया. केंद्र सरकार ने 2029 के लक्ष्य के साथ नशामुक्त भारत अभियान के तहत कार्रवाई तेज करने की बात भी कही है.
शराबबंदी के बाद कैसे उभरा नशे का नया बाजार?
बिहार में पूर्ण शराबबंदी 5 अप्रैल 2016 को लागू की गई थी. इसका उद्देश्य शराब की खपत और उससे जुड़े सामाजिक-आर्थिक नुकसान को कम करना था. पहले साल में ही पुलिस ने 21.26 लाख लीटर शराब जब्त की और 75,225 गिरफ्तारियां कीं.
लेकिन पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों के मुताबिक, शराब की उपलब्धता पर कार्रवाई के बावजूद नशे की मांग खत्म नहीं हुई. इसी दौरान नशीले पदार्थों के एक सस्ते वैकल्पिक बाजार को जगह मिलने लगी.
पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बिहार के काले बाजार में दूसरी जगहों पर लगभग 650 से 750 रुपये में मिलने वाली 750 मिलीलीटर की व्हिस्की की बोतल करीब 1,500 रुपये में बिक सकती है. इसके मुकाबले मिलावटी ब्राउन शुगर का एक छोटा पैकेट 300 से 500 रुपये में उपलब्ध हो सकता है.
अधिकारियों और डॉक्टरों का मानना है कि कोविड-19 लॉकडाउन ने इस बदलाव को तेज किया. पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-NCR, मुंबई और गुजरात से लौटे कुछ मजदूरों और फैक्ट्री कर्मचारियों के संपर्क में पहले से मौजूद नशीले पदार्थों और उनके नेटवर्क की जानकारी भी वापस आई.
कुछ डॉक्टरों के मुताबिक, शराब का वैध बाजार बंद होने के बाद ग्रामीण इलाकों में गांजा और अफीम जैसे पदार्थों का इस्तेमाल विकल्प के रूप में बढ़ा.
नेपाल से पूर्वोत्तर तक फैला तस्करी का नेटवर्क
बिहार की भौगोलिक स्थिति भी नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए अहम है. राज्य की सीमा नेपाल से लगती है और यहां से पूर्वोत्तर भारत तक सड़क व रेल संपर्क मौजूद हैं. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, बिहार कुछ नशीले पदार्थों के लिए पारगमन मार्ग है. चिंता तब बढ़ती है, जब तस्करी के रास्ते से गुजरने वाला माल स्थानीय बाजार में भी खपत पैदा करने लगता है.
पुलिस के अनुसार, गांजा नेपाल, त्रिपुरा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश से पहुंचता है. कुछ खेप बिहार से होकर उत्तर और पश्चिम भारत के बाजारों तक जाती हैं. चरस की आपूर्ति मुख्य रूप से नेपाल से होने की बात कही गई है, जबकि अफीम की भूसी नेपाल और झारखंड से आने की सूचना है.
अधिकारियों ने आरा, बक्सर, रोहतास और पटना के कुछ इलाकों का जिक्र किया है. वहीं समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और वैशाली के राघोपुर क्षेत्र में भी नए हॉटस्पॉट उभरने की बात कही गई है.
दवाओं और इंजेक्शन की जब्ती में भी भारी बढ़ोतरी हुई है. 2022 में पुलिस ने 3,677 फार्मास्यूटिकल इंजेक्शन जब्त किए थे. 2024 में यह संख्या 63,208 हो गई और 2026 के पहले पांच महीनों में 3,83,066 इंजेक्शन जब्त किए गए.
हेरोइन की जब्ती भी बढ़ी है. 2025 में पूरे साल 65.08 किलोग्राम हेरोइन जब्त हुई थी, जबकि 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ही 51.92 किलोग्राम जब्त की गई.
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि छोटी गोलियां, कैप्सूल और इंजेक्शन की शीशियां जेब या बैग में आसानी से छिपाई जा सकती हैं. ऐसे मामलों में पहले से मिली खुफिया जानकारी की भूमिका अहम हो जाती है.
‘कोटा’ क्या है और क्यों बढ़ रही चिंता?
पुलिस अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक, बिहार में ‘कोटा’ नाम से एक नशीले पदार्थ का इस्तेमाल भी सामने आया है. एक नारकोटिक्स अधिकारी के अनुसार, स्थानीय बोलचाल में नशे की एक खुराक को ‘कोटा’ कहे जाने से इस पदार्थ का नाम पड़ा हो सकता है.
अधिकारियों के मुताबिक, इसे कच्चे हेरोइन जैसे पदार्थ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और आम तौर पर सिगरेट के साथ सूंघा जाता है. यह छोटे डिब्बों में आता है और इसकी छोटी-छोटी शीशियां बनाकर बेची जाती हैं.
पुलिस के अनुसार, पहले एक डिब्बे की कीमत करीब 25,000 से 30,000 रुपये थी, जबकि अब यह लगभग 50,000 रुपये तक पहुंच गई है. एक छोटी शीशी की कीमत 300 से 400 रुपये बताई गई है.
अधिकारियों का कहना है कि म्यांमार से पूर्वोत्तर भारत के रास्तों के जरिए ऐसे नशीले पदार्थों की तस्करी होती है. मिजोरम और मणिपुर की सीमाओं से लेकर असम के सिलचर मार्ग तक के नेटवर्क की जांच की जा रही है. म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के कुछ हिस्सों को मिलाकर जिस क्षेत्र को ‘डेथ ट्रायंगल’ कहा जाता है, वह लंबे समय से अफीम और हेरोइन के कारोबार से जुड़ा रहा है. अब वहां सिंथेटिक ड्रग्स का उत्पादन भी चिंता का विषय है.
तस्करी के नए तरीके, महिलाओं का भी इस्तेमाल
पुलिस के मुताबिक, पूर्वोत्तर राज्यों से रेल के जरिए नशीले पदार्थ लाने वाले कैरियर इस नेटवर्क की अहम कड़ी हैं. एक व्यक्ति आम तौर पर पांच या छह डिब्बे ले जा सकता है, हालांकि कुछ मामलों में 20 डिब्बे तक पकड़े गए हैं.
महिलाओं को भी तस्करी के लिए इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है. मुजफ्फरपुर की एक महिला पुलिस अधिकारी के मुताबिक, कुछ मामलों में पेटीकोट और ब्लाउज में विशेष रूप से सिले गए गुप्त खानों का इस्तेमाल किया गया. परिवार या बच्चों के साथ यात्रा करने पर सफर सामान्य दिखाई दे सकता है, जिससे जांच चुनौतीपूर्ण हो जाती है.
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कुछ कैरियर शुरुआत में कमीशन पर काम करते हैं. कुछ सफल खेपों के बाद वे खुद पैसा लगाने लगते हैं और अपने परिचितों को भी इस नेटवर्क से जोड़ते हैं. पुलिस के अनुमान के मुताबिक, ‘कोटा’ से जुड़े मामलों में गिरफ्तार करीब 80 प्रतिशत लोगों का संबंध वैशाली जिले से है.
तस्करी का नेटवर्क स्थानीय स्तर पर चाय की दुकानों, पान-सिगरेट की दुकानों और सड़क किनारे बेचने वालों के जरिए भी फैल सकता है. अधिकारियों ने मिलावट के लिए चॉक पाउडर, पिसी चीनी, कैफीन पाउडर और दूसरे पदार्थों के इस्तेमाल की आशंका जताई है. ऐसी मिलावट नशे की खुराक और उसके प्रभाव को अप्रत्याशित बना सकती है.
सबसे बड़ी चिंता: सस्ते नशे की गिरफ्त में किशोर
पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी चिंता यह है कि सस्ते नशीले पदार्थ आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और किशोरों तक पहुंच रहे हैं.
संसदीय स्थायी समिति की 2023 की रिपोर्ट में उद्धृत एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुमान के मुताबिक, बिहार में 10 से 17 वर्ष की उम्र के करीब 99,000 गांजा उपयोगकर्ता, 40,000 ओपिओइड उपयोगकर्ता, 29,000 इनहेलेंट उपयोगकर्ता और 8,000 सेडेटिव दवाओं का इस्तेमाल करने वाले बच्चे थे.
IGIMS के डॉ. राजेश कुमार के मुताबिक, अर्ध-सिंथेटिक और सिंथेटिक नशीले पदार्थों की निर्भरता युवाओं में अपेक्षा से कहीं तेजी से विकसित हो सकती है. कई युवा दोस्तों के दबाव या जिज्ञासा के कारण शुरुआत करते हैं, लेकिन बाद में नशा छोड़ना मुश्किल हो सकता है.
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कीमत भी नशे की पहुंच तय करती है. 150 से 200 रुपये खर्च कर पाने वाला युवा कम मात्रा में सस्ता नशीला पदार्थ खरीद सकता है. सड़क किनारे की दुकानों और स्थानीय संपर्कों से शुरुआत होने के बाद कुछ लोग तेजी से इसकी गिरफ्त में आ सकते हैं.
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बिहार में शराबबंदी के दस साल बाद अब चुनौती केवल अवैध शराब को रोकने की नहीं रह गई है. सवाल यह है कि क्या पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ इलाज, जागरूकता, परिवारों की भागीदारी और युवाओं के लिए सहायता व्यवस्था भी उसी गति से बढ़ेगी, जिस गति से नशे का नया बाजार फैल रहा है.
Last Updated on October 22, 2026 7:55 am
