Parliament Monsoon Session 2026: 18वीं लोकसभा का आठवां सत्र यानी इस साल का मॉनसून सत्र एक नया संसदीय रिकॉर्ड बना चुका है. संसद के इतिहास में पहली बार किसी सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद 83 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक उसे औपचारिक रूप से समाप्त यानी प्रोरोग नहीं किया गया है.
मॉनसून सत्र की शुरुआत 20 जुलाई को हुई थी और 13 अगस्त को इसे अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था. संसदीय प्रक्रिया में साइन डाई स्थगन (Adjournment Sine Die) और प्रोरोगेशन (Prorogation) दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. साइन डाई स्थगन का मतलब है कि सदन की बैठक खत्म कर दी गई है, लेकिन अगली बैठक की कोई तारीख तय नहीं की गई है. वहीं, प्रोरोगेशन के जरिए राष्ट्रपति औपचारिक रूप से संसद के सत्र को समाप्त करते हैं.
विशेष सत्र बुलाने की अटकलें, परिसीमन विधेयक पर नजर
संसद के मॉनसून सत्र को अब तक प्रोरोग नहीं किए जाने से यह अटकलें तेज हो गई हैं कि सरकार कम समय के नोटिस पर दोबारा सत्र बुला सकती है. इसके जरिए परिसीमन से जुड़े विधायी प्रस्तावों और महिला आरक्षण कानून को लागू करने की प्रक्रिया से संबंधित विधेयकों को आगे बढ़ाया जा सकता है.
हालांकि, सरकार की ऐसी किसी योजना के दावे फिलहाल अटकलें हैं. इन्हें संसद के किसी स्थापित फैसले के रूप में नहीं देखा जा सकता.
मंगलवार को कांग्रेस के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए सरकार पर सवाल उठाए. उन्होंने लिखा, “संसद का मॉनसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए 82 दिन हो चुके हैं, लेकिन अब तक इसे प्रोरोग नहीं किया गया है. इसकी वजह यह है कि गृह मंत्री अभी भी विशेष सत्र बुलाकर लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के जरिए परिसीमन विधेयकों को पारित कराने के विचार पर काम कर रहे हैं. यह बहुमत बेहद विवादित है.”
जयराम रमेश ने आगे कहा कि इन विधेयकों की विषयवस्तु अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन उनका मकसद स्पष्ट है – 2029 में बीजेपी के सामने खड़ी संभावित राजनीतिक चुनौती से उसे बचाना.
उन्होंने कहा, “अगर गृह मंत्री वोट चोरी के मुद्दे पर विशेष सत्र बुलाने को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें सबसे पहले अपने खास अधिकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा सुनिश्चित करना चाहिए. उन्हें SIR की प्रक्रिया भी स्थगित करनी चाहिए. इसके अलावा परिसीमन को लेकर अपने नए प्रस्तावों की जानकारी विपक्ष को काफी पहले देनी चाहिए.”
रमेश ने सवाल उठाया कि गृह मंत्री में इन प्रस्तावों पर विस्तार से चर्चा करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने का साहस क्यों नहीं है?
संविधान क्या कहता है? कितने दिनों के नोटिस पर बुलाया जा सकता है सत्र
संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति को संसद का सत्र बुलाने का अधिकार है. सामान्य संसदीय परंपरा के मुताबिक, नियमित सत्र के लिए लगभग 15 दिन पहले सूचना दी जाती है.
हालांकि, संविधान के मुताबिक संसद के दो लगातार सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता. विशेष सत्र कम समय के नोटिस पर भी बुलाया जा सकता है.
अगर किसी सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है, लेकिन उसका प्रोरोगेशन नहीं हुआ है, तो तकनीकी रूप से वह सत्र अभी भी जारी माना जाता है. ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही के नियमों के नियम 15 के तहत कम समय के नोटिस पर लोकसभा की बैठक दोबारा बुला सकते हैं.
इससे पहले कब-कब हुआ लंबा साइन डाई स्थगन?
लोकसभा के इतिहास में इससे पहले दो सबसे लंबे साइन डाई स्थगन 1987 में बोफोर्स विवाद के बाद हुए थे.
1987: बोफोर्स विवाद के बीच 76 दिनों तक स्थगित रही लोकसभा
आठवीं लोकसभा का आठवां सत्र 23 फरवरी 1987 को शुरू हुआ था. बोफोर्स विवाद को लेकर सदन में लगातार हंगामे के बीच 12 मई को इसे अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. इसके बाद 76 दिनों तक सत्र का प्रोरोगेशन नहीं हुआ.
बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने नियम 15 के प्रावधान के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए 27 जुलाई से 28 अगस्त तक सदन की बैठक दोबारा बुलाई.
इस तरह बैठकों के बीच लंबा अंतराल होने के बावजूद सत्र कई महीनों तक जारी रहा.
6 अगस्त 1987 को लोकसभा ने बोफोर्स सौदे की जांच के लिए 30 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) गठित करने का प्रस्ताव पारित किया. राज्यसभा ने भी 12 अगस्त को इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया.
इस समिति में लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल थे. आखिरकार 3 सितंबर 1987 को लोकसभा का सत्र प्रोरोग किया गया.
1989: बोफोर्स पर फिर हंगामा, 61 दिनों तक स्थगित रही लोकसभा
इसी लोकसभा के 14वें सत्र में 1989 में तीसरा सबसे लंबा साइन डाई स्थगन दर्ज किया गया. यह सत्र 18 जुलाई 1989 को शुरू हुआ और 18 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. इस बार भी बोफोर्स सौदे को लेकर सदन में भारी हंगामा हुआ.
सौदे पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट संसद में पेश किए जाने के बाद विपक्ष के करीब 100 सांसदों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया.
लोकसभा अध्यक्ष ने एक बार फिर नियम 15 के प्रावधान के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और 11 अक्टूबर से 16 अक्टूबर तक सदन की बैठक दोबारा बुलाई.
इसके बाद 13 अक्टूबर को सदन को फिर अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया और 20 अक्टूबर को सत्र का प्रोरोगेशन हुआ.
कुछ ही सप्ताह बाद राजीव गांधी सरकार सत्ता से बाहर हो गई. इसके बाद वीपी सिंह के नेतृत्व में नेशनल फ्रंट की सरकार बनी, जिसे बीजेपी ने बाहर से समर्थन दिया था.
2015 और 2021 में भी लंबे समय तक स्थगित रही संसद
NDA सरकार के कार्यकाल में भी संसद के सत्रों के बीच लंबे साइन डाई स्थगन देखने को मिले थे.
अगस्त 2015 से 10 सितंबर 2015 के बीच 28 दिनों का अंतराल और 11 अगस्त से 31 अगस्त 2021 के बीच 20 दिनों का अंतराल उस समय तक के सबसे लंबे स्थगनों में शामिल थे.
साइन डाई स्थगन और प्रोरोगेशन में क्या अंतर है?
संसदीय प्रक्रिया पर लिखी गई किताब Practice and Procedure of Parliament के लेखक एमएन कौल और एसएल शकधर के मुताबिक, किसी सत्र के दौरान सदन की बैठक को एक दिन के लिए, एक से अधिक दिनों के लिए या अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जा सकता है.
स्थगन का मतलब है कि सदन की बैठक को किसी दूसरे समय तक टाल दिया गया है. जब सदन को साइन डाई स्थगित किया जाता है, तो उसकी अगली बैठक की तारीख तय नहीं होती. इसका मतलब यह नहीं है कि संसद का सत्र समाप्त हो गया है. केवल उस समय के लिए सदन की बैठक खत्म हुई है.
संविधान के अनुच्छेद 85(2) के तहत राष्ट्रपति के आदेश से संसद का सत्र औपचारिक रूप से समाप्त होता है. राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर संसद का प्रोरोगेशन करते हैं.
तकनीकी रूप से प्रोरोगेशन सदन की बैठक चलने के दौरान भी किया जा सकता है. हालांकि, आम तौर पर पहले सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जाता है और उसके बाद सत्र का प्रोरोगेशन होता है.
क्या लोकसभा को दोबारा बुलाया जा सकता है?
हां. लोकसभा अध्यक्ष के पास अधिकार है कि वह सदन को पहले से तय अगली बैठक की तारीख से पहले या साइन डाई स्थगन के बाद किसी भी समय दोबारा बुला सकते हैं.
इसका मतलब है कि सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देने भर से उसकी बैठक दोबारा बुलाने का रास्ता बंद नहीं होता.
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यही वजह है कि मौजूदा मॉनसून सत्र का अब तक प्रोरोगेशन नहीं होना राजनीतिक और संसदीय चर्चा का विषय बना हुआ है. हालांकि, सरकार विशेष सत्र बुलाएगी या नहीं, इस पर फिलहाल कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है.
Last Updated on November 4, 2026 7:38 am
